साल 2016 से 2018 के बीच देश में करीब 50 लाख लोगों ने अपनी नौकरियां खो दीं. अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के तहत आने वाले सेंटर फॉर सस्टेनेबल एंप्लॉयमेंट (सीएसई) ने अपनी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी है. इसमें यह भी बताया गया है कि नौकरियां गंवाने का सिलसिला 2016 में केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई नोटबंदी से शुरू होता है. हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह सीधे-सीधे दावा नहीं किया जा सकता कि रोजगार खोने के इस सिलसिले का नोटबंटी से सीधा कोई संबंध है.

रिपोर्ट के मुताबिक देश में बेरोजगारी की समस्या साल 2011 से बनी हुई है. साल 2018 तक बेरोजगारी दर छह प्रतिशत तक बढ़ गई जो 2000-2011 के मुकाबले दोगुनी है. सीएसई ने सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी के उपभोक्ता पिरामिड सर्वेक्षण के आकंड़ों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है. ये आंकड़े बेरोजगारी को लेकर नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन द्वारा किए गए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की उसी रिपोर्ट के तहत इकट्ठा किए गए थे जिसे अभी तक जारी नहीं किया गया है. हालांकि जनवरी में यह रिपोर्ट लीक हो गई थी. तब यह जानकारी सामने आई थी कि 2017-18 के बीच देश में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत रही जो बीते 45 सालों में सबसे ज्यादा है.

सीएसई की रिपोर्ट के मुताबिक बेरोजगारी की समस्या उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों और 20 से 24 वर्ष के युवाओं के बीच सबसे ज्यादा है. शहरी इलाकों से जुड़े रोजगार में इस आय समूह के 13 प्रतिशत लोग हैं, लेकिन उनमें से 60 प्रतिशत बेरोजगार हैं. इसके अलावा कम शिक्षित लोगों ने भी अपनी नौकरियां गंवाई हैं. वहीं, महिलाओं की बेरोजगारी भी काफी ज्यादा बढ़ी है.