एक सदाशयी मित्र ने ‘कभी-कभार’ के बारे में राय दी कि जब मैं राजनीति पर लिखता हूं तो अतिवादी हो जाता हूं. मुझे यह आकलन विचित्र इसलिए लगा कि जब राजनीति पिछले कुछ बरसों से अतिवादी ही रही है तो उसकी इस ध्रुवान्तता से एक लेखक बिना अतिवादी हुए कैसे निपट सकता है! सिर्फ़ आम चुनाव में नहीं, सत्तारूढ़ होने के पहले और बाद से शिखर से लगातार अतिशयोक्ति की बरसात होती रही है. इस अतिशयोक्ति के कुछ अनिवार्य प्रतिफल समाज में बढ़ती हिंसा-हत्या-घृणा-भेदभाव के रूप में साफ़ देखे जा सकते हैं. विडंबना यह है कि इस अतिशयता के उद्यम का आधार तरह-तरह के झूठ हैं. लोकतंत्र में लेखक और नागरिक होने के नाते हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते. झूठ का प्रपंच बहुत लोकव्यापी हो गया है और इस प्रपंच से बिना अतिवादी हुए निपटा नहीं जा सकता. झूठ और सच की अतिशयोक्ति में बुनियादी अंतर होता है. झूठ बिना अतिशयोक्ति के लोकप्रिय नहीं हो सकता और सच को ऐसी अतिशयता की दरकार नहीं. पर अगर उसे झूठ की ऐसी सशस्त्र अक्षौणियों से संघर्ष करना पड़े तो उसे भी अतिवाद का सहारा लेना पड़ता है. अन्यथा, जैसा कि एक स्वीडिश कवि ने दशकों पहले कहा था, ‘सच को किसी फ़रनीचर की दरकार नहीं’.

यह सवाल उठना अनिवार्य है कि झूठ-सच का फैसला कौन करेगा. जो झूठ के बल पर फैलता है, उसे यह आत्मविश्वास है कि वही सच है. हमारे समय में झूठ बोलकर अपने को सच बनाने-बताने की भयावह और दैनिक कोशिश हो रही है. झूठ का काम बिना भय फैलाये नहीं चलता है और सच निर्भय होता और करता है. कम से कम मेरा पक्ष यह है कि हिंसा-हत्या-घृणा आदि सच्चाई तो हैं पर सच नहीं हैं. सच तो पारस्परिकता, एक-दूसरे का सम्मान, प्रेम, अहिंसा ही है. यह मेरा निजी निर्णय नहीं है- इसे समूची मानवता और परंपरा का समर्थन प्राप्त है. आज के मुहावरे में कहें तो रावण सचाई है जिसे बदला जा सकता है, राम सच है जो अपरिवर्तनीय है. हम यह न भूलें कि तुलसीदास ने कहा था- ‘रावण रथी, विरथ रघुवीरा.’

जैसे सत्ता इन दिनों, सारी मर्यादाएं और सभ्य व्यवहार छोड़कर, व्यवहार कर रही है, वैसे में लग सकता है कि झूठ की सत्ता होती है, सच का स्वराज. सभ्यताओं की लम्बी यात्रा में झूठ भी जब-तब वर्चस्वशाली और सत्तारूढ़ होता रहा है, पर इस यात्रा का लक्ष्य सत्य ही रहा है. किसी सभ्यता ने पूरी तरह से सत्य पाया नहीं है पर किसी ने भी उसकी कोशिश करना कभी स्थगित नहीं किया. भारतीय सभ्यता अपने गहरे संकट से गुज़र रही है और उसे तरह-तरह से उसी का नामजाप कर क्षत-विक्षत किया जा रहा है. लेकिन सत्य से उसे झूठ, सत्ता और अतिशयोक्ति, निर्लज्ज अतिवाद विरत नहीं कर सकते, भले अपने हर हालत में सही होने का भ्रम उन्हें हो.

क्रांति और प्रतिरोध

मनुष्यता के स्थायी सरोकारों में से एक है क्रांति. हर युग में उसने क्रांति की अवधारणा पोसी है. उसे संभव बनाने के लिए प्रयत्न किया है. आमूलचूल सब कुछ को बदल देकर नयी शुरूआत करने का मोह मनुष्यता से कभी ग़ायब नहीं हुआ. फिर भी, संपूर्ण क्रांति कभी संभव नहीं हुई. फ्रेंच, सोवियत, औद्योगिक क्रान्तियां अंतत: आधी सफल ही हुई. क्रांति के बारे में यह जो कहा जाता है कि वह अपनी संतान को भी खा जाती है. महात्मा गांधी जिस क्रांति की कल्पना करते थे उसे पूरी तरह से हो पाने का अवसर ही भारत ने नहीं दिया जहां उसकी सबसे अधिक संभावना हो सकती थी. इसलिए यह कहा जा सकता है कि इतिहास के घूरे पर अनेक अर्द्धक्रान्तियां पड़ी हुई हैं.

क्रांति से कम प्रयत्न प्रतिरोध होता है. कई बार कुछ लेखकों, कलाकारों आदि ने क्रांति का वाहक, प्रवक्ता, ध्वजाधारी बनने की कोशिश की है. उनमें से ज़्यादातर सफल और सार्थक नहीं हो पाये. क्रांति सपना ही बनी रहती है जबकि प्रतिरोध सच्चाई बन पाता है. यह भी कह सकते हैं कि कई बार प्रतिरोध क्रांति का अधिक व्यावहारिक संस्करण साबित होता है. याद रहे कि फ्रांस में दूसरे विश्वयुद्ध के आसपास नात्ज़ी जर्मन सत्ता के बरक़्स वहां लेखकों-कलाकारों ने ‘रेज़िस्तान्स’ नियोजित किया था जो कि शब्दशः प्रतिरोध ही था. वहीं 1968 में एकबार फिर युवाओं की पहल और नेतृत्व में क्रांति का सपना देखा और कोशिश हुई जो अंतत: प्रतिरोध बन कर रह गयी.

क्रांति सार्वभौम होने की कल्पना करती है जबकि प्रतिरोध चुने हुए मुद्दों पर ही अपना ध्यान और प्रयत्न एकाग्र करता है. प्रतिरोध भी अंततः परिवर्तनकामिता और दिये गये यथार्थ से असंतोष से उभरता है और वैकल्पिक सचाई की कल्पना करता है. कई बार प्रतिरोध, जैसे कि गांधी जी का नमक सत्याग्रह, आगे जाकर विशाल रूप और प्रतिफल ग्रहण कर लेता है. कुल 17 वर्ष में भारत न सिर्फ़ स्वतंत्र हुआ बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के अंत की शुरूआत भी हो गयी.

इस संदर्भ में हाल ही में सैकड़ों लेखकों, कलाकारों, रंगकर्मियों, वैज्ञानिकों आदि ने घृणा, झूठ, हत्यारी मानसिकता पोसनेवाली वर्तमान सत्ता के विरुद्ध नागरिकों से वोट देने की जो मार्मिक अपील की है वह प्रतिरोध का ही एक रूप है. उन्होंने किसी दल विशेष के लिए वोट नहीं मांगे हैं. उनकी आवाज़ भारतीय नागरिक अनसुनी नहीं जाने देंगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है. उस आवाज़ को दबाने, हाशिये पर डालने, उसे पक्षपाती बताने, गाली-गलौज और शोरोगुल में खो जाने की कोशिश शुरू हो गयी हैं. जो नागरिकता अपने सृजन-ज्ञान-विज्ञान की आवाज़ नहीं सुनती वह खोखली, बंदी और संकीर्ण होने को अभिशप्त है. लेखक-कलाकार-वैज्ञानिक प्रतिरोध ही कर सकते हैं और वे पूरी मार्मिकता और ज़िम्मेदारी से, संकट में अपने कर्तव्य को पहचानकर, ऐसा करने को प्रेरित हुए हैं. विवेक की आवाज़ ही आज प्रतिरोध की आवाज़ है.

भारत के लिए लड़ते हुए’

भारत के लिए लड़ने का दावा बहुत सी शक्तियां कर रही हैं, कर सकती हैं. सेना, भाजपा, राष्ट्रीय सेवक संघ आदि सभी लड़ते नज़र आते हैं. सेना सीमाओं पर मुस्तैदी से लड़ रही है और हर दिन, प्रायः हर दिन एक न एक सैनिक की बलि देती रहती है. भाजपा-संघ गठबंधन ने स्वयं कोई बलिदान नहीं किया है. वह दूसरों को मारने या हाशिये पर ढकेल देने या समाज और देश से बाहर निकालने के लिए लड़ रहे हैं. यह लड़ाई भारत को बचाने की नहीं उसे देर-सबेर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की लड़ाई है. अल्पसंख्यकों-स्त्रियों-दलितों-आदिवासियों-बुद्धिजीवियों आदि के साथ हिंसा, हत्या और बलात्कार, घृणा आदि उसी उपक्रम के रूप हैं.

एक और लड़ाई है जो भारत के लिए लेखक-कलाकार-बुद्धिजीवी आदि सजग नागरिक के रूप में लड़ रहे हैं- यह लड़ाई एक ऐसे भारत को बचाने-बढ़ाने के लिए है जो समावेशी, धर्मबहुल, भाषाबहुल, हर व्यक्ति की गरिमा, बराबरी, न्याय आदि पर आधारित भारत है जो बल पर नहीं बुद्धि पर, घृणा पर नहीं प्रेम और पारस्परिकता पर, हिंसा पर नहीं अहिंसा पर, कल्पित-इच्छित इतिहास पर नहीं भारतीय परम्परा की अदम्य बहुलता पर आधारित है. यह भारत एक खुला भारत है जिसमें स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्य निर्धारक तत्व हैं, जो बहुसंख्यकता बाद के बरक़्स लोकतांत्रिक वृत्ति का आग्रह करता है. इस लड़ते हुए भारत की छवियां, कठिनाइयां और बाधाएं, विश्वास और उम्मीदें एक नयी पुस्तक बैटलिंग फ़ॅार इण्डिया में संकलित हैं जो स्पीकिंग टाइगर ने गीता हरिहरन और सलीम यूसुफ़जी के संपादन में प्रकाशित की है. उसमें शान्ता गोखले, के सच्चिदानन्दन, नयनतारा सहगल, शशि देशपाण्डे, उदयप्रकाश, मीना एलेक्ज़ैण्डर, प्रवीर पुरकायस्थ, हर्ष मन्दर, प्रभात पटनायक, पी साईंनाथ, केकी दारूवाला, अनिल सद्गोपाल आदि की रचनाएं मूल अंग्रेज़ी या अनुवाद में शामिल हैं.

सभी जानते हैं कि भारत के लिए लड़ने का यह उपक्रम कई दशकों से चलता रहा है क्योंकि भारतीयता पर संकट, एक तरह से, महात्मा गांधी की 1948 में हत्या से शुरू हुआ था, कमोबेश रहता आया है. हाल के वर्षों में उसने नयी प्रखरता और तात्कालिकता पायी है क्योंकि भारत की समावेशी अवधारणा पर लगातार प्रहार करनेवाली शक्तियां सत्तारूढ़ हो कर पूरी बेशरमी से एक क्रूर हिंसक अभियान चला रही हैं. यह अभियान इस भारत को सीमित करने, उसकी समावेशिता को घटाने, उसकी स्वतंत्रता-समता-न्याय की मूल्यव्यवस्था में कटौती करने और स्वयं लोकतंत्र को एक जवाबदेह व्यवस्था से बदलकर गोदी व्यवस्था बना रहा है. यह पुस्तक उसके विरुद्ध एक आह्वान है, चेतावनी भी कि अगर नागरिकता ने सचेत प्रतिरोध नहीं किया तो आशंका सचाई में बदल जायेगी. यह प्रतिरोध का एक नया दस्तावेज़ है जो यह भी बताता है कि प्रतिरोध कितना व्यापक, सशक्त और सक्रिय है. आशाप्रद भी.