तमिलनाडु के बारे में आगे कोई बात करें उससे पहले देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी की स्वीकारोक्ति. ज़ैदी ने बीते साल ‘द हिंदू’ को दिए साक्षात्कार में कहा था, ‘मैं बेझिझक यह मानता हूं कि चुनाव के दौरान देश के दक्षिणी राज्यों में धनबल का ज़बर्दस्त इस्तेमाल होता है. देश के दूसरे राज्यों की तुलना में इन राज्यों में यह खुला खेल है. फिर चाहे कर्नाटक देख लीजिए या तमिलनाडु.’

सिर्फ़ नसीम ज़ैदी ही नहीं, मौज़ूदा चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी इसी महीने की शुरुआत में बताया था, ‘तमिलनाडु के लिए हमने राज्य स्तर पर विशेष पर्यवेक्षक नियुक्त किया है. ख़ास तौर पर उम्मीदवारों के चुनावी ख़र्च पर सख़्त निग़ाह रखने के लिए. इसके अलावा हर चुनाव क्षेत्र में प्रत्याशियों के सिर्फ़ चुनावी ख़र्च की निग़रानी के लिए ही कम से कम दो पर्यवेक्षकों की तैनाती की गई है. इसकी वज़ह ये है कि इस राज्य में चुनाव ख़र्च से जुड़ा मसला काफ़ी संवेदनशील माना जाता है.’

और बात पैसों की हो तो टीटीवी दिनाकरण यह खेल खुलकर खेल रहे हैं

चुनाव के दौरान पैसों का खेल तो पूरे देश में होता है. तुलनात्मक रूप से थोड़ा ज़्यादा सही मगर दक्षिण के राज्यों में भी यह सब पहले से चल रहा है. तो फिर अभी ऐसा क्या हुआ कि चुनाव प्रक्रिया का संचालन करने वाली देश की शीर्ष संस्था के दो बड़े अधिकारियों को इस तरह की बातें सार्वजनिक रूप से स्वीकार करनी पड़ीं? इसका प्रश्न का ज़वाब जानने से पहले यह भी ध्यान में रखना ज़रूरी है कि सैयद नसीम अहमद ज़ैदी अप्रैल-2015 से जुलाई-2017 तक देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे हैं. जबकि अशोक लवासा चुनाव आयुक्त हैं ही. और दिसंबर-2016 में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के निधन के बाद से अब तक राज्य में लगातार खुलेआम ऐसी घटनाएं हुई हैं जब पैसों के दम पर चुनाव प्रक्रिया, यहां तक तक भारत के निर्वाचन आयोग तक को प्रभावित करने की कोशिश की गई.

यह कोशिश किसी और ने नहीं बल्कि जयललिता की ही निकट सहयोगी रहीं शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरण ने की. मक़सद दोनों का स्पष्ट था कि किसी भी तरह जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) और उसकी सरकार पर कब्ज़ा कर लिया जाए. पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर अपनी दावेदारी पर मुहर लगवाने के लिए दिनाकरण ने निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को 50 करोड़ रुपए की रिश्वत देने की पेशकश की. हालांकि दिल्ली पुलिस की सतर्कता से वे सफल नहीं हो पाए. पुलिस ने पहले उनके सहयोगी सुकेश चंद्रशेखर को रंगे हाथ रिश्वत की रकम के साथ पकड़ा. फिर दिनाकरण को भी हिरासत में ले लिया गया.

लेकिन दिनाकरण पर इसका कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. उन्होंने दिवंगत जयललिता की आरके नगर विधानसभा सीट पर उपचुनाव जीतने के लिए भी पानी की तरह पैसा बहाया. इस चक्कर में अप्रैल-2017 में इस सीट पर उपचुनाव रद्द तक कर दिया गया. उस वक़्त नसीम ज़ैदी ही मुख्य चुनाव आयुक्त थे. तब राज्य के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री और दिनाकरण समर्थक सी विजयभास्कर के ठिकानों पर आयकर विभाग ने छापे मारकर 90 करोड़ रुपए के आसपास नग़दी ज़ब्त की थी. उपचुनाव के लिए मतदान से ठीक दो दिन पहले यह कार्रवाई हुई थी. ऐसी ख़बरें थीं कि यह नग़दी मतदाताओं के बीच बांटने के लिए जुटाई गई थी. लेकिन दिनाकरण पर इसका भी कोई ख़ास असर नहीं हुआ.

इस बीच निर्वाचन आयोग ने एआईएडीएमके का चुनाव चिह्न दिनाकरण विरोधी नेताओं- मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी (ईपीएस) और उनके उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) को आवंटित दिया. इन दोनों नेताओं ने शशिकला, दिनाकरण और उनके परिवार के सदस्यों को पार्टी से निष्कासित कर दिया. दिनाकरण समर्थक 18 विधायक भी निकाल दिए गए. उन्हें अदालतों से भी राहत नहीं मिली. लेकिन इस सबके बावज़ूद ‘मन्नारगुड़ी का माफ़िया’ कहलाने वाले परिवार के सबसे अहम सदस्य दिनाकरण शायद पैसों के बल पर ही अपना रास्ता बनाते रहे, जो दिसंबर-2017 में उन्हें राज्य विधानसभा तक ले गया. वे निर्दलीय आरके नगर विधानसभा सीट का उपचुनाव जीते.

हालांकि जैसा अभिनेता से नेता बने कमल हासन कहते हैं, ‘दिनाकरण ने यह जीत पैसों के बल पर ख़रीदी थी. उन्होंने विधानसभा क्षेत्र के हर मतदाता को छह-छह हजार रुपए बांटे थे.’ कमल हासन की बात की प्रमाणिकता और दिनाकरण के धनबल इस्तेमाल की मिसाल इसी महीने फिर नज़र आई. चुनाव में पैसों के बेज़ा इस्तेमाल की शिकायतों के बाद आयकर विभाग ने 16 अप्रैल को तमिलनाडु में कई ठिकानों पर छापे मारे. इस कार्रवाई में थेणी में दिनाकरण समर्थक नेता के ठिकाने से 1.48 करोड़ रुपए बरामद हुए. यह पैसा मतदाताओं में बांटा जाना था. ख़बर यह भी आई कि छापे की कार्रवाई के दौरान आयकर अफ़सरों के साथ दिनाकरण समर्थकों की झड़प तक हो गई.

इन्हीं दिनाकरण के लिए ये चुनाव उनका मंसूबा पूरा करने में मददग़ार हो सकते हैं

यानी सीधे शब्दों में कहें तो दिनाकरण बीते दो-ढाई साल से खुले तौर पर पैसों के बलबूते ही राज्य की सरकार और सत्ताधारी पार्टी पर कब्ज़े की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि उनकी यह कोशिश अब तक सफल नहीं हो पाई. क्योंकि राज्य की ईके पलानिसामी सरकार और एआईएडीएमके को भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधा समर्थन रहा. अब तक पर्दे के पीछे से ही चल रहे सहयोग-समर्थन के आदान-प्रदान पर तब मुहर भी लग गई जब तमिलनाडु में पहली बार भाजपा और एआईएडीएमके ने चुनावपूर्व गठबंधन किया. लेकिन अब बाज़ी मतदाताओं के हाथ में है, जो केंद्र और राज्य दोनों की सरकारों का भविष्य तय करने वाले हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि तमिलनाडु में लोक सभा के साथ ही साथ विधानसभा के उपचुनाव भी हो रहे हैं. बीते दो साल में राज्य विधानसभा की कुल 22 सीटें ख़ाली हुई हैं. इनमें से 18 पर उपचुनाव के लिए बीती 18 अप्रैल को मतदान हुआ है. बाकी चार सीटों के लिए 19 मई को मतदान है. यहीं ये भी याद दिला दें कि इनमें से 18 सीटें उन विधायकों की हैं जो शुरू से दिनाकरण के समर्थन में रहे हैं. इन सबको इसी आधार पर 2017 में विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया गया था. चूंकि तब दिनाकरण एआईएडीएमके से निकाले जा चुके थे इसलिए उनका समर्थन करने वाले विधायकों को भी पार्टी विरोधी गतिविधियों का दोषी मानकर बाहर कर दिया गया.

लेकिन अब 23 मई के नतीज़ों के बाद विधानसभा की तस्वीर बदलने वाली है. तब सदन की कुल सदस्य संख्या 235 (मनोनीति सदस्य सहित) जाएगी और सरकार को सामान्य बहुमत के लिए कम से कम 118 विधायकों के समर्थन की ज़रूरत होगी. जबकि अभी मौज़ूदा पलानिसामी सरकार के पास विधानसभा अध्यक्ष को मिलाकर 114 विधायकों का समर्थन है. यानी उसे कम से कम पांच-छह विधायकों की ज़रूरत पड़ने वाली है. और सरकार तसल्ली से बचा कार्यकाल पूरा कर सके इसके लिए एआईएडीएमके को आठ से 10 तक सीटें जीतनी होंगी. नहीं तो इसके उलट बनने वाली कोई भी स्थिति दिनाकरण के मंसूबे पूरे करने में मददग़ार भी हो सकती है.

चुनाव बाद क्या कुछ हो सकता है

ऐसे में तमिलनाडु में इस चुनाव के बाद अब तीन स्थितियां बनने की संभावना बनती है.

एक- एएमएमके (अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम) नाम से अपनी अलग पार्टी बना चुके दिनाकरण पैसों के ज़ोर पर आठ-10 सीटें जीत जाएं. तब उनके पास ख़ुद उन्हें मिलाकर नौ से 11 तक विधायक हो जाएंगे. वह भी वैधानिक तौर पर. इतने विधायकों के दम पर वे सरकार बना भले न सकें लेकिन विपक्ष के साथ मिलकर उसे गिरा ज़रूर सकते हैं. ऐसा वे ख़ुद करना चाहते भी हैं.

दो- मुख्य विपक्षी दल डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) सभी 22 विधानसभा सीटें जीत (ऐसे एकतरफ़ा नतीजे़ तमिलनाडु में अक़्सर आते हैं) जाए. तब उसकी अपनी सदस्य संख्या बढ़कर 110 हो जाएगी. उसके पास कांग्रेस के आठ और आईयूएमएल (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग) के एक विधायक का समर्थन पहले से है. इस तरह 119 विधायकों के साथ वह सरकार बना सकती है.

तीन- ख़बरों की मानें तो एआईएडीएमके में अब भी कुछ ऐसे मौज़ूदा विधायक हैं जो अंदरख़ाने दिनाकरण का समर्थन कर रहे हैं. पलानिसामी की सरकार इन विधायकों की विधानसभा सदस्यता रद्द कराकर सदन की सदस्य संख्या को फिर कम कर सकती है. ताकि वह नई जीती सीटों को मिलाकर जो भी उपलब्ध बहुमत हो, उसी के बलबूते आगे का सफर तय कर सके. बताया जाता है कि एआईएडीएमके के मुख्य सचेतक ने पार्टी के तीन विधायकों की सदस्यता रद्द करने की विधानसभा अध्यक्ष से सिफ़ारिश भी कर दी है.

अलबत्ता ये तमाम स्थितियां फौरी समाधान ही लगती हैं. क्योंकि इनमें से किसी में आश्वस्ति का यह भाव नहीं है कि तमिलनाडु की मौज़ूदा सरकार और विधानसभा 2021 तक का अपना कार्यकाल पूरा कर ही लेगी. शायद इसीलिए तमिल राजनीति में अगली सितारा भूमिका निभाने के लिए तैयार बैठे दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुपरसितारा रजनीकांत ने इसी महीने कहा भी, ‘मैं राज्य विधानसभा के चुनाव के लिए तैयार हूं. ये चुनाव जब भी होंगे, मेरी पार्टी सभी 234 (चुनाव इतने पर ही होता है) सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी.’