दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के बीच लोकसभा चुनावों को लेकर गठबंधन की बातचीत लंबे समय से चल रही है. इस दौरान यह प्रक्रिया कई बार आगे गई तो कई बार पीछे. कभी ऐसा हुआ कि कांग्रेस की ओर से गठबंधन की संभावना पर लगभग पूर्णविराम लगा दिया गया तो कभी आप की ओर से यही बात दोहराई गई. लेकिन दोनों पार्टियों के एक मजबूत धड़ा ऐसा है जो मानता है कि अगर दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराना है तो कांग्रेस और आप को एक साथ आना होगा.

दोनों पार्टियों के ऐसे लोगों की वजह से अंदर ही अंदर गठबंधन को लेकर लगातार बातचीत चल रही है. इसमें ताजा स्थिति यह है कि यह बातचीत नई शर्तों पर आ गई है. हाल तक अरविंद केजरीवाल की आप इस बात पर अड़ी थी कि वह कांग्रेस को दिल्ली में तीन सीटें तब ही देगी जब उसे हरियाणा में कांग्रेस तीन सीटें दे. लेकिन कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई. इसके बाद आप ने हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया.

अब फिर से आप और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बात चल रही है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी चाहते हैं कि यह गठबंधन हो. यही इच्छा अरविंद केजरीवाल भी सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक ऐसे में अब दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की बातचीत इस शर्त पर चल रही है कि आप चार सीटों पर चुनाव लड़े और कांग्रेस तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे.

हालांकि, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के एक नेता की मानें तो आप अब भी पांच सीटें मांग रही है. सत्याग्रह से बातचीत में वे बताते हैं, ‘आप अब ये कह रही है कि दूसरे राज्यों में आपने हमारे साथ गठबंधन नहीं किया, इसलिए अब दिल्ली में हमें पांच सीटें चाहिए. लेकिन उन्हें भी मालूम है कि उनकी यह मांग व्यावहारिक नहीं है. कांग्रेस चार सीटें देने को तैयार है.’

सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी एक ट्वीट करके यह जानकारी दी कि पार्टी दिल्ली में आप को चार सीटें देने को तैयार है. एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि अगर दिल्ली में कांग्रेस और आप का गठबंधन हो जाता है तो भाजपा की बुरी हार तय है. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस चार सीटें आप को देने को तैयार है लेकिन अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर से यूटर्न ले लिया है. उन्होंने यह भी लिखा कि कांग्रेस के दरवाजे खुले हैं लेकिन, समय निकलता जा रहा है.

इसके बाद एक जवाबी ट्वीट आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल की ओर से भी आया. इसमें उन्होंने लिखा, ‘कौन सा यूटर्न? अभी तो बातचीत चल रही थी. आपका ट्वीट दिखाता है कि गठबंधन आपकी इच्छा नहीं मात्र दिखावा है. मुझे दुख है आप बयानबाजी कर रहे हैं. आज देश को मोदी-शाह के खतरे से बचाना अहम है. दुर्भाग्य कि आप उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी मोदी विरोधी वोट बांट कर मोदी जी की मदद कर रहे हैं.’

असल मे सूत्रों की मानें तो आप की ओर से अब भी यह कोशिश चल रही है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन सिर्फ दिल्ली के लिए ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों के लिए भी हो. हरियाणा में भले ही आप का गठबंधन जननायक जनता पार्टी से हो गया हो, लेकिन कांग्रेस को भी इस गठबंधन में लाने की कोशिशें चल रही हैं. पंजाब में आप अपने उम्मीदवार इस बार गठबंधन के तहत ही उतारने को इच्छुक है. लेकिन कांग्रेस दिल्ली से बाहर की कोई बातचीत करने को तैयार नहीं है. उसने एक तरह से यह शर्त ही रख दी है कि पहले दिल्ली का गठबंधन तय किया जाए, बाद में दूसरे राज्यों का देखा जाएगा.

इस बीच ट्विटर पर दोनों दलों के सर्वोच्च नेताओं के बीच चली जंग का कुछ लोग यह मतलब निकालने लगे हैं कि अब गठबंधन की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं. लेकिन मंगलवार की सुबह तक कांग्रेस और आप, दोनों पार्टियों के नेता अनौपचारिक बातचीत में यह दावा करते रहे कि दोनों दलों की ओर से एक-दूसरे पर यह दबाव बनाने की रणनीति है और दोनों दल यह जानते हैं कि गठबंधन कितना जरूरी है. ऐसे में गठबंधन की सारी संभावनाएं खत्म हो गई हैं, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी.

इन नेताओं के मुताबिक बहुत संभव है कि 4-3 के फाॅर्मूले पर ही सहमति बने क्योंकि कांग्रेस तीन सीट से नीचे जाने को तैयार नहीं है. एक कांग्रेसी नेता ने यह भी बताया कि अरविंद केजरीवाल के लिए यह गठबंधन ज्यादा महत्वपूर्ण है. उनका कहना है कि अगर दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ीं और आप का खाता भी नहीं खुला तो दिल्ली में आठ-नौ महीने के अंदर होने वाले विधानसभा चुनावों में उनके लिए दिल्ली की सत्ता बरकरार रख पाना बेहद मुश्किल हो जाएगा. क्योंकि इससे उनके खिलाफ एक नकारात्मक माहौल बनेगा.

कांग्रेस के कुछ नेताओं को यह भी लग रहा है कि लोकसभा में गठबंधन के प्रयोग को आजमाने के बाद इसे आगे भी बरकरार रखा जा सकता है. इन नेताओं को यह लगता है कि अगर लोकसभा चुनावों में इस गठबंधन को सफलता मिलती है तो विधानसभा चुनावों में भी इसे बरकरार रखते हुए कांग्रेस दिल्ली की सत्ता में गठबंधन के सहारे आ सकती है.

आप की एक मांग यह भी है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की उसकी मांग का कांग्रेस समर्थन कर दे. इसके लिए वह कांग्रेस पर दबाव बनाए हुए है कि वह अपने घोषणापत्र में संशोधन करे. कांग्रेस सूत्रों की मानें तो कांग्रेस घोषणापत्र में अलग राज्य पर स्पष्ट वादा करने के बजाए संभवतः यह कहेगी कि वह इस मसले पर एक समिति बनवाकर उचित निर्णय लेगी.

कहा जा रहा है कि अगर कांग्रेस इतना भी कर देती है कि तो आप की बात आंशिक तौर पर रह जाएगी और उसकी उतनी राजनीतिक किरकिरी नहीं होगी. फिर पार्टी चुनावों में यह दावा कर पाएगी कि उसके दबाव में कांग्रेस ने पूर्ण राज्य की मांग का समर्थन कर दिया. आम आदमी पार्टी को लगता है कि इस बार के चुनावों में उसे इस मुद्दे पर सबसे अधिक लाभ मिल सकता है.

दरअसल, दोनों पार्टियों के अधिकांश नेताओं को लगता है कि अगर गठबंधन नहीं हुआ तो भाजपा दिल्ली की सातों सीटों पर जीत हासिल कर सकती है. लेकिन अगर गठबंधन हो गया तो यह स्थिति उलट भी सकती है. उम्मीद की जा रही है कि अगले एक-दो दिनों में कांग्रेस और आप औपचारिक गठबंधन की घोषणा कर दें.