बीते हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ एक और बड़ा कदम उठाया. उन्होंने ईरान की सेना - ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया. अमेरिका का यह कदम काफी चौंकाने वाला है क्योंकि उसने पहली बार किसी देश के एक राष्ट्रीय सशस्त्र बल के खिलाफ यह कार्रवाई की है. मकसद चाहे जो भी हो लेकिन ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर को आतंकवादी संगठन घोषित करने से जुड़ा यह फैसला खुद अमेरिका के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

ईरान के लिए ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ इतना अहम क्यों है

ईरान में ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ की स्थापना 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हुई थी. इसका काम ईरान को आंतरिक और बाहरी खतरों से बचाना है. इस्लामी क्रांति के बाद इस सुरक्षा बल को उस समय की ईरानी सेना के समांतर एक संगठन के तौर पर खड़ा किया गया था क्योंकि उस वक्त सेना में बहुत से लोग सत्ता से बेदखल किए गए ईरानी शाह के वफादार माने जाते थे.

फिलहाल रिवॉल्यूशनरी गार्ड में करीब सवा लाख सैनिक हैं. शुरुआत में यह सैन्य इकाई ईरान में केवल आंतरिक बल के तौर पर ही काम करती थी. लेकिन 1980 में जब इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया तो इस रिवॉल्यूशनरी गार्ड की ताकत को बढ़ा दिया गया. तब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातोल्लाह खोमेनी ने इस सैन्य बल को खुद की जमीन, नौसेना और वायु सेनाएं दे दीं.

रिवॉल्यूशनरी गार्ड की निगरानी में ही ईरान का बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम चलता है. पिछले दिनों अमेरिका की तमाम चेतावनियों के बाद भी उसने कई मिसाइल परीक्षण किए थे. ईरान के संविधान के मुताबिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड की जवाबदेही सिर्फ ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रति होती है. इस समय अयातोल्लाह अली खमेनेई देश के सर्वोच्च नेता हैं.

ईरान की अर्थव्यवस्था में भी इस सैन्य संगठन का बहुत दखल है. इसे कई तरह की कानूनी, राजनीतिक और धार्मिक शक्तियां भी दी गई हैं. रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की विदेशों में अभियान चलाने वाली लड़ाका इकाइयां ‘कुद्स’ भी हैं. कुद्स लेबनान में हिजबुल्लाह और गाजा पट्टी में हमास के साथ मिल कर काम कर रहा है. यह भी कहा जाता है कि यमन में सऊदी विरोधी हूती विद्रोहियों की मदद भी ईरानी सेना के कुद्स बल ही करते हैं.

रिवॉल्यूशनरी गार्ड को आतंकी संगठन घोषित करके अमेरिका क्या मकसद हासिल करना चाहता है

अमेरिका ने पहली बार 1984 में ईरान को आतंकवाद प्रायोजित देश घोषित किया था. इसके बाद 2001 में राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने रिवॉल्यूशनरी गार्ड को ‘विशेष रूप से नामित वैश्विक आतंकवादी’ यानी एसडीजीटी की सूची में डाल दिया. इससे अमेरिकी प्रशासन को रिवॉल्यूशनरी गार्ड से जुड़े लोगों की अमेरिका में स्थित संपत्तियों को फ्रीज करने की अनुमति मिल गई. इसके बाद 2007 में कुद्स बल को भी एसडीजीटी की सूची में डाल दिया गया. 2017 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने रिवॉल्यूशनरी गार्ड पर शिकंजा कसने के लिए कुछ और प्रतिबंध लगा दिए.

जानकारों की मानें तो अब अमेरिका के रिवॉल्यूशनरी गार्ड को विदेशी आतंकी संगठन (एफटीओ) की सूची में डालने का मकसद केवल और केवल ईरान पर दबाव बढ़ाना है. अब अमेरिका दिखाना चाहता है कि वह ईरान के लिए कोई भी रास्ता नहीं छोड़ना चाहता और उसे हर हाल में बातचीत की मेज पर आना ही होगा.

अमेरिकी मीडिया की मानें तो विदेशी आतंकवादी संगठन के रूप में चिन्ह्ति किये जाने के बाद अब अमेरिकी जांच एजेंसियां, विदेश विभाग और राजस्व विभाग को रिवॉल्यूशनरी गार्ड के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाली संस्थाओं पर कार्रवाई को ज्यादा प्राथमिकता देनी होगी.

वाशिंगटन डीसी स्थित फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज से जुड़े ईरान मामलों के विशेषज्ञ बेहनाम बेन तालेब्लू एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का यह फैसला ईरानी सेना के साथ काम करने वाली संस्थाओं पर कार्रवाई के लिए अमेरिकी एजेंसियों को ज्यादा शक्ति प्रदान करेगा. अब बैंकों, कारोबारी प्रतिष्ठानों और अन्य वित्तीय संस्थानों को ईरान के साथ लेन-देन जारी रखने पर और अधिक सावधानी बरतनी होगी.’

बेहनाम बेन आगे बताते हैं कि एफटीओ की सूची में शामिल होने का मतलब है कि अगर कोई भी रिवॉल्यूशनरी गार्ड को किसी तरह की मदद या सामग्री प्रदान करता है तो अमेरिकी कानूनों के तहत वह पहली नजर में ही सजा योग्य अपराध होगा. इसके अलावा यह हर उस व्यक्ति और संस्था के अमेरिका में प्रवेश को भी प्रतिबंधित करता है, जो कभी रिवॉल्यूशनरी गार्ड से जुड़ा हुआ था.

जानकारों की मानें तो अमेरिका का हालिया फैसला आर्थिक रूप से ईरानी सेना यानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड को प्रभावित करेगा. इसकी वजह यह भी है कि ईरान में इस सैन्य बल का व्यापारिक क्षेत्र में खासा प्रभाव है. इसके पास देश और विदेश में सैकड़ों निजी कंपनियों का मालिकाना हक़ है. देश की कुल अर्थव्यवस्था के 20 फीसदी से ज्यादा हिस्से पर उसका नियंत्रण है.

हालांकि, कुछ जानकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक अमेरिका ने ईरान और उसकी सेना पर पहले से ही अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं. ऐसे में पहले ही मुश्किलों में घिरे ईरान के लिए यह फैसला और ज्यादा मुश्किलें बढ़ाता नहीं दिखता. इसलिए अमेरिका के इस फैसले से ईरान उसके आगे झुक जाएगा, इसकी संभावना कम ही नजर आती है.

डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला अमेरिका की मुश्किलें जरूर बढ़ा सकता है

मध्यपूर्व मामलों के कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों की मानें तो ट्रंप के इस फैसले से अब मध्यपूर्व क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों के लिए खतरा बढ़ गया है. अमेरिकी थिंक टैंक ‘रैंड कारपोरेशन’ की चर्चित विशेषज्ञ एरियान एम टैबेटेई अपनी एक टिप्पणी में लिखती हैं, ‘अगर अमेरिका के इस फैसले के बाद ईरान ने भी अपने कहे मुताबिक अमेरिकी एजेंसियों के खिलाफ ऐसा ही फैसला ले लिया तो मध्यपूर्व में स्थित ईरानी सैन्य बल, शिया लड़ाके और अमेरिकी सैनिकों के बीच झड़पें आम बात हो जाएगीं. इस क्षेत्र में सक्रिय अमेरिकी सैनिकों के लिए यह स्थिति खतरनाक है.’

पिछले दिनों कुछ अमेरिकी अखबारों में भी खबर आई थी कि पेंटागन और सीआईए के अधिकारी ट्रंप के इस फैसले के पक्ष में नहीं हैं. इन अधिकारियों ने राष्ट्रपति प्रशासन को सलाह देते हुए कहा था कि रिवॉल्यूशनरी गार्ड को आतंकी संगठन घोषित करना, ईरान को अमेरिका के खिलाफ सख्त कदम उठाने पर मजबूर करेगा और इससे अमेरिकी सैन्य बलों के लिए मध्यपूर्व में खतरा बढ़ जाएगा.

ब्लूमबर्ग से जुड़े कुछ पत्रकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक कुछ साल पहले अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन ने कुछ समय के लिए ईरान के ऊपर से ‘आतंकवाद प्रायोजित देश’ का ठप्पा हटा लिया था क्योंकि तब इराक और लेबनान में काम करने वाले अमेरिकी अधिकारियों के सामने बड़ी परेशानियां खड़ी हो गई थीं. इसकी वजह इन देशों के राजनीतिक दलों और शिया लड़ाकों के ईरानी सेना के साथ घनिष्ठ संबंध थे.

जानकार कहते हैं कि अब तो अमेरिका ने ईरानी सेना को सीधे-सीधे आतंकवादी संगठन ही घोषित कर दिया है. ऐसे में समझा जा सकता है कि यह फैसला किस कदर अमेरिकी अधिकारियों और सैनिकों के लिए इस क्षेत्र में मुश्किलें खड़ी करेगा.