इसी 12 अप्रैल की बात है. उत्तर कश्मीर की बारामुला लोकसभा सीट पर मतदान शांति से निपट जाने के बाद सुरक्षा बल अपनी ड्यूटी से वापस लौट रहे थे. इसी दौरान कुपवाड़ा जिले के लंगेट इलाके में मंडिगाम गांव के बाहर उन पर पथराव किया गया. सुरक्षा बलों ने पैलेट दागे जो कई लोगों को जा लगे. इनमें 13 साल ओवैस मीर भी था. उसे अस्पताल ले जाया गया लेकिन उसकी जान नहीं बचाई जा सकी.

ज़ाहिर है ओवैस के घर वालों के लिए वह क़यामत का दिन था. लेकिन इस हत्या से ओवैस के घर से कोसों दूर कुछ और घरों में भी मातम छा गया था. ये आठ घर मध्य कश्मीर के बडगाम जिले में स्थित हैं. इनमे वही आठ परिवार रहते हैं जिनके परिजन नौ अप्रैल 2017 को सुरक्षा बलों की फायरिग में मारे गए थे. यह हिंसा श्रीनगर सीट पर लोक सभा उपचुनाव के दौरान हुई थी. इस लोक सभा सीट पर 18 अप्रैल को फिर चुनाव होना है. ये लोग तो यही सोचते हैं कि लोग उनके परिजनों को याद करके शायद मतदान के लिए नहीं जाएंगे.

26 साल के शब्बीर अहमद भट्ट भी उस दिन मारे गए थे. वे बडगाम के चडूरा इलाके में रहते थे और अपने घर के बाहर ही एक मतदान केंद्र के सामने सुरक्षा बलों की फायरिंग में मारे गए थे. शबीर के पिता ग़ुलाम मुहम्मद भट्ट कहते हैं कि उनके इलाक़े में कोई वोट नहीं डालेगा क्योंकि उनके बेटे को सब लोग बहुत प्यार करते थे. भट्ट कहते हैं, ‘वो सब को याद है और मुझे नहीं लगता कि हमारे गांव में कोई भी इंसान इस बार वोट डालेगा, जबकि यहां पारंपरिक रूप से अच्छी ख़ासी वोटिंग हुआ करती थी.’

शब्बीर की कमाई के सहारे ही परिवार चलता था. उसकी मौत के बाद इस परिवार के लिए गरीबी और संकट का दौर है. उसके पिता कहते हैं, ‘मेरे छोटे बेटे ने पढ़ाई छोड़ के मजदूरी शुरू कर दी है, क्यूंकि खाने को कुछ नहीं था और घर में दो बिन ब्याही बेटियां हैं.’

मतदान को लेकर गुलाम मोहम्मद भट्ट की भावनाएं समझी जा सकती हैं. आखिर उन्होंने अपना बेटा खोया है. लेकिन क्या वाकई उनके गांव या जिले के बाक़ी लोग शब्बीर और बाकी सात लोगों की याद में वोट देने नहीं जाएंगे?

इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. सत्याग्रह ने बडगाम जिले में कई लोगों से बात की और आने वाले चुनावों को लेकर जमीनी माहौल की थाह लेने की कोशिश की. लेकिन उससे पहले यह जानना ज़रूरी है कि 2017 में क्या हुआ था.

2017 का उपचुनाव

श्रीनगर लोकसभा सीट बडगाम, श्रीनगर और गांदरबल जिलों से मिलकर बनती है. पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के सांसद तारिक हमीद कर्रा के पार्टी से इस्तीफ़े के बाद यह खाली हो गई थी. नौ अप्रैल, 2017 को उपचुनाव रखा गया. लेकिन दुर्भाग्य से यह उपचुनाव अब तक का सबसे हिंसक चुनाव साबित हुआ. यही नहीं, कुल मतदान रहा सात फीसदी. जम्मू-कश्मीर के इतिहास में इतना कम मतदान लोकसभा चुनावों में कभी नहीं हुआ था.

नौ अप्रैल की शाम को राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी शांतमनु ने कहा भी कि दिन अच्छा नहीं रहा. उन्होंने बताया था कि पूरे दिन में अलग-अलग मतदान केंद्रों से हिंसा की लगभग 200 घटनाएं सामने आई थी. इनमें आठ नागरिक मारे गए थे और दर्जनों घायल हुए थे. शांतमनु ने बताया था कि 12.6 लाख मतदाताओं में से सिर्फ 80 हजार वोट डाल सके.

यह सब तब हुआ था जब सरकार ने पहले से तैनात सुरक्षा बलों के अलावा 168 अतिरिक्त कंपनियां तैनात की थीं. ‘अनंतनाग एक बड़ी चुनौती है अब, नौ अप्रैल की शाम को शांतमनु ने पत्रकारों को श्रीनगर में बताया था.’ और हुआ भी वही. हालात ये हो गए कि 12 अप्रैल को अनंतनाग लोक सभा सीट पर होने वाले उपचुनाव स्थगित कर दिए गए थे. इसके बाद 26 मई को श्रीनगर सीट के हिंसाग्रस्त 38 मतदान केंद्रों पर फिर से वोट पड़े. इस बार हिंसा तो नहीं हुई लेकिन मतदान सिर्फ दो प्रतिशत हुआ, जो एक नया रिकॉर्ड था.

तब से अब तक दो साल बीत गए हैं. जहां देखने में ऐसा लगता है कि जमीनी पर हालात में कोई ज़्यादा सुधार नहीं आया है वहीं लोगों से बात करें तो संकेत कुछ अलग मिलते हैं.

कैसा होगा इस बार का चुनाव?

बडगाम में दो दिन बिताने और अन्य लोगों से बात करने के बाद लगता है कि शायद अब वैसा नहीं होगा जैसा तब हुआ था. शब्बीर के घर से सिर्फ एक किलोमीटर दूर खड़े होकर भी हमें उनके घर का पता किसी से नहीं मिल पा रहा था.

‘यहां हुई थी कोई हत्या’, ‘मुझे नहीं लगता यहां ऐसा कोई रहता है’, ‘वो हत्याएं तो शायद दूसरे गांव में हुई थीं’ जैसे जवाब लोगों के मुंह से सुनना हैरानी में डालने वाला था क्योंकि कश्मीर के गांव-देहात में लोगों को मारे गए लोगों के बारे में सब पता होता है और वे आपको हाथ पकड़ के ऐसे घरों तक ले जाते हैं.

तो बडगाम में ऐसा क्यों है? इस सवाल पर वकील और 1987 के विधानसभा चुनाव लड़ चुके अब्दुल रशीद हंजूरा का सत्याग्रह से कहना था, ‘लोगों की याद्दाश्त बहुत कमजोर होती है. ऐसा सदियों से चला आया है. लोग भूल जाते हैं और इस बार भी लोग भूल गए हैं. मुझे ऐसा लगता है कि लोग मतदान के लिए निकलेंगे और ठीक-ठाक संख्या में निकलेंगे.’

हंजूरा ने लेकिन यह नहीं बताया कि लोग 2017 में नहीं निकले थे तो अब क्यों निकलेंगे. इस बात का जवाब सत्याग्रह ने कई लोगों से जानने की कोशिश की और उनमें से एक और वकील थे, जिन्होंने किसी हद तक बात को समझने लायक बना दिया. चाडूरा सिटी कोर्ट में काम कर रहे गुलाम मुहम्मद बाबा का कहना था कि लोगों में पीडीपी के प्रति आक्रोश है. पीडीपी ने भाजपा के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर में करीब तीन साल सरकार चलायी थी. पिछले उपचुनाव भी इसी सरकार में हुए थे.

गुलाम मोहम्मद बाबा ने बताया, ‘सबसे ज़्यादा गुस्सा लोगों में इस बात को लेकर है कि पीडीपी ने भाजपा को कश्मीर का रास्ता दिखा दिया, उसके साथ गठबंधन करके. फिर असैनिक हत्याएं, महबूबा मुफ़्ती का रवैय्या और बहुत सारी चीज़ें हैं जिन्होंने लोगों का रुख नेशनल कॉन्फ्रेंस की तरफ कर दिया है.’ उन्होंने आगे जोड़ा, ‘18 अप्रैल को चुनाव में लोग मतदान के लिए निकलेंगे और सिर्फ पीडीपी को हराने की नीयत से निकलेंगे. लेकिन यह सिर्फ गांव देहात में होगा. मुझे लगता है शहरी इलाको में लोग वोट डालने नहीं निकलेंगे.’

लेकिन चिंता का विषय सिर्फ बडगाम नहीं है. गांदरबल जिले (जहां लोग पारंपरिक रूप से वोट डालते आए हैं) पर भी प्रशासन की कड़ी नज़रें होंगी.

गांदरबल क्यों?

कश्मीर घाटी में मिलिटेंसी के अभी चल रहे नए दौर में गांदरबल जिले ने काफी समय तक कोई भाग नहीं लिया. लेकिन 26 मई 2018 को कुछ ऐसा हुआ जिसने लोगों को चौंका दिया. दक्षिण कश्मीर के शोपियां जिले में सुरक्षा बलों और मिलिटेंट्स के बीच एक मुठभेड़ में जो पांच मिलिटेंट्स मारे गए थे उनमें डॉ मुहम्मद रफी भट्ट का नाम भी था. गांदरबल निवासी रफी भट्ट ने असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर कश्मीर यूनिवर्सिटी में पढ़ाया था और एक दिन पहले ही मिलिटेंसी ज्वाइन की थी. इस घटना के बाद गांदरबल में भारी विरोध प्रदर्शन हुए. हजारों की संख्या में लोग रफी के जनाजे में उमड़े.

फिर इस साल सात अप्रैल को शोपियां जिले में ही हुई एक और मुठभेड़ में एक और मिलिटेंट की शिनाख्त गांदरबल जिले के राहील रशीद भट्ट के रूप में हुई. राहील भी सिर्फ एक दिन पहले घर से गायब हुआ था. फिर से प्रदर्शन हुए. दो दिन तक गांदरबल बंद रहा और असर रफी की मौत से खासा ज़्यादा रहा.

क्या ये दो लोग रफी और राहील, गांदरबल में अब भी मतदान पर कोई असर डालते दिखाई देंगे. वहां के एक वरिष्ठ पत्रकार ऐसा नहीं मानते हैं. वे कहते हैं, ‘एक तो ये लोग दूरदराज़ के गांव के रहने वाले थे और दूसरा ये कि गांदरबल हमेशा से वोट करता आया है और मुझे लगता है इस बार भी वो वोट देने निकलेंगे.’

लेकिन गांदरबल में आम लोग क्या कहते हैं? सत्याग्रह ने शहर में काफी लोगों से बात की. ज़्यादातर ने वोट न देने की बात कही. पेश से दुकानदार गुलाम नबी लोन का कहना था, ‘वोट देने का क्या मतलब बनता है जब हर तरफ खूनखराबा हो, हमारे बच्चे मारे जा रहे हों, चुनाव कश्मीर का समाधान नहीं हैं बातचीत है और वो कोई कर नहीं रहा है.’ वे यह भी दावा करते हैं कि लोगों को रफी और राहील याद हैं और वे उनके साथ दगा नहीं करेंगे.

बडगाम और गांदरबल के अलावा श्रीनगर ज़िला इस सीट का हिस्सा है, जहां ज्यादातर इलाकों में लोग वोट डालने नहीं निकलते और इस बार भी निकलते नहीं दिखाई दे रहे. स्थानीय पत्रकार दनिश नबी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘हां शहर के आसपास के इलाकों में थोड़ी वोटिंग हो सकती है, लेकिन श्रीनगर में नहीं. श्रीनगर में मिलिटेंसी का असर ज्यादा नहीं है लेकिन अलगाववादी भावनाएं भरपूर हैं, खास तौर पर पुराने शहर में.’ दानिश दूसरी वजह यह बताते हैं कि शहर के लोग अक्सर मतदान से दूर ही रहते हैं. वे कहते हैं, ‘उनके लिए छुट्टी का दिन होता है ये.’

सुरक्षा अधिकारी क्या कहते हैं?

सत्याग्रह ने कई सुरक्षा अधिकारियों से इस विषय पर बात की, लेकिन हमेशा की तरह वे चुनावों के बारे में खुलकर बात करने से कतराते दिखे. कई लोगों ने इस शर्त पर बात की कि उनका नाम न छापा जाए. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने सत्याग्रह को बताया कि श्रीनगर लोक सभा सीट पर होने वाले चुनाव ठीक-ठाक ढंग से होते दिखाई दे रहे हैं. उनका कहना था, ‘हम कोई कसर नहीं छोड़ रहे. हालात काफी हद तक सुधर गए हैं, खासतौर पर बडगाम जिले में जहां पिछली बार हिंसा हुई थी. मुझे नहीं लगता इस बार ऐसा कुछ होगा.’

उनका यह भी कहना था कि पत्थरबाजी कम हो गयी है और बडगाम में मिलिटेंटों की तादाद भी. लेकिन वे साथ ही साथ यह भी कहते दिखाई दिये कि उनको भी सतर्क रहने की ज़रूरत है. उनका कहना था, ‘थोड़ा सुकून इस बात से मिलता है कि 12 अप्रैल को बारामुला में चुनाव शांति से निपट गए थे और मतदान भी ठीक-ठाक हुआ था. बाकी तो अब 18 तारीख को ही पता चलेगा.’ बाकी अफसर भी यही उम्मीद जताते दिखाई दिए.

अब होगा जो भी, पता तो 18 तारीख को ही चलेगा. फिलहाल तो 10 उम्मीदवार, जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला भी शामिल हैं, अपने भविष्य के लिए फिक्रमंद हैं जिसका फैसला 18 अप्रैल को इलाके के 12.9 लाख मतदाता वोट डालकर या न डालकर करेंगे.