निर्देशक : अभिषेक वर्मन

लेखक : अभिषेक वर्मन, शिबानी भटिजा, हुसैन दलाल

कलाकार : आलिया भट्ट, वरुण धवन, माधुरी दीक्षित, आदित्य रॉय कपूर, सोनाक्षी सिन्हा, संजय दत्त, कुणाल खेमू, हितेन तेजवानी

रेटिंग : 2/5

‘कलंक’ के निर्देशक अभिषेक वर्मन ‘देवदास’ (2002) में संजय लीला भंसाली को असिस्ट कर चुके हैं. इसके उम्दा सिनेमेटोग्राफर बिनोद प्रधान उसी ‘देवदास’ का फिल्मांकन कर चुके हैं. इसके निर्माता करण जौहर कई दफा भंसाली की भूरि-भूरि प्रशंसा कर चुके हैं और अपनी अगली निर्देशित फिल्म भी भंसाली के प्रिय जॉनर कहे जाने वाले हिस्टॉरिकल-ड्रामा को आधार बनाकर रच रहे हैं – ‘तख्त’.

इतने सारे भंसाली प्रेमियों की वजह से ही ‘कलंक’ आपको संजय लीला भंसाली की वह फिल्म लगेगी जो उन्होंने निर्देशित नहीं की है. इसके नयनाभिराम सेट्स, विजुअल्स, स्लो-मोशन का उपयोग, कहानी को आगे बढ़ाने का तरीका, पुराने दौर की सजावटी वस्तुओं को हर दृश्य में करीने से सजाने की ललक और गानों में भारतीयता के छौंक से लेकर भंसाली के सिनेमा की हर सेंसिबिलिटी अभिषेक वर्मन ने अपनाई है. फिल्म की शुरूआत में आपको यह नकल जरूर मालूम होगी लेकिन धीरे-धीरे आपको एहसास होगा कि वर्मन अपने गुरु से प्रभावित होकर खुद की ही एक दुनिया रचना चाहते हैं. चूंकि इसे वे बेहद प्यार से रचते हैं इसलिए ‘कलंक’ के कई विजुअल्स काफी प्रभावित कर जाते हैं.

दशहरा मनाने वाले एक गीत में विशाल गरुड़ के पंख कटने से लेकर हनुमान का होना तक मन मोहता है. राम के वेश में कई नीले रंग वाले धनुर्धारी पानी से निकलते हैं और ‘रामचंद्र की जय’ के जयकारों के बीच मुस्लिम नायक जफर (वरुण धवन) स्लो-मोशन में आगे बढ़ता है. यह सीन इसलिए भी भाता है कि आजकल के विभाजित समय में मारक पॉलिटिकल कॉमेंट्री करता मालूम होता है. जलते हुए रावण के बीच फिल्माया गया आलिया-वरुण के बीच का पहला सीन भी काफी सुंदर है और खचाखच भरी ट्रेन के दौरान वाला मार्मिक सीन भी काबिलेतारीफ है.

लाहौर की हीरा मंडी की पृष्ठभूमि होने के बावजूद झील पारकर बहार बेगम (माधुरी दीक्षित) की हवेली तक पहुंचना भी विंटेज भंसाली है. ऐसे नयनाभिराम दृश्यों को देखकर आप समझ जाते हैं कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे की निर्मम पृष्ठभूमि होने के बावजूद फिल्मकार एक फंतासी दुनिया का निर्माण करना चाहता है और हमें उस दुनिया पर विश्वास दिलाने के लिए कमर कसकर की जाने वाली मेहनत खुद कर भी चुका है.

लेकिन एक वक्त बाद इस सुंदरता की अति हो जाती है. भंसाली का प्रभाव, उस पर करण जौहर की ‘सच्चे इश्क’ के आसपास हमेशा से रची जाने वाली अतिनाटकीयता का भी दोहराव. तिस पर राजामौली निर्देशित ‘बाहुबली’ जैसे विहंगम विजुअल्स रचने की सनक और इस चक्कर में हास्यास्पद से बुल-फाइटिंग जैसे दृश्यों का थोपा जाना. आखिर में इतने सारे सिनेमाई प्रभाव मिलकर खून से सनी प्रेम की एक उम्दा कथा कहने की जगह ‘कलंक’ को एक सजावटी सामान भर बना देते हैं. और यह सजावट भी दिखावट ज्यादा नजर आती है.

अपने पात्रों के बीच जिस तरह के रिश्तों को ‘कलंक’ एक्सप्लोर करने की कोशिश करती है, उस तरह की कहानी कहने के लिए दीपा मेहता की आमिर खान अभिनीत बेहद उम्दा फिल्म ‘1947 अर्थ’ (1998) जैसी सेंसिबिलिटी और मारकता की जरूरत थी. पार्टिशन पर कोई वैसे भी सतही फिल्म बनाए तो अच्छा नहीं लगता. ऊपर से ‘कलंक’ पार्टिशन की टेक लेकर अपनी औसत त्रिकोणीय प्रेम-कहानी को ढेर सारा करण जौहर मार्का मेलोड्रामा भरकर ज्यादा तवज्जो देती है और पार्टिशन को सिर्फ एक टूल की तरह इस्तेमाल करती है. ऐसा करना न सिर्फ उसके प्रेम-त्रिकोण को हल्का करता है बल्कि उसके द्वारा बेहद मेहनत से रचे गए उस पीरियड को भी एक वक्त बाद प्रभावहीन बना देता है.

दीपा मेहता ने ‘1947 अर्थ’ में भी त्रिकोणीय प्रेम-कथा ही कही थी लेकिन पार्टिशन की हृदयविदारक घटनाओं को बखूबी फिल्म में शामिल कर एक महान फिल्म की रचना की थी. ‘कलंक’ देखते हुए आपको सिर्फ बेवजह बहाए गए पैसे नजर आते हैं और दुख होता है कि पैसों वाली इस मदमस्त फिल्मी दुनिया में एक उम्दा कहानी का आदर करने वाले लोग क्यों इतने कम हैं.

फिल्म में संवादों की भी अति है. ऐसे-ऐसे संवाद हैं जो किरदारों को कई दफा सूट तक नहीं करते. लगता है जैसे संवाद-लेखक हुसैन दलाल की कलम में ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई’ के संवाद-लेखक रजत अरोड़ा की संवादों की अति कर देने वाली आदत स्याही बनकर मौजूद रही होगी. कुछ ‘मुगले-आजम’ का भी नशा होगा, इसलिए हर छोटी-बड़ी बातचीत भारी-भरकम संवादों से लबरेज मिलती है और इसी वजह से कई जगह फिल्म नकली इमोशन्स की बू छोड़ती है.

एक जगह फ्लर्ट करते वरुण शर्माती आलिया से कहते हैं कि ‘अपनी आंखों की कशिश को पलकों के एतराज से छिपाने की कोशिश न करो!’ एक दूसरी जगह दोनों जब एक-दूसरे के करीब आ रहे होते हैं तो दूर छिटकते हुए वरुण फिर डायलॉग मारते हैं, ‘हमें निकलना चाहिए, वर्ना ये शाम हमसे आगे निकल जाएगी!’ बेचारी आलिया! उसके किरदार ने तो जफर नाम के गर्म दिमाग लोहार से प्यार किया था. उसे क्या पता था कि गुलजार और जावेद अख्तर की मिलावट करने वाला डफर भी साथ मिलेगा!

जफर के मुस्लिम दोस्त की भूमिका में कुणाल खेमू हैं और उन्होंने गजब का काम किया है. उन्हें देखकर यदा-कदा ‘1947 अर्थ’ के आमिर खान की याद आती है और उसी याद से हमारी यह समझ भी बनती है कि ‘कलंक’ को उसी फिल्म जैसी परिपक्वता दिखानी थी. फंतासी के चक्कर में पार्टिशन को साइड रोल में कास्ट नहीं करना था और अपने त्रिकोणीय प्रेम के कोने जरा कस कर दर्शकों के हृदय में चुभाने थे.

सोनाक्षी सिन्हा अपने छोटे-से रोल में ‘लुटेरा’ वाले अपने किरदार-सा होने की कोशिश करती हैं लेकिन कमजोर लिखाई के चलते दर्शकों की नजर में कभी चढ़ नहीं पातीं. आदित्य रॉय कपूर सीमित अभिनय प्रतिभा के स्वामी हैं लेकिन नियंत्रित भाव-भंगिमाओं वाले अपने रोल को ईमानदारी से निभा लेते हैं. उनके रोल पर वैसे भी भंसाली की ही ‘हम दिल दे चुके सनम’ के अजय देवगन वाले किरदार का जबरदस्त हैंगओवर है. यह पूरी फिल्म ही न जाने कितने निर्देशकों के हैंगओवर से ग्रस्त होने के बाद बनाई गई है!

संजय दत्त के हिस्से में चौधरी खानदान के मुखिया का छोटा-सा रोल आया है और हाल की फिल्मों की तुलना में उनकी स्क्रीन प्रेजेंस यहां बेहतर मालूम होती है. जब वे अपनी आंखों से ज्यादा बोलते हैं तो ज्यादा बेहतर लगते हैं. उनका साथ देने वाली माधुरी दीक्षित उम्रदराज तवायफ के रोल में हैं. ‘देवदास’ में उन्हें ऐसे ही एक रोल को जीवंत करते हुए देखने के बाद दर्शकों को इस रोल में उन्हें स्वीकारने में मुश्किल हो सकती है. लेकिन अपनी गरिमामय उपस्थिति से वे आपको प्रभावित तो करेंगी ही.

आलिया भट्ट शुरुआत में तो पीरियड-ड्रामा की परिधि वाले अपने पारंपरिक किरदार ‘रूप’ में नहीं जंचती, लेकिन हमें गलत ठहराते हुए जल्द ही फिल्म को अपने कंधों पर उठा लेती हैं. यहां उनका बाकी फिल्मों जितना मुकम्मल अभिनय तो नहीं है लेकिन चूंकि उनके किरदार की इमोशनल रेंज काफी फैली है और इमोशन्स को व्यक्त करने में इस अभिनेत्री की कोई बराबरी नहीं, इसलिए ‘कलंक’ में वरुण धवन के बाद वे ही सबसे ज्यादा दर्शनीय एक्टर साबित होती हैं.

आलिया और वरुण के बीच के दृश्य भी ‘कलंक’ को आखिर तक देखते चले जाने की वजह बनते हैं. उनके बीच का प्रेम-प्रदर्शन ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के स्तर का ही क्यूट और कंटेम्पररी है और अपनी पीरियड सेटिंग में भले ही कम फिट होता है, लेकिन बाकी की फिल्म से ऊब रहे दर्शकों का दिल बहलाने के काम तो आ ही जाता है.

‘कलंक’ से सबसे ज्यादा फायदा वरुण धवन को होने वाला है. हालांकि उनके किरदार की बुनाई ‘त्रिशूल’ (1978) जैसी हिंदी मसाला फिल्मों के आसपास की ही है और कोई अलहदा आयाम उसमें नहीं है. लेकिन वरुण अपने समर्पित अभिनय से ऐसे किरदार जफर को जीवंत कर देते हैं. यह ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के आसपास का ही अभिनय है जिसमें उन्होंने थोड़ा-बहुत जोड़-घटाकर पीरियड-ड्रामा लायक बनाया है. फिर भी, ‘कलंक’ में अगर कोई काजल है तो वो वरुण धवन ही हैं.

बाकी तो, दो घंटे 48 मिनट की इस बेहद लंबी और उबाऊ फिल्म को देखने के बाद आप इसका टाइटल गीत ‘कलंक नहीं, इश्क है काजल पिया’ गा ही नहीं पाएंगे. हमारी लिखी इस स्वर्णिम लाइन को गुनगुनाकर जरूर अपना दिल बहला सकते हैं – ‘काजल नहीं, कोयला है ये कलंक पिया!’