10 अप्रैल को खबर आई कि पहली बार किसी ब्लैक होल का फोटो खींच लिया गया है. ब्लैक होल ((कृष्ण या श्यामविवर) को अंतरिक्ष के सबसे बड़े रहस्यों में से एक माना जाता है. जाहिर है इस खबर को दुनिया में छा जाना था और ऐसा ही हुआ भी.

लेकिन जिसे किसी ब्लैक होल का पहला असली फोटो बता कर प्रचारित किया जा रहा है, वह स्वयं उस महाकाय ब्लैक होल का सीधे-सीधे लिया गया कोई फ़ोटो नहीं है. हो ही नहीं सकता. किसी ब्लैक होल से टकरा कर कोई प्रकाश किरण या एक्स या फिर गामा किरण वापस आ ही नहीं सकती, तो फिर फ़ोटो लायक कोई प्रतिबिंब (इमेज) कैसे बनेगा. किसी फ़ोटो के लिए अनिवार्य है कि या तो कोई वस्तु खुद ही प्रकाश या विकिरण उत्सर्जित कर रही हो या फिर किसी दूसरे स्रोत का प्रकाश या विकिरण उससे टकराकर वापस आ रहा हो.

ब्लैक होल तो हर तरह के प्रकाश, पदार्थ या विकिरण को क्षण भर में निगल जाता है. उसका सीधे-सीधे कोई फ़ोटो ले सकना नितांत असंभव है. जिसे कन्या नक्षत्र में स्थित मेसियर-87 नाम की मंदाकिनी (गैलेक्सी/ ज्योतिर्माला) के ब्लैक होल का रंगीन फ़ोटो प्रचारित किया जा रहा है, वह किसी कलाकार द्वार हाथ से बनायी किसी काल्पनिक तस्वीर की तरह कंप्यूटर-रचित एक आभासीय (वर्चुअल) तस्वीर है. यह ब्लैक होल पृथ्वी से साढ़े पांच करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है. यह हमारे सूर्य से 650 करोड़ गुना अधिक द्रव्यमान (भार) और हमारे पूरे सौरमंडल के विस्तार से भी कहीं ज्यादा, 100 अरब किलोमीटर विस्तार वाला एक कल्पनातीत महाकाय चिर अंधकार जैसा है!

आभासीय तस्वीर कैसे ली गई?

इस आभासीय तस्वीर को बनाने के लिए ब्लैक होल के पास के ‘घटना क्षितिज’ (इवेन्ट हॉराइज़न) से जुड़े आंकड़ों (डेटा) का उपयोग किया गया है. ये आंकड़े विश्व भर में फैले आठ शक्तिशाली दूरदर्शियों (टेलिस्कोप) को संयोजित कर इकट्ठे किए गए. इस तकनीक से, जिसे ‘वेरी लॉन्ग बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री’ (वीएलबीआई) कहते हैं, ‘इवेन्ट होराइज़न टेलिस्कोप’ (ईएचटी) नाम का एक ऐसा संयोजित आभासी दूरदर्शी बन गया जिसका आकार संयोजन के द्वारा पृथ्वी के आकार जितना बड़ा हो गया और क्षमता अंतरिक्ष-आधारित ‘हबल’ दूरदर्शी की अपेक्षा एक लाख गुना बेहतर.

अप्रैल 2017 से चल रहे इस प्रयोग में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की 1999 से अंतरिक्ष में चक्कर लगा रही वेधशाला ‘चन्द्रा एक्स-रे ऑब्ज़रवेटरी’ का भी महत्पूर्ण योगदान है. जैसा कि नाम ही बताता है, इस अंतरिक्ष वेधशाला को भारतीय मूल के खगोल वैज्ञानिक सुब्रमण्यन चन्द्रशेखर की याद में उनका नाम दिया गया है. उन्हें 1983 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला था. वे भारत को भौतिक विज्ञान का पहला और अब तक का एकमात्र नोबेल पुरस्कार दिलवाने वाले भौतिकशास्त्री सीवी रमण के भतीजे थे.

‘घटना क्षितिज’

किसी ब्लैक होल का ‘घटना क्षितिज’ उससे परे की उस दूरी को कहा जाता है, जहां पहुंचते ही तारों, तारामंडलों, निहारिकाओं (गैस के बादल) या स्वयं प्रकाश-किरणों जैसी कोई भी चीज़ वापस नहीं आ सकती. यह वह सीमा है जहां ये सब ब्लैक होल के अकल्पनीय गुरुत्वाकर्षणबल द्वारा खिंचते हुए उसी में गिर कर विलीन हो जाते हैं. 10 अप्रैल को प्रकाशित चित्र इसी ‘घटना क्षितिज’ में बहुत गर्म होकर प्लाज़्मा बन गई गैस की प्रदीप्ति यानी चमक को दिखाता है, न कि मूल ब्लैक होल को.

खगोलविदों के अनुसार, जब कभी कोई तारा, पिंड या निहारिका किसी महाभारी ब्लैक होल के पास भटक जाता है, तब उसके गुरुत्वाकर्षणबल के भयंकर खिंचाव से पिचककर वह एक विशालकाय तश्तरी जैसा चपटा हो जाता है. पिचक कर तश्तरीनुमा बन गयी संपूर्ण द्रव्यराशि, अणुओं-परमाणुओं के रूप में खंडित-विखंडित होते हुए – किसी गड्ढे में गिरते पानी में बनने वाली भंवरों की तरह – निरंतर बढ़ती हुई गति से ब्लैक होल के फेरे लगाने लगती है. साथ ही उसका किसी कुप्पी की बनावट जैसे आकार में ब्लैक होल की तरफ खिंचना भी जारी रहता है.

लगभग प्रकाश जितनी गति

अंततः सारी द्रव्यराशि लगभग प्रकाश की गति जितनी तीव्र हो जाती है. उसके अणुओं-परमाणुओं के बीच प्रचंड आपसी घर्षण होता है. वे अति गर्म प्लाज़्मा में बदल जाते हैं और एक्स-रे और गामा किरणें पैदा करते हुए किसी आभामंडल-जैसी चमक के साथ ‘घटना क्षितिज’ वाली दूरी पार करते हुए ब्लैक होल में समाते जाते हैं. जिस फ़ोटो की इस समय खूब चर्चा है, वह ब्लैक होल से कुछ दूरी पर ऐसी ही चमक का एक घेरा है. बीच का अंधकारमय हिस्सा ब्लैक होल होना चाहिये. यह फ़ोटो एक बार या एक दिन में नहीं, बल्कि कंप्यूटरों की सहायता से कई महीनों में बन पाया है.

फ़िनलैंड के खगोलविद तुओमास सावोलाइनेन का कहना है कि ब्लैक होल इतने शक्तिशाली होते हैं कि उनका चुंबकीय हाथ 300 प्रकाशवर्ष दूर तक पहुंच सकता है. हालांकि वे हमारे सूर्य से करोड़ों-अरबों गुना भारी होते हुए भी आकार में प्रायः उससे कहीं छोटे होते हैं. हर ब्लैक होल वास्तव में अति घनत्व वाला एक ठोस मृत तारा होता है. जीवित तारे अपने केंद्र में हाइड्रोजन के परमाणुओं के हीलियम में जुड़ने से पैदा होने वाली ऊर्जा से चमकते हैं. दो प्रकार के बलों के बीच संतुलन से वे लंबे समय तक चमकते रह सकते हैं. एक तो है उनकी अपनी द्रव्यराशि (अणुओं-परमाणुओं की मात्रा) से जनित गुरुत्वाकर्षणबल, जो उन्हें संकुचित करते हुए छोटा बनाने का प्रयास करता है. दूसरा है उनके केंद्र से बाहर निकलने वाला विकिरण, जो उन्हें फैलाकर बड़ा करना चाहता है. इसलिए जब किसी तारे के केंद्रीय भाग में ईंधन समाप्त हो जाता है, तो वह सिकुड़ने लगता है.

हमारा सू्र्य ‘श्वेत बौना’ बनेगा

हमारे सूर्य जैसे द्रव्यमान वाले तारे, मृत्यु के बाद, श्वेत बौने या ‘व्हाइट ड्वार्फ’ तारे कहलाते हैं. वे बाद में धीरे-धीरे ठंडे होकर दृश्यमान आकाश से लुप्त हो जाते हैं. सूर्य से कई गुना अधिक द्रव्यमान वाले बड़े तारों की जब मृत्यु होती है, तो उनमें प्रचंड विस्फोट होता है, जिसे सुपरनोवा विस्फोट कहते हैं. तब तारे का बहुत सारा पदार्थ ब्रह्मांड में चारों दिशाओं में फैल जाता है. खंडित तारे के केंद्र में एक छोटा-सा ठोस पिंड बचा रहता है. उसे न्यूट्रॉन तारा कहते हैं.

यह न्यूट्रॉन तारा भी इतना ठोस होता है कि उसके एक चम्मच-भर पदार्थ का वजन कई टन के बराबर होता है. इससे भी अधिक द्रव्यमान वाले तारों में सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचे हुए बीच के भाग का गुरुत्वाकर्षण द्वारा सिकुड़ना आगे भी जारी रहता है. वह इस हद तक ठोस और इतने अधिक गुरुत्वाकर्षण वाला पिंड बन जाता है कि वहां से प्रकाश की किरण भी बाहर नहीं निकल पातीं. किसी तारे की इसी अवस्था को ब्लैक होल कहते हैं.

ब्लैक होल अकल्पनीय ठोस

कोई ब्लैक होल कितना अकल्पनीय ठोस होता है, इसकी कल्पना इस उदाहरण से की जा सकती है कि हमारी पृथ्वी यदि ब्लैक होल बन सकती, तो उसकी सारी द्रव्यराशि इस बुरी तरह कस जायेगी कि वह किसी टमाटर से बड़ी नहीं रह जायेगी. अध्ययनों से पता चला है कि हमारी आकाशगंगा सहित लगभग सभी मंदाकिनियों के केंद्र में कोई अति-द्रव्यमान वाला ब्लैक होल बैठा हुआ है.

हमारा सौरमंडल जिस मंदाकिनी (मिल्की वे) में स्थित है, केवल उसे ही ‘आकाशगंगा’ कहा जाता है. बाक़ी सबको मंदाकिनी (गैलेक्सी/ ज्योतिर्माला) कहने का नियम है. ‘ईएचटी’ दूरदर्शी की सहायता से हमारी आकाशगंगा में स्थित एक दूसरे ब्लैक होल पर भी नज़र रखी जा रही थी, पर उसके ‘घटना क्षितिज’ वाले आभामंडल की तस्वीर नहीं बन सकी.

छह शहरों में पत्रकार सम्मेलन

10 अप्रैल वाली कंप्यूटर तस्वीर को विश्व के छह शहरों में हुए पत्रकार सम्मेलनों में पेश किया गया. इन छह शहरों में एक बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स भी था. वहां ‘ईएलटी’ विज्ञान परिषद के अध्यक्ष और नीदरलैंड के रादबुद विश्वविद्यालय में खगोलभौतिकी के प्रोफ़ेसर हाइनो फ़ाल्के ने पत्रकारों को बताया कि तस्वीर ‘घटना क्षितिज’ वाले चमकीले घेरे की पृष्ठभूमि में ब्लैक होल की छाया भी दर्शाती है. इस छाया की सहायता से अनुमान लगाया जा सकता है ब्लैक होल ‘एम87’ की द्रव्यराशि कितनी बड़ी है. इसी पत्रकार सम्मेलन में ‘ईस्ट एशिया ऑब्ज़रवेटरी’ के अध्यक्षमंडल के एक सदस्य पॉल टीपी हो ने कहा, ‘इस चित्र में दिखायी पड़ने वाली कई खूबियां हमारी सैद्धांतिक समझ से आश्चर्यजनक मेल खाती हैं.’

ब्रसेल्स के पत्रकार सम्मेलन में बताया गया कि साढ़े पांच करोड़ प्रकाश वर्ष दूर की इस अंधेरी छाया को रेडियो दूरदर्शी के माध्यम से पृथ्वी पर से ‘देख सकना’ भी एक आश्चर्य ही है. यह एक ब्रह्मांडीय संयोग के कारण संभव हो पाया: पृथ्वी का वायुमंडल संयोगवश ठीक उन्हीं माइक्रोवेव रेडियो तरंगों के लिए पारगमनीय है, जो किसी ब्लैक होल के ‘घटना क्षितिज’ से आती हैं. उनसे थोड़ी कम या अधिक तंरंगदैर्घ्य (वेवलेंग्थ) की माइक्रोवेव रेडियो तरंगों को हमारा वायुमंडल रोक देता है. हमारी आकाशगंगा में 26,500 प्रकाश वर्ष दूर के ‘सैजिटैरियस ए’ नाम के ब्लैक होल से आने वली माइक्रोवेव रेडियो तरंगें इतनी क्षीण हैं कि वैज्ञानिक चाह कर भी उसके बारे में ‘एम87’ जैसी जानकारियां नहीं जुटा पा रहे हैं.

विज्ञान को भी विज्ञापन चाहिये

‘एम87’ ब्लैक होल की कंप्यूटर-रचित तस्वीर सीधे उसी का फ़ोटो भले नहीं है, वह अपने ढंग की एक बड़ी वैज्ञानिक सफलता तब भी है. वैज्ञानिक आंशिक सफलताओं को भी आजकल किसी पूर्ण सफलता का रंग इसलिए भी देते हैं, ताकि वे चर्चा में रहें और उनकी शोध परियोजनाओं के लिए पैसा मिलता रहे. विशेषकर अंतरिक्ष संबंधी शोध परियोजनाएं बहुत महंगी होती हैं. जनता और सरकारों को उनका शीघ्र ही कोई व्यावहारिक उपयोग भी समझ में नहीं आता. इसलिए सरकारें बड़ी-बड़ी धनराशियां उपलब्ध करने में संकोच करती हैं. इसलिए जो वैज्ञानिक अपने काम का मीडिया द्वारा प्रचार करने में जितने कुशल होते हैं, वे सरकारी बटुआ खुलवा पाने में भी उतने ही सफल सिद्ध होते हैं. ‘एम87’ ब्लैक होल के कथित ‘पहले फ़ोटो’ के प्रचार के पीछे यह मार्केटिंग भी काम कर रही थी.