कभी ऐसा भी होता है कि हम किसी नई जगह होते हैं या कुछ नया कर रहे होते हैं, तो लगता है कि हम वहां पहले भी आ चुके हैं या वह काम पहले भी कर चुके हैं. यह शायद भ्रम की स्थिति होती है. हिंदी में इसके लिए कोई शब्द नहीं बना पर फ़्रेंच में इसे ‘देजा वू’ कहते हैं. कभी कभी यूं भी होता है न, कि हम कोई ख़्वाब देखते हैं और अगले दिन या कुछ दिनों बाद वह हक़ीक़त बन जाता है. ऐसा क्यों होता है? मशहूर लेखक टॉम रॉबिन्स ने कभी कहा था, ‘ख्व़ाब हक़ीक़त नहीं बनते, वे होते हैं’.

आज ऐसे शख़्स का बयान है जिसने दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी की बात एक कहानी में 14 साल पहले लिख दी थी. वह था- मॉर्गन रॉबर्टसन. 1861 में जन्मे रॉबर्टसन के पिता पानी के एक जहाज के कप्तान थे. 16 साल की उम्र में मॉर्गन पिता की तरफ नाविक बना. कुछ साल जहाज पर काम करने के बाद, 1886 न्यूयॉर्क आ बसा. यहां वह स्वर्णाभूषणों का काम करने लगा. पर बात नहीं बनी. आंखों की गिरती रोशनी के चलते उसे काम बंद करना पड़ा. इससे उसकी माली हालात कमज़ोर हो गई.

एक रोज़ मॉर्गन रॉबर्टसन के हाथ समुद्री यात्रा पर लिखी रुडयार्ड किपलिंग की एक किताब लग गई. इससे प्रेरित होकर उसने ख़ुद की समुद्री यात्राओं के दौरान हुए तजुर्बे लिखने का फ़ैसला किया. उसने पहली कहानी एक रात ही में बना ली और 25 डॉलर में अमेरिका की मैकल्युर्स नाम की एक मैगज़ीन को बेच दी. अगले साल उसने 20 कहानियां लिखीं जिनसे उसने 1000 डॉलर कमाए. मॉर्गन रॉबर्टसन कोई हतप्रभ करने देने वाला लेखक नहीं था. उसे लिखने के लिए ख़ासी मेहनत करती पड़ती और फिर कम पढ़े होने की वजह से उसके पास शब्द भी कम थे. लिहाज़ा उसकी कमाई जैसे-तैसे चल रही थी.

1897 की एक शाम मॉर्गन रॉबर्टसन अपने घर में बैठा हुआ था कि उसने एक और समुद्री यात्रा का वृतांत लिखने का फ़ैसला किया. ये किसी कहानी से लंबा होना था पर किताब नहीं. उसका प्लाट था एक न डूबने वाले ब्रिटिश जहाज की पहली समुद्री यात्रा. उसने जहाज का नाम रखा-‘टाइटन’. उसने एक शराबी कप्तान जॉन रोलैंड नाम के पात्र को इसका नायक बनाया जो मायरा सेल्फब्रिज नाम की महिला से असफल प्यार करता है. उस महिला की कहीं और शादी हो गई है. मायरा और उसकी बेटी उसी जहाज पर यात्रा कर रहे हैं. जहाज एक हादसे का शिकार हो जाता है और रोलैंड मायरा की बेटी को बचा लेने में सफल रहता है.

इस खाके को खींचकर मॉर्गन रॉबर्टसन लिखने बैठा गया. किस्से को उसने नाम दिया- ‘द रैक ऑफ़ द टाइटन या फ़्यूटिलिटी’. जिस बात ने उसे सबसे ज़्यादा रोमांचित किया वह जहाज के साथ हुए हादसे की घटना थी, न कि नायक द्वारा मायरा की बेटी को बचाने का ज़िक्र. कहानी में हादसे का ज़िक्र उसने कुछ यूं लिखा था:

‘बर्फ़...देखो आगे बर्फ़ है. जहाज के बिलकुल नीचे आइसबर्ग है! पहला अफ़सर ये चिल्लाते हुए जहाज पर दौड़ रहा था. कप्तान लपकर इंजन रूम में गया और टेलीग्राफ से संदेश भेजने लगा...पर पांच सेकंड में जहाज का आगे वाला हिस्सा ऊपर उठने लगा, और आगे, दोनों तरफ़, धुंध की परतों के बीच 100 फ़ीट ऊंचे हिमखंड उसके रास्ते में दिखाई देने लगे. जहाज में बजने वाला संगीत ख़ामोश हो गया. स्टील और हिमखंड के टकराने से पैदा हो रही गड़गड़ाहट के बीच चारों तरफ लोगों का शोर मच गया. रोलैंड ने एक औरत के रोने की आवाज़ पहचान ली.’

‘...75 हज़ार टन का जहाज धुंध के बीच से गुज़रता हुआ 50 फ़ीट प्रति सेकंड की रफ़्तार से हिमखंड से जा टकराया था. जहाज और आइसबर्ग के टकराने से पानी में भंवर पड़ गए जिससे टाइटन उनमें घिर गया और उसका आगे वाला हिस्सा पानी में सीधा खड़ा हो गया....चारों तरफ़ 3000 यात्रियों की आवाजें ही आवाज़ें थीं और फिर थोड़ी देर के बाद वे आवाजें ख़ामोश हो गईं.’

मॉर्गन की यह कहानी अगले साल यानी 1898 में छपी. इसके बाद उसने कई और कहानियां लिखीं पर वह किसी भी साल 5,000 डॉलर से ज़्यादा नहीं कमा पाया क्योंकि उसकी कहानियां ज़्यादा चर्चित नहीं हुई. धीरे-धीरे यह कमाई भी कम हो गई. लेखन छोड़ कर वह एक अस्पताल के मानसिक रोगियों के वार्ड में नौकरी करने लग गया. वहां एक मानसिक चिकित्सक ने उसे लेखन और बाकी काम छोड़ कर अविष्कार की तरफ़ प्रेरित किया. बताते हैं कि उसने पनडुब्बियों में काम आने वाले पेरिस्कोप का अविष्कार किया. इससे मॉर्गन रॉबर्टसन किस्मत बदल सकती थी पर वह इसे पेटेंट नहीं करा पाया क्योंकि एक विज्ञान गल्प पत्रिका यानी साइंस फ़िक्शन मैगज़ीन में ऐसे ही एक यंत्र का ज़िक्र किया जा चुका था.

क़िस्मत के मारे मॉर्गन ने एक बार फिर खुद को लेखन की ओर मोड़ दिया. उसने 200 कहानियां लिखीं पर कुछ ख़ास बात नहीं बनीं. मुफ़लिसी के दिनों में दोस्तों ने उसकी कहानियों का एक संकलन छपवाया जिससे उसे कुछ आर्थिक मदद मिली.

पर इसी बीच वह घटना हो गई जिसकी वजह से दुनिया का उसकी ओर ध्यान चला गया. 14 अप्रैल, 1912 को ब्रिटेन का टाइटैनिक जहाज अंधमहासागर में एक हिमखंड से जा टकराया था. जहाज का आगे का हिस्सा दो टुकड़ों में खुला और जहाज डूब गया. 1513 लोग डूब कर मर गए. इसके बाद, कुछ पाठकों को मॉर्गन की 14 साल पहले लिखी कहानी याद आई. जब उन्होंने उसकी किताब के पन्ने एक बार फिर पलटे तो कहानी और हक़ीक़त में हुई उस घटना में हैरतंगेज़ समानताएं मिलीं.

कहानी में जहाज टाइटन का वज़न 75,000 टन था. लंबाई 800 फ़ीट. इसमें 19 वाटरटाइट कम्पार्टमेंट्स थे जबकि प्रोपेलर्स की संख्या थी तीन. जहाज पर लाइफ़बोट 24 थीं. यात्रियों की संख्या थी 3,000 और जहाज की रफ़्तार 25 नॉट थी. उधर, असल में डूबने वाले टाइटैनिक का वज़न 66,000 टन था. लंबाई थी 882.5 फ़ीट. इसमें वाटरटाइट कम्पार्टमेंट्स 16 थे जबकि प्रोपेलर की संख्या तीन थी. जहाज पर लाइफ़बोट 22 थीं. यात्रियों की संख्या थी 2,224 और जहाज की रफ़्तार 23 नॉट थी.

मॉर्गन रॉबर्टसन ने एक और किताब लिखी है जिसका नाम है, ‘बियॉन्ड द स्पेक्ट्रम’. इसमें उसने अमेरिका और जापान के बीच होने वाले भविष्य के युद्धों का ज़िक्र किया था. दूसरे विश्व युद्ध में यह बात भी हक़ीक़त बनकर उभरी. बताते हैं कि उसने एटम बम के इस्तेमाल का भी ज़िक्र एक कहानी में किया था.

इसके बाद मॉर्गन रॉबर्टसन चर्चा में आ गया. पर इससे उसकी मुश्किलें आसान नहीं हुईं क्योंकि बतौर लेखक लोगों ने उसे नकार दिया था. टाइटैनिक के डूबने के तीन साल बाद मार्च, 1915 को मॉर्गन अटलांटिक सिटी होटल में ठहरा हुआ था कि उसे दिल का दौरा पड़ा और वह हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया. हैरत की बात है टाइटैनिक जहाज अटलांटिक महासागर में ही डूबा था.