सत्रहवीं लोकसभा के लिए मतदान जारी है. पहले तीन चरणों के लिए चुने गए निर्वाचन क्षेत्रों में बहुत से लोग मतदान कर चुके हैं. ग़ाज़ियाबाद में रहने वाले आईटी इंजीनियर रितेश गुप्ता ने मतदान नहीं किया. उनका कहना है कि सरकार किसी की भी बने, यहां बदलना कुछ भी नहीं है. उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्र में विभिन्न पार्टियों के प्रत्याशियों की भी कोई जानकारी नहीं है. जब उनसे पूछा गया कि क्या वे जानते हैं कि एक सांसद की उसके निर्वाचन क्षेत्र के प्रति क्या ज़िम्मेदारियां हैं, वे कहते हैं, ‘ये लोग किसी भी पार्टी के हों, बस अपने बारे में सोचते हैं या फिर अपनी जान-पहचान के लोगों को सरकारी फ़ायदे दिलवाते हैं. जनता की ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेता.’

जनप्रतिनिधियों के लिए इस तरह का नज़रिया सिर्फ रितेश का नहीं है. हर गांव, क़स्बे और शहर में ऐसे ही तंज सुनने को मिलते हैं. ऐसा क्यों है, हम सभी जानते हैं. फिर भी, बेहतर प्रशासन और सरकारी जवाबदेही के लिए काम कर रहे रिसर्च ग्रुप अकाउंटेबिलिटी इनीशिएटिव के शोधकर्ताओं बाला पोसानी और यामिनी अय्यर के शब्दों में इसे समझते हैं. ‘संस्थागत मानकों के लिहाज़ से भारतीय लोकतंत्र बेहद अनुकरणीय नज़र आता है. लेकिन इसके बावजूद अगर किसी का साबका भारत के सरकारी अस्पतालों, स्कूलों, पुलिस स्टेशन, स्थानीय न्यायालयों, बिजली-पानी आपूर्ति के दफ़्तरों या राशन की दुकानों से पड़ा होगा तो वह बताएगा कि ऐसा ‘कुछ’ तो है जिसके चलते सारे संस्थागत मानक व्यवहारिकता की ज़मीन तक आते-आते अनुकरणीय होने के आस-पास भी नहीं फटकते.’

वे और आगे लिखते हैं, ‘स्वास्थ्य केंद्रों पर हमें अयोग्य चिकित्सक मिलते हैं जिनका इलाज रोगी की जान ही दांव पर लगा देता है. बेपरवाह अध्यापक मिलते हैं जो अक्सर स्कूल से ग़ैरहाज़िर रहते हैं. भ्रष्ट अफ़सर दिखाई देते हैं जो सरकारी योजनाओं के झूठे दस्तावेज बना रहे होते हैं. पुलिस अपनी ताक़त के दुरुपयोग से अक्सर हैरान करती है. सड़कें बनती भी हैं तो उनका रख-रखाव ठीक नहीं होता… और यह सूची ख़त्म ही होती नहीं दिखती.’ हम सब कभी न कभी ज़रूर सोचते हैं कि इन सब कमियों को दूर करने का आख़िर क्या उपाय हो सकता है? मतदान न करना तो बिलकुल नहीं. बल्कि भारी संख्या में सोच-समझकर मतदान करना इन चुनौतियों से निपटने का पहला उपाय है. और इसका अगला क़दम है चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही तय किया जाना.

हम पीछे देखें तो साल 2003 तक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की दिलचस्पी भी सरकारी तंत्र की जवाबदेही सुनिश्चित करने को लेकर काफी बढ़ चुकी थी. वर्ल्ड बैंक की साल 2004 की वर्ल्ड डिवेलपमेंट रिपोर्ट ग़रीबों को मिलने वाली जनसेवाओं में सुधार के लिए राज्य की जवाबदेही पर ही केंद्रित थी. इसके बाद अलग-अलग लोकतांत्रिक देशों में जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्थाओं को जांचते हुए कई शोधपत्र लिखे गए. पिछले साल, प्रतिष्ठित सेज पब्लिकेशन से प्रकाशित होने वाले जर्नल ऑफ़ साउथ एशियन डिवेलपमेंट में भारत पर भी इस तरह का एक विस्तृत शोधपत्र लिखा गया. येल यूनिवर्सिटी के हैरी ब्लेयर द्वारा किये गये इस शोध में सरकार की ओर से नियत और सिविल सोसाइटी की कोशिशों से निकले उन तरीक़ों का ज़िक्र है जिन्हें भारत में इस्तेमाल तो किया जा रहा है लेकिन बहुत ही सीमित स्तर पर.

जवाबदेही तय करने का लंबा रास्ता

ब्लेयर के मुताबिक़ सरकारी जवाबदेही तय करने के दो रास्ते हैं. इन्हें वर्ल्ड बैंक रूट भी कहा जाता है. इनमें से पहला है लॉन्ग रूट या लंबा रास्ता. इस रास्ते की पहली व्यवस्था है समय-समय पर होने वाले चुनाव जहां आम नागरिक मतदान के ज़रिए उन प्रतिनिधियों को चुनता है जिनसे वह बेहतर नीतियां बनाने की उम्मीद रखता है. ये चुने हुए प्रतिनिधि क़ानून व नीतियां बनाते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि सरकारी मशीनरी इन नीतियों को ज़मीन पर लागू करे. यह रास्ता लंबा है क्योंकि सही काम न करने वाले नेताओं को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए जनता को पांच साल इंतज़ार करना पड़ता है.

लंबे रास्ते की दूसरी व्यवस्था है, जनहित याचिका जिसके माध्यम से कार्यपालिका की बजाय न्यायपालिका की मदद से सरकारी तंत्र को ज़रूरी फ़ैसले लेने और उन्हें लागू करने के लिए मजबूर किया जा सकता है. उदाहरण के लिए 90 के दशक में दिल्ली में वायु प्रदूषण बढ़ जाने पर दिल्ली नगर निगम के खिलाफ जनहित याचिका दायर की गई ताकि वह 15 साल पहले साफ हवा के लिए बन चुके कानूनों को लागू करे. इसी मामले में फ़ैसला आने के बाद दिल्ली की सभी बसों में सीएनजी के इस्तेमाल जैसे कई क़दम उठाए गए और हवा में प्रदूषण का स्तर काफी कम हुआ.

जवाबदेही तय करने का छोटा रास्ता

दूसरा रास्ता है शॉर्ट रूट या छोटा रास्ता जहां जनता जनप्रतिनिधियों की बजाय सीधे उन सरकारी कर्मचारियों से संवाद करती है जिनके ज़िम्मे ज़मीन पर जनसेवाएं उपलब्ध कराने का काम होता है. इस रास्ते में नागरिकों के पास कई व्यवस्थाएं हैं.

  • 24 घंटे काम करने वाली फ़ोन-लाइनें: हालांकि भारत के ज़्यादातर सरकारी दफ़्तरों में इस तरह की सुविधा नहीं है जहां नागरिक सीधे फ़ोन कर अपनी समस्या बता सके और उसका तय समय पर निपटारा हो सके. पर जिन कुछ जगहों पर ऐसे प्रयास शुरू किये गये उनमें से एक है हैदराबाद. 90 के दशक में यहां के वॉटर एंड सीवेज बोर्ड के मैनेजिंग डायरेक्टर ने इस तरह की सुविधा की शुरूआत की जिसमें नागरिकों की समस्याओं का निपटारा चार दिन के भीतर किया जाना तय किया गया. इस शुरुआत के बाद न सिर्फ नागरिकों को राहत हुई बल्कि विभाग को मिलने वाला राजस्व भी दोगुना हो गया. बेहतर सुविधा मिलने के बाद ज़्यादा नागरिक अपने बिल समय पर देने लगे थे. हम भी अपने प्रतिनिधियों और सरकारी अफ़सरों से इस तरह की सुविधाओं की मांग कर सकते हैं.
  • सूचना का अधिकार: साल 2005 में बना सूचना के अधिकार का क़ानून नागरिकों को यह अधिकार देता है कि वे किसी भी तरह की सूचना किसी भी विभाग से मांग सकते हैं, बशर्ते वह देश की सुरक्षा, न्याय व्यवस्था और संप्रभुता को ख़तरे में न डालती हो. इस अधिकार के तहत सिर्फ सूचना ही नहीं, निर्माण सामग्री के नमूने व रूपरेखा की भी मांग की जा सकती है. लेकिन पारदर्शी लोकतंत्र के लिए लड़ाई का एक मजबूत हथियार होने के बावजूद यह इस्तेमाल करने वालों के लिए डर का सबब भी बन चुका है. इन्हें उन जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों/अधिकारियों से बदला लिए जाने का ख़तरा रहता है जिनकी ग़लत कारगुज़ारियों का ये पर्दाफ़ाश कर रहे होते हैं.
  • सोशल ऑडिट: सोशल ऑडिट एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत सोशल ऑडिट करने वाली टीम आरटीआई का प्रयोग कर किसी भी सरकारी योजना से जुड़ी जानकारी निकालकर उसका मिलान जनता से मिली जानकारी के साथ करती है. केंद्र सरकार की रोज़गार गारंटी योजना मनरेगा से जुड़े कानून में सोशल ऑडिट का प्रावधान है. इसके तहत हर छह महीने में सोशल ऑडिट टीम सूचना के अधिकार का प्रयोग कर रोज़गार के सरकारी मस्टर पर मौजूद जानकारी निकालती हैं. इसके बाद ग्राम सभा की बैठक बुलाई जाती है जहां उन सभी की मौजूदगी में जिन्हें मनरेगा के तहत काम मिला है, सरकारी मस्टर को ऊंची आवाज़ में पढ़ा जाता है. जिससे कि मज़दूर अपने जॉब कार्ड में दर्ज जानकारी को मस्टर में मौजूद जानकारी से मिलाकर देख सकें. मिलान न हो सकने की स्थिति में मज़दूर यह जानकारी ऑडिट टीम को दे सकता है, और इस पर कार्रवाई की जा सकती है. इस तरह के ऑडिट अन्य योजनाओं के लिए भी अनिवार्य बनाए जा सकते हैं.
  • पार्टिसिपेटरी बजटिंग: राज्य और स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने के मामले में इस व्यवस्था को सबसे कारगर कहा जा सकता है. यहां नागरिक सीधे या अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के ज़रिए यह तय कर सकता है कि मुख्य बजट या नगर निगम के बजट का एक निश्चित हिस्सा किस-किस मद में खर्च किया जाये. 1989 में ब्राज़ील में इस्तेमाल होना शुरू हुई यह व्यवस्था भारत के केरल में प्रयोग में लाई गई. साल 1996 में राज्य के पीपुल्स कैंपेन फ़ॉर डेमोक्रेटाइज़्ड प्लानिंग के तहत 1100 ग्राम, ब्लॉक और ज़िला पंचायतों और 65 नगर निगमों और नगर पालिकाओं में इसे लागू किया गया. यहां हर साल वॉर्ड स्तर पर ग्राम सभा की बैठक होती है जहां उस साल होने वाले ज़रूरी कामों की प्राथमिकताएं तय की जाती हैं. प्रशिक्षित लोग इन बैठकों में लोगों की मदद करते हैं. अगले स्तर पर चुने हुए नागरिक इन प्राथमिकताओं के आधार पर सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर कामों की योजना बनाते हैं. इस योजना को लागू किया जा सकता है या नहीं, तकनीकी स्तर पर यह जांचा जाता है. इस बारे में हरी झंडी मिलने पर पंचायत की देख-रेख में योजना को लागू किया जाता है. जनता की मांग पर इस व्यवस्था को देश के बाकी हिस्सों में लागू किया जा सकता है.

सिविल सोसाइटी की मदद से तय किए जा सकने वाले रास्ते

  • सिविल सोसाइटी एडवोकेसी: सिविल सोसाइटी संस्थाएं किसी ख़ास मुद्दे पर क़ानून बनवाने के लिए जनता के मुद्दों को जनप्रतिनिधियों तक ले जाकर उन्हें उस मुद्दे पर क़ानून बनाने की पहल करने के लिए प्रेरित करती हैं. मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में यह तरीक़ा ख़ूब अपनाया जाता रहा है.
  • नागरिक रिपोर्ट कार्ड: नागरिक रिपोर्ट कार्ड सोशल ऑडिट जैसी ही व्यवस्था है जिसमें सिविल सोसाइटी के सदस्य किसी भी जनसुविधा की गुणवत्ता का आकलन कर इसकी रिपोर्ट संबंधित विभाग को सौंप सकते है. पर अभी तक इस व्यवस्था को किसी क़ानून का संरक्षण नहीं दिया गया है. कुछ जनप्रतिनिधि अपने आप ही इस तरह के रिपोर्ट कार्ड बनवाते रहे हैं.
  • नागरिक रिव्यू बोर्ड: यह नागरिकों का एक ऐसा समूह होता है जो सरकारी राशन की दुकानों जैसी व्यवस्थाओं में कीमत, गुणवत्ता और भ्रष्टाचार पर नज़र रखकर उन्हें जवाबदेह बनाए रखता है. 90 के दशक में मुंबई में इस तरह के रिव्यू बोर्ड के उदाहरण देखे गए हैं.
  • रेज़िडेंट वैलफेयर असोसिएशन: भारत के शहरों की कॉलोनियों में पिछले कुछ दशकों में पनपी ये सिविल सोसाइटी संस्थाएं, सरकार और नागरिकों के बीच एक कड़ी की तरह का काम करती हैं. ये संस्थाएं सफ़ाई, बिजली और पानी जैसी प्राथमिक सुविधाओं की योजना बनाने और इनकी आपूर्ति सुनिश्चित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.

इन सभी व्यवस्थाओं के बावजूद भारत में नेताओं और अधिकारियों की जवाबदेही तय कर पाना आसान नहीं है. पब्लिक अफ़ेयर्स सेंटर, बैंगलोर के सेमुएल पॉल के मुताबिक़, ‘फिर भी भारत में सार्वजनिक जवाबदेही की हालत बहुत अच्छी नहीं है. जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्थाएं बनाई गई हैं, पर ज़रूरी नहीं कि वे काम करें हीं. कई अच्छे क़ानून बनाए गए हैं लेकिन उन्हें सही तरह से लागू किए जाने और उनकी निगरानी की व्यवस्थाएं नहीं हैं. सरकारी संस्थाओं को अधिकार और फ़ंड दोनों दिए गए हैं, पर उनके काम का सही निरीक्षण और उसे सुधारने के लिए ज़रूरी क़दम उठाए जाने की सही व्यवस्था नहीं दिखती. खातों के पब्लिक ऑडिट और संसद की समीक्षा होती है, लेकिन उनके निर्देश पर उठाए जाने वाले क़दम काफी नहीं होते. यह साफ है कि जवाबदेही तय करने वाली औपचारिक व्यवस्थाओं के होने भर से ज़मीनी स्तर पर जवाबदेही नहीं तय की जा सकती.’ तब फिर बिल्ली के गले में घंटी कैसे बंधेगी? एक्सपर्ट्स कहते हैं कि लोकतंत्र एकतरफ़ा सड़क नहीं है. ज़िम्मेदार नागरिकों और ज़िम्मेदार मीडिया के बिना ज़िम्मेदार जनप्रतिनिधियों की उम्मीद नहीं की जा सकती.