2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले गुजरात में जिस तरह का माहौल बना, उससे लगने लगा था कि दो दशक से प्रदेश की सत्ता में बैठी भाजपा को बाहर का रास्ता देखना पड़ेगा और कांग्रेस इतिहास रचने में सफल रहेगी. लेकिन अंतिम चरण के टिकट वितरण समेत कांग्रेस ने ऐसी कई बड़ी चूक कीं कि उसे 182 में से 77 सीटों पर ही मन मसोस कर रह जाना पड़ा. हालांकि तब राजनीतिक विश्लेषकों ने कांग्रेस को जमकर सराहा था और कयास लगाए थे कि यदि पार्टी अपना यह प्रदर्शन बरक़रार रख पाई तो 2019 के लोकसभा चुनाव में वह गुजरात में भाजपा के लिए एक बड़ी मुश्किल खड़ी कर देगी. तो क्या ये कयास सही साबित हुए हैं?

इस बारे में सत्याग्रह से हुई बातचीत में गांधीनगर से कांग्रेस प्रत्याशी और विधायक सीजे चावड़ा का कहना है, ‘छब्बीस में से सोलह सीटों पर हम (कांग्रेस) निश्चित जीत दर्ज़ करेंगे.’ साथ ही उन्होंने जोर देकर यह भी कहा, ‘इनमें एक सीट; गांधीनगर भी होगी.’ हालांकि ये बात और है कि सामने अमित शाह होने की वजह से उनकी सीट गुजरात ही नहीं, बल्कि देशभर में कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल मानी जा रही शीर्ष सीटों में शामिल है.

चावड़ा के दावे पर जब हमने प्रदेश कांग्रेस के एक पदाधिकारी से प्रतिक्रिया चाही तो शुरुआत में उन्होंने इससे सहमति जता दी. लेकिन बाद में उनका कहना था, ‘सोलह तो थोड़ी मुश्किल हैं, पर बारह सीटें तय हैं.’ तमाम राजनैतिक-जातिगत समीकरणों की जोड़-बाकी करते यह चर्चा जैसे-जैसे आगे बढ़ी, सीटों की संख्या घटकर दस ही रह गई. लेकिन फिर पार्टी से जुड़े एक विश्वसनीय सूत्र ने इस बारे में एक नया ही आंकड़ा हमारे सामने रखा. उनका कहना था, ‘आंख मूंदने लायक मजबूत स्थिति तो सिर्फ दो सीटों पर हैं. यदि परिस्थिति पक्ष में रहीं तो यह गिनती छह-सात तक पहुंच सकती है.’

गुजरात की राजनीति पर नज़र रखने वाले कई पत्रकार और विश्लेषक भी कांग्रेस को मिलने वाली संभावित सीटों को लेकर इस आख़िरी बात से सहमति रखते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव से तुलना करें तो यह स्थिति कांग्रेस के लिए ठीक-ठाक कही जा सकती है क्योंकि तब गुजरात की 26 सीटों में से उसे एक भी नहीं मिल पाई थी. वहीं यदि 2009 और 2004 के लोकसभा चुनावों की तरफ़ देखें तो यह आंकड़ा क्रमश: 11 और 12 लोकसभा सीटों का था.

अब सवाल उठता है कि पिछले सवा साल में ऐसे क्या कारण बने कि जो कांग्रेस गुजरात में सरकार बनाने के करीब पहुंच गई थी वह लोकसभा चुनाव में आधे से भी कम सीटों पर सिमटती दिखाई दे रही है.

इसके जवाब में प्रदेश कांग्रेस के एक पूर्व पदाधिकारी पार्टी की अंदरूनी उठापटक को पहली वजह के तौर गिनाते हैं. नाम न छापने की शर्त पर वे अपनी बात के पक्ष में पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी की आणंद सीट का उदाहरण प्रमुखता से देते हैं. उनके शब्दों में, ‘प्रदेश की राजनीति से जुड़े अधिकतर लोग जानते हैं कि सोलंकी को हराने में आणंद से ही ताल्लुक रखने वाला कांग्रेस का एक विधायक पूरा जोर लगाए हुए है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद भाई पटेल की भी सोलंकी से असहज रिश्तों की ख़बरें किसी से छिपी नहीं हैं. सोलंकी को प्रदेशाध्यक्ष पद से हटवाने में भी अहमद भाई ने बड़ी भूमिका निभाई थी. चर्चा है कि आणंद में पटेल समर्थक कांग्रेस नेता भरत सिंह सोलंकी को रोकने के हरसंभव प्रयास में जुटे हैं.’

कांग्रेस के ये नेता भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) के साथ तमाम संभावनाओं के बावजूद कांग्रेस का गठबंधन न होने के पीछे भी अहमद पटेल को ही कटघरे में खड़ा करते हैं. जबकि बीटीपी के संस्थापक और विधायक छोटू भाई वसावा ने 2017 के राज्यसभा चुनाव में बुरी तरह फंस चुके अहमद पटेल को अपना निर्णायक मत देकर उनकी किरकिरी होने से बचाई थी. तब वसावा भाजपा की सहयोगी पार्टी जनता यूनाइटेड (जदूय) से जुड़े थे और पटेल को समर्थन देने की वजह से उन्हें पार्टी से निष्कासित भी कर दिया गया था.

इसके बाद से ही संभावना जताई जाने लगी थी कि वे कांग्रेस का हाथ थाम लेंगे. लेकिन वसावा ने नई पार्टी बनाना ज्यादा उचित समझा. 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान गुजरात के आदिवासी बहुल जिलों में बीटीपी का जबरदस्त समर्थन देखा गया और छोटू भाई वसावा व उनके बेटे महेश वसावा विधानसभा भी पहुंचे. यही नहीं, अगले साल यानी 2018 में हुए राजस्थान के विधानसभा चुनावों में भी बीटीपी के दो उम्मीदवार जीत हासिल करने में सफल रहे.

अब, जब सात बार विधायक रह चुके छोटूभाई वसावा ने गुजरात की भरूच लोकसभा सीट से मैदान में उतरने का मन बनाया तो कांग्रेस ने उनसे गठबंधन से इनकार कर दिया. चूंकि अहमद पटेल भी भरूच से ही ताल्लुक रखते हैं इसलिए चर्चा है कि क्षेत्र में वर्चस्व बनाए रखने के लिए उन्होंने बीटीपी के साथ समझौता नहीं होने दिया. विश्लेषकों के मुताबिक बीटीपी को साथ न लेने की वजह से गुजरात में कांग्रेस को- भरूच, बनासकांठा, पंचमहल, साबरकांठा, दाहोद, छोटा उदयपुर, वलसाड़ और बरड़ोली जैसे आदिवासी मतदाताओं की प्रभावी उपस्थिति वाले जिलों में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है. माना जाता है कि राज्य के तकरीबन 65-70 लाख आदिवासी मतदाता पारंपरिक तौर पर कांग्रेस की तरफ झुकाव रखते आए हैं, लेकिन इस बार बीटीपी के सामने होने की वजह से वे उससे छिटक सकते हैं.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में छोटूभाई वसावा इस मामले को लेकर अहमद पटेल समेत पूरी कांग्रेस पर बड़ा हमला बोलते हैं. वे कहते हैं, ‘गुजरात में इन दोनों पार्टियों (भाजपा और कांग्रेस) और इनके नेताओं ने आपसी रजामंदी से एकाधिकार स्थापित कर लिया है. जब मैंने अहमद भाई को समर्थन दिया, मुझे लगा कि वे आदिवासियों की आवाज़ मजबूत करने में मदद करेंगे. लेकिन मैं गलत था. उन्हें यह तो मंजूर है कि गुजरात में भाजपा भले ही एक बार फिर 26 सीटों पर कब्ज़ा कर ले. लेकिन उन्हें प्रदेश में किसी नए दल का उभार स्वीकार नहीं. फिर चाहे वह उनका समर्थक ही क्यों न हो!’ रोष जताते हुए वसावा कहते हैं कि कांग्रेस को अपनी इस गलती का ख़ामियाजा गुजरात ही नहीं बल्कि राजस्थान में भी उठाना पड़ेगा.

गुजरात में कांग्रेस की कमजोर स्थिति के लिए कई जानकार रणनीतिक मोर्चे पर पार्टी के ढुल-मुल रवैये को भी जिम्मेदार ठहराते हैं. प्रदेश की राजनीति पर करीब से नज़र रखने वाले प्रोफेसर हेमंत शाह इस बारे में कहते हैं, ‘शीर्ष से लेकर बूथ प्रंबधन तक कांग्रेस, भाजपा से बहुत पीछे है. भाजपा के पास स्टार प्रचारकों की पूरी फौज है. जबकि कांग्रेस की तरफ से ले-देकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ही सामने आते हैं.’

सवालिया लहज़े में शाह आगे जोड़ते हैं, ‘क्यों पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का यहां कोई सम्मेलन आयोजित नहीं करवाया जाता? जबकि अहमदाबाद समेत पूरे गुजरात में सिख मतदाताओं की अच्छी-खासी तादाद है. (*हालांकि सोमवार को कांग्रेस ने नवजोत सिंह सिद्धू को गुजरात में बुलाया था.) क्यों नहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे ऊर्जावान युवा नेताओं को गुजरात भेजा जाता?’ बकौल शाह, ‘कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कई आकर्षक वादे किए हैं. लेकिन गुजरात में पार्टी के पास समर्पित कार्यकर्ताओं की इतनी भारी कमी है कि वह अपनी घोषणाओं को भी आम जनता तक नहीं पहुंचा पाई है.’

वहीं कुछ जानकार इस बात से भी इनकार नहीं करते कि जिन तीन युवा नेताओं- हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को संबल दिया था, लोकसभा चुनाव आते-आते उनका तिलस्म बहुत हद तक घट चुका है. इनमें से अल्पेश ठाकोर तो कुछ ही दिन पहले कांग्रेस से बग़ावत कर चुके हैं.

इसके अलावा गुजरात कांग्रेस में दो पीढ़ियों के बीच की लड़ाई भी संगठन को अंदरखाने बड़ा नुकसान पहुंचा रही है. पार्टी के वरिष्ठ सदस्य इस बात से नाराज़गी जताते हैं कि इस समय प्रदेश संगठन की पूरी बागडोर तीन युवा नेताओं, अध्यक्ष- अमित चावड़ा, नेता प्रतिपक्ष- परेश धाणानी और प्रभारी- राजीव सातव के हाथ में है. नतीजन कई पुराने सदस्यों को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया है और बाकियों को धकेले जाने की तैयारी है.

लोकसभा चुनाव में गुजरात कांग्रेस के संभावित प्रदर्शन को लेकर वरिष्ठ पत्रकार बसंत रावत बताते हैं, ‘इस चुनाव में अंडर करंट बहुत ज्यादा है और कांग्रेस द्वारा गरीबों को 72 हजार रुपए दिए जाने का दावा भी लोगों को लुभा रहा है. इसलिए कोई बड़ा पूर्वानुमान लगाना गलत होगा. लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पार्टी गुजरात में उस प्रदर्शन के इर्द-गिर्द पहुंचने में भी लगातार नाकाम रही है जिसकी अपेक्षा प्रमुख विपक्षी दल से की जाती है.’ रावत आगे जोड़ते हैं, ‘भाजपा को सिर्फ अपने विरोधियों से जूझना पड़ता है. लेकिन कांग्रेस के नेताओं को अपने ही संगठन में दोहरी-तिहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है.’

रावत के शब्दों में, ‘गुजरात में कांग्रेस के पास अपना एक भी ऐसा नेता नहीं है जो भीड़ को खुद से जोड़ सके. यही कारण है कि प्रदेश कांग्रेस; भाजपा के प्रति लोगों में मौजूद नाराज़गी को भुना पाने में पूरी तरह नाकाम होती दिख रही है. इसके अलावा पार्टी का दशकों पुराना अहम भी उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा नज़र आता है. बीटीपी के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने लगभग सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. जो स्पष्ट रूप से कांग्रेस के ही वोट काटेंगे. यदि कांग्रेस चाहती तो इस नुकसान से आसानी से बचा जा सकता था.’