लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से पहले उत्तर प्रदेश में गन्ना एक बड़ा चुनावी मुद्दा था. अब दूसरे चरण (18 अप्रैल) में आलू को अहम चुनावी मुद्दा माना जा रहा है. इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस चरण के तहत उत्तर प्रदेश की आठ लोकसभा सीटों में से चार पर आलू का मुद्दा हावी रहने वाला है.

आगरा और फतेहपुर सीकरी की कुल 57,879 हेक्टेयर जमीन पर आलू की खेती होती है. वहीं, हाथरस में 46,333 और अलीगढ़ में 23,332 हेक्टेयर जमीन पर आलू उगाया जाता है. अखबार की मानें तो इन चारों सीटों पर आलू बड़ा चुनावी मुद्दा है. वहीं, तीसरे चरण के तहत फिरोजाबाद व कन्नौज और चौथे चरण के मतदान के लिए फर्रुखाबाद में आलू अहम मुद्दा हो सकता है.

रिपोर्ट के मुताबिक इन इलाकों के लोग भी यही बात कहते हैं. फतेहपुर सीकरी के नागला नाथू गांव में खेती करने वाले प्रदीप शर्मा कहते हैं, ‘हमारे यहां का प्रमुख मुद्दा आलू ही है. हमारे खेतों से मोटा आलू प्रति 50 किलो के हिसाब से 300-350 रुपये में बिक रहा है. गुल्ला (मध्यम आकार) आलू 200-250 रुपये प्रति 50 किलो है और किर्री (छोटा) आलू की कीमत 100-150 रुपये है. बीते तीन सालों से ये दाम कम ही रहे हैं, खास कर नोटबंदी के बाद.’ प्रदीप शर्मा ने 2014 के आम चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया था. लेकिन इस बार वे फतेहपुर सीकरी से कांग्रेस के प्रत्याशी राज बब्बर का समर्थन कर रहे हैं. उन्होंने दावा किया, ‘मेरे गांव के 90 प्रतिशत ब्राह्मण और 50 प्रतिशत से ज्यादा ठाकुर कांग्रेस को वोट कर रहे हैं.’

उत्तर प्रदेश के इन इलाकों में मध्य अक्टूबर से नवंबर के बीच आलू की खेती शुरू होती है. फरवरी से मार्च के बीच इसकी फसल काटी जाती है. किसान आम तौर पर अपनी फसल का पांचवां हिस्सा इस दौरान बेच पाते हैं. बाकी के आलू भंडार गृहों में पहुंचाए जाते हैं. वहां इन्हें दो से तीन डिग्री सेल्सियस पर रखा जाता है ताकि नवंबर तक इनकी बिक्री की जा सके. इस दौरान भंडार गृहों के मालिक आलू की हरेक बोरी के लिए किसानों से 110 रुपये लेते हैं.

आगरा के भंडार गृहों की एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश गोयल बताते हैं कि जिले में ऐसे 280 भंडार गृह हैं. हरेक की क्षमता 10,000 टन आलू रखने की है. वे कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में इस तरह के 1,800 भंडार गृह हैं. इनमें से 1,000 भंडार गृह अकेले आगरा और अलीगढ़ जिलों के इलाकों में बने हैं. नोटबंदी से पहले आगरा के भंडार गृहों में आलू की एक बोरी 600-700 रुपये में बिक रही थी. लेकिन नोटबंदी के चलते 500, और 1,000 रुपये के नोट बेकार हो गए जिससे भंडार गृहों से आलू की इन बोरियों की बिक्री रुक गई. इन्हें मजबूरन 100-125 रुपये प्रति बोरी की कीमत पर बेचना पड़ा. रिपोर्ट के मुताबिक यह कीमत बड़े आलू की रही. गुल्ला और किर्री आलू तो एक तरह से मुफ्त में देने पड़े.

आगरा में आलू के किसानों से जुड़े एक संगठन पोटेटो ग्रोअर्स एसोसिएशन के महासचिव मोहम्मद आलमगीर कहते हैं, ‘हम तीन सालों में एक बार दाम कम रहने के आदी हो चुके हैं. लेकिन लगातार तीन सालों तक घाटा कोई किसान नहीं उठा सकता.’ आलमगीर के मुताबिक गन्ना किसानों की तरह आलू के किसानों की कोई संगठित ‘लॉबी’ नहीं है, लेकिन इस बार के चुनाव में वे निश्चित ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे.