भारत में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता पर चर्चा का सिलसिला बहुत पुराना है. लेकिन यह चर्चा हमेशा कहीं पहुंचे बिना खत्म होती रही है. 2019 के लोकसभा चुनावों के बीच में इस चर्चा ने एक बार फिर से जोर पकड़ा है. मजे की बात यह है कि इस बार बहस की वजह वह चुनावी बॉन्ड (इलेक्टोरल बॉन्ड) ही है, जिसके बारे में दावा किया गया था कि यह भारतीय चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगा देगा.

चुनावी चंदे की यह बहस इस बार तब सुर्खियों में तब आई, जब एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म (एडीआर) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनावी बॉन्ड की वैधता को लेकर एक याचिका दायर की. एडीआर की दलील थी कि इसके चलते राजनीतिक चंदा लेना पहले से भी ज्यादा अपारदर्शी हो गया है और इसका अधिकांश सत्तारुढ़ दल - भारतीय जानता पार्टी - को ही मिला है.

हालिया समय में कई तरह की आलोचनाओं के घेरे में रहे चुनाव आयोग ने भी सुप्रीम कोर्ट में दिये अपने हलफनामे में कहा कि चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था के बाद राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता बिल्कुल ध्वस्त हो गई है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने इन बॉन्ड्स पर रोक लगाने से तो इन्कार कर दिया, लेकिन राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे 30 मई तक इसके जरिये मिलने वाले चंदे का पूरा ब्यौरा चुनाव आयोग के सामने पेश करें. उसने चंदे में मिली राशि के अलावा इसे देने वाले का नाम भी सीलबंद लिफाफे में देने को कहा है.

चुनावी बॉन्ड राजनीतिक पारदर्शिता बढ़ा रहे हैं या इसे कम कर हैं? इस बहस से पहले यह जानना जरूरी है कि चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था है क्या?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 2018 में एक वित्त विधेयक के जरिये चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था बनाई है. इसमें यह प्रावघान है कि बैंक एक हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ के चुनावी बॉन्ड जारी करेंगे और इन्हें खरीदकर राजनीतिक दलों को चंदा दिया जा सकेगा.

चुनावी बॉन्ड आने से पहले राजनीतिक दलों को अपने आय विवरण में केवल उन्हीं चंदों का जिक्र करना होता था जो 20 हजार से ऊपर के होते थे. इससे कम की राशि को राजनीतिक दल नकद ले सकते थे. इससे चंदे के स्रोत का पता नहीं चल पाता था. सरकार का दावा था कि चुनावी बॉन्ड के जरिये चंदे अधिक साफ-सुथरे होंगे और उनमें काले धन का इस्तेमाल खत्म हो जाएगा.

चुनावी बॉन्ड की खरीद के लिए नियम यह है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से कोई भी यह बॉन्ड खरीद सकता है. ऐसा करते समय उसे एक केवाईसी फार्म भरना पड़ेगा. यानी कि चुनावी बॉन्ड खरीद कौन रहा है बैंक को इसकी जानकारी होगी, लेकिन वह इस जानकारी को प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग या किसी अन्य संस्था को नहीं दे सकता है. इसके अलावा बॉन्ड पर किसी का कोई नाम नहीं होगा. यानी कि बॉन्ड खरीदने वाला, इसे किस पार्टी को देगा यह जानकारी बैंक के पास नहीं होगी. और राजनीतिक दलों के लिए भी यह अनिवार्य नहीं है कि वह उस संस्था या व्यक्ति का खुलासा करें, जिसने उन्हें चुनावी बॉन्ड के जरिये चंदा दिया है. पार्टियों को केवल इस बात का खुलासा करना होगा कि उन्हें इलेक्टरोल बॉन्ड के जरिये इतना पैसा मिला, यह पैसा किसने दिया है इस बात का नहीं.

चुनावी बॉन्ड की व्यवस्था लागू होने के बाद अब कोई भी दल दो हजार से ऊपर का चंदा नकद नहीं ले सकता है, जबकि पहले यह रकम बीस हजार थी. चूंकि बॉन्ड के जरिये पार्टियों को मिलने वाला चंदा अकाउंटेड ( बैंक के हिसाब-किताब में) होगा इसलिए इस व्यवस्था को नकद चंदे वाली व्यवस्था से बेहतर कहा जा सकता है.

लेकिन, बैंकों से जारी होने के बाद भी चुनावी बॉन्ड पर गोपनीयता के इतने आवरण चढ़ा दिए गए हैं कि इस क्षेत्र के जानकारों को ये अपने घोषित उद्देश्य पर खरे उतरते नहीं दिख रहे हैं. आर्थिक जानकार कहते हैं कि एकबारगी यह मान भी लिया जाए कि बॉन्ड के जरिये आने वाला पैसा बैकिंग व्यवस्था के जरिये आएगा, लेकिन ये बॉन्ड एक तरह के कैश कूपन हैं और कोई भी इन्हें खरीदकर गोपनीय तरीके से किसी भी राजनीतिक पार्टी को दे सकता है. ऐसे में यह किस तरह के स्रोत से आने वाला कैसा पैसा है इसका पता आसानी से नहीं चलता है.

लेकिन फिर भी जानकार यह मानते हैं कि यह व्यवस्था चंदे में काले धन के इस्तेमाल को उस तरह से बढ़ावा नहीं देती है. क्योंकि इलेक्टोरल बॉन्ड देने वाले बैंक से इसकी जानकारी सरकार तक पहुंच ही सकती है. चूंकि अभी भी सियासी दल दो हजार से नीचे की रकम नकद ले सकते हैं, ऐसे में कोई व्यक्ति-पार्टी काले धन को चंदे के रूप में देना-लेना चाहे तो उसका सबसे सुरक्षित रास्ता यही है. जानकार चुनावी बॉन्डों को राजनीतिक डील आदि को बेहद आसान बना सकने वाली व्यवस्था के रूप में देखते हैं जो हमेशा ही सत्ताधारी दल को फायदा पहुंचाएंगे. उदाहरण के तौर पर इनके जरिये कोई भी कंपनी सत्ताधारी पार्टी को बड़ी आसानी और कानूनी तरीके से रिश्वत दे सकती है.

एक आरटीआई आवेदन के मुताबिक, मार्च 2018 से जनवरी 2019 तक राजनीतिक पार्टियों को लगभग पूरा चंदा (99.8 फीसदी) चुनावी बॉन्ड के रूप में ही मिला है. और इस चंदे की 95 फीसद रकम भाजपा के हिस्से में आई है. नवंबर 2018 में भाजपा ने चुनाव आयोग के सामने जो ब्यौरा पेश किया था, उसके मुताबिक तब तक उसके पास चुनावी बॉन्ड के रूप में 201 करोड़ से ज्यादा का चंदा आया था. जबकि तब तक देश में महज 222 करोड़ के ही चुनावी बॉन्ड की ब्रिकी हुई थी.

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एडीआर की याचिका के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से यह सवाल किया कि अगर बॉन्ड की व्यवस्था चुनाव में काले धन का इस्तेमाल रोकने और पारदर्शिता के लिए लाई गई है तो इसमें इतनी गोपनीयता क्यों? सरकार का इस बारे में तर्क है कि अगर इसके जरिये चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक किए जाएंगे तो इससे उन्हें दूसरी पार्टियों के शासन में राजनीतिक प्रतिशोध का सामना करना पड़ सकता है. चंदा देने वाले की निजता का सवाल भी उठाया जा रहा है. ये तर्क गलत नहीं लगते हैं, लेकिन क्या ये इतने बड़े हैं कि इनकी वजह से मतदाताओं के अपनी चुनावी प्रक्रिया को जानने के अधिकार को ताक पर रख दिया जाए? क्या इन तर्कों की वजह से पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जुड़ी पारदर्शिता की अनदेखी की जा सकती है? और राजनीतिक प्रतिशोध का सामना भी तो चंदा देने वालों को इन पार्टियों की सरकारों से ही करना है!

अगर चुनावी चंदे में गोपनीयता को जरूरी भी मान लिया जाए तो भी कम से कम यह प्रावधान तो किया ही जा सकता है कि चुनावी बॉन्डों के जरिये मिलने वाले चंदे का नामवार विवरण चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को दे दिया जाए! हालांकि सबसे बेहतर तरीका तो यही होगा कि चुनावी चंदे की बात सार्वजनिक पटल पर रहे.

चुनाव सुधार के नाम पर राजनीतिक चंदे के लिए पहले भी कई नियम-कानून लाए जा चुके हैं. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने राजनीतिक दलों को देने वाले चंदों में कंपनियों को टैक्स छूट दी थी. इसके बाद कॉरपोरेट्स से मिलने वाले राजनीतिक चंदे में काफी बढोत्तरी देखी गई थी. फिर कांग्रेस सरकार ने यह नियम बनाया कि कंपनियां सीधा चंदा देने के साथ-साथ ट्रस्ट बनाकर भी राजनीतिक दलों को चंदा दे सकती थीं. इसमें टैैक्स का दोतरफा लाभ था. मोदी सरकार ने चुनावी बॉन्ड से पहले, राजनीतिक दलों को मिलने वालों कारपोरेट चंदे की सीमा खत्म कर दी थी. 2017 से पहले पिछले तीन वित्तीय वर्षों के लाभ का सिर्फ 7.5 फीसदी ही चुनावी चंदे के रूप में दिया जा सकता था. मौजूदा नियम के मुताबिक कॉरपोरेट कंपनियों राजनीतिक पार्टियों को कितना भी चंदा दे सकती हैं. इस नियम के बाद कारपोरेट के जरिये राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में अप्रत्याशित बढोत्तरी हुई है.

इसके अलावा एफसीआरए (फॉरेन कंट्रीब्यशन रेगुलेशन एक्ट) के तहत विदेश से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर भी छूट दी गई है. 2018 के वित्त विधेयक में यह प्रावधान भी किया गया कि 1976 के बाद विदेश सेे राजनीतिक दलों को मिलने वाले पैसे के किसी मामले की जांच भी नहीं की जा सकेगी. एफसीआरए के तहत मोदी सरकार ने एनजीओ को मिलनेे वाले विदेशी फंड पर खासी सख्ती दिखाई है, लेकिन राजनीतिक चंदे के मामले में उसका रवैैया दूसरा था. हैरत की बात यह भी है कि चुनाव आयोग ने कोर्ट के पूछने से पहले इस तरह केे बदलावों पर कभी ठोस आपत्ति नहींं जताई.

जाहिर है कि चुनाव सुधार की बहसों के बीच भारत में सभी दल ऐसे कानून लाते रहे हैं जो राजनीतिक दलों के कामकाज और उनके अर्थतंत्र को अपारदर्शी बनाते रहे हैं. सवाल है कि अगर दुनिया के तमाम विकसित देशों में राजनीतिक चंदे के आंकड़े सार्वजनिक हो सकते हैं तो भारत की राजनीतिक पार्टियां और सरकारें ऐसा करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?