उत्तर भारत में किसी संभावित नुकसान की भरपाई के लिए भाजपा ने इस आम चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 23 पर जीत हासिल करने का लक्ष्य तय किया है. 2014 के चुनाव में पार्टी ने केवल दो सीटों- दार्जिलिंग और आसनसोल पर कब्जा किया था. इनमें उत्तर बंगाल स्थित दार्जिलिंग से एसएस अहलूवालिया ने तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी बाइचुंग भूटिया को मात दी थी. 2009 के चुनाव में भी इस सीट पर भाजपा के जसवंत सिंह ने जीत दर्ज की थी. यानी पिछले दो चुनावों में दार्जिलिंग के मतदाताओं ने इस राष्ट्रीय पार्टी पर भरोसा जताया है. इस आम चुनाव में यहां भाजपा की चुनौती इस भरोसे को ही कायम रखने की है.

दार्जिलिंग संसदीय क्षेत्र | साभार : स्क्रोल.इन
दार्जिलिंग संसदीय क्षेत्र | साभार : स्क्रोल.इन

भाजपा ने इस बार दार्जिलिंग से राजू सिंह बिष्ट को चुनावी दंगल में उतारा है. पेशे से कारोबारी बिष्ट का संबंध मणिपुर से है. बताया जाता है कि उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से भी रहा है. वहीं, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने दार्जिलिंग से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के विधायक अमर सिंह राय को उम्मीदवार बनाया है. राय टीएमसी के चुनावी चिन्ह के साथ मतदाताओं के बीच हैं.

टीएमसी ने भाजपा उम्मीदवार के बाहरी होने को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था. हालांकि, भाजपा को पहाड़ स्थित प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) का साथ मिला हुआ है. साथ ही, जीजेएम के बिमल गुरूंग गुट ने भी राजू सिंह बिष्ट को समर्थन देने की बात कही है. साल 2017 के आंदोलन के बाद जीजेएम दो गुटों में बंट गया था. इनमें से एक गुट बिमल गुरूंग का है और दूसरा बिनय तमांग का. तमांग अब ममता बनर्जी के साथ मिल गए हैं. दार्जिलिंग संसदीय सीट किसी उम्मीदवार की जीत में जीएनएलएफ और जीजेएम की अहम भूमिका रहती है.

साल 2017 के गोरखा आंदोलन के बाद दार्जिलिंग में यह पहला संसदीय चुनाव है. 104 दिनों के इस आंदोलन के दौरान 11 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी. ममता बनर्जी की सरकार पर आरोप है कि उसने क्रूरता के साथ इस आंदोलन का दमन किया. वहीं, अलग गोरखालैंड राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों के प्रदर्शन को रोकने के लिए केंद्र की ओर से अर्द्धसैनिक बलों को भी भेजा गया था. इस तरह दार्जिलिंग के गोरखाओं को अलग राज्य को लेकर केंद्र और राज्य दोनों से निराशा हाथ लगी है. एक ओर जहां ममता बनर्जी सरकार अलग राज्य की मांग को हमेशा से खारिज करती रही तो दूसरी ओर, आंदोलनकारियों को भाजपा और इसके सांसद एसएस आहलूवालिया का भी साथ नहीं मिला.

इसलिए माना जा रहा है कि दार्जिलिंग के मतदाताओं की नाराजगी को कम करने के लिए अहलूवालिया को इस सीट से फिर नहीं उतारा गया. वैसे इस बार भाजपा ने चुनावी घोषणापत्र में अलग गोरखालैंड राज्य बनाने का वादा भी नहीं किया है. पार्टी ने अपने घोषणापत्र में कहा है, ‘हम दार्जिलिंग हिल्स, सिलिगुड़ी तराई और डुआर्स क्षेत्र की समस्या का स्थायी राजनीतिक समाधान खोजने की दिशा में काम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’ इससे पहले 2014 के चुनाव में पार्टी ने गोरखालैंड राज्य का वादा किया था.

माना जा रहा है कि गोरखालैंड को लेकर पार्टी द्वारा अपने कदम पीछे खींचने की वजह राज्य की अन्य सीटों पर होने वाला संभावित नुकसान है. राज्य का दक्षिणी हिस्से में रहने वाली बड़ी आबादी राज्य के विभाजन के खिलाफ है. इसलिए माना जा रहा है कि अगर भाजपा ऐसा करती है तो उसके चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के मंसूबों पर पानी फिर सकता है. ठीक यही स्थिति तृणमूल कांग्रेस के साथ भी है. इस बात को ध्यान में रखते हुए ही ममता बनर्जी गोरखालैंड राज्य की मांग का बड़ी सख्ती से विरोध करती हैं. बहुत से लोग मानते हैं कि इस सख्ती की प्रतिक्रिया में ही दार्जिलिंग की बड़ी आबादी भाजपा के साथ आ सकती है.

जिस तरह गोरखालैंड आंदोलन को दबाया गया उसे लेकर भी लोगों में ममता बनर्जी के खिलाफ नाराजगी है. इस नाराजगी को दूर करने के लिए तृणमूल कांग्रेस अपनी सरकार के उन्नति यानी विकास कार्यों पर जोर दे रही है. साथ ही, वह भाजपा पर क्षेत्र के लोगों को धोखा देने का आरोप भी लगा रही है. हालांकि, जीएनएलएफ के प्रमुख मन घिसिंग ने हाल में राजू सिंह बिष्ट के समर्थन में कुर्सियांग की जनसभा में जो कहा वह तृणमूल की परेशानी बढ़ाने वाला है. उन्होंने कहा था, ‘हम लोग बंगाल से राजनीतिक और प्रशासनिक विभाजन चाहते हैं. यदि तृणमूल जीत हासिल करती है तो यह असंभव है.’

दूसरी ओर, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर दिया गया बयान भी पार्टी के लिए मुश्किल खड़ी करने वाला बन गया. हाल में कलिम्पोंग की एक जनसभा में उन्होंने कहा कि केंद्र में फिर उनकी सरकार बनने पर एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा. जानकारों के मुताबिक इससे गोरखा मतदाताओं में एक आशंका पैदा हो गई है. अधिकांश गोरखाओं का संबंध पड़ोसी देश नेपाल से है. भाजपा ने नागरिकता संशोधन विधेयक को फिर से लाने का वादा भी किया है. इस विधेयक के जरिए बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने संबंधी प्रावधानों में ढील देने की बात कही गई है. इसकी वजह से दार्जिलिंग के स्थानीय निवासियों को अपनी सभ्यता-संस्कृति पर बुरा असर पड़ने की भी आशंका है. हालांकि, इसके बाद भाजपा की जिला इकाई ने साफ किया कि इनसे दार्जिलिंग के लोगों को आशंकित होने की जरूरत नहीं है.

इन बातों के आधार पर कहा जा सकता है कि दार्जिलिंग की लड़ाई फतह करना भाजपा और तृणमूल दोनों के लिए बड़ी चुनौती है. यदि टीएमसी जीत हासिल करने में सफल होती है तो यह उसके लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होगी. इस संसदीय सीट से पार्टी का कोई उम्मीदवार अब तक जीत हासिल नहीं कर पाया है. वहीं, भाजपा की जीत इस बात की पुष्टि करेगी कि गोरखालैंड राज्य बनाने का वादा पूरा न करने और करीब-करीब अनजान से चेहरे को बतौर उम्मीदवार उतारने के बाद भी क्षेत्र के मतदाताओं ने उस पर अपना विश्वास बनाए रखा है.