स्त्री की स्वतंत्रता और समकक्षता से, मुसलमान के भारतीय अस्तित्व से, दलितों के सम्मान और साहस से, ज्ञान-विज्ञान की स्वायत्तता से, भारतीय परंपरा की बहुलता और खुलेपन से, सर्वधर्म-समभाव से, भारतीय संविधान की स्वतंत्रता-समता-न्याय की मूल्यत्रयी से, गांधी-नेहरू की समावेशिता से, लेखकों-कलाकारों की निर्भीक अभिव्यक्ति से, भारतीय अर्थ और समाज व्यवस्था की दशकों की उपलब्धियों से- इन सबसे घृणा करने की एक नयी, अनौपचारिक भारतव्यापी पाठशाला पिछले पांच वर्षों में खुली है. इतनी घृणा, उसकी इतनी शक्ति और व्याप्ति पहले कभी नहीं रही जितनी आज है. तेज़ी से फैलायी गयी है. आज भारतीय नागरिक होने का अर्थ इस अनिवार्य घृणा का सामना करना है. घृणा दुर्भाव है और उससे बचने की सीख सारे धर्म और अध्यात्म देते हैं. पर अगर उससे बचना असंभव लगता हो तो उसके नकारात्मक आशय को विधेयात्मक बनाने का हुनर शायद इस तरह संभव है-

घृणा करो

उनसे जो तुम्हें दूसरों से घृणा करने के लिए उकसा रहे हैं,

उनसे जो घृणा को तुम्हारे धर्म की रक्षा की ढाल बना रहे हैं,

उनसे जो निरपराधों को

गोहत्या, लवजिहाद, गोमांस, विवाह, प्रेम आदि के नाम पर

बच्चों और स्त्रियों को, बूढ़ों और निहत्थों को,

दलितों और मुसलमानों को

मारपीट रहे हैं, हत्या और बलात्कार का शिकार बना रहे हैं;

घृणा करो उनसे जो तुम्हें हर दिन

आदमी से कई दरज़ा नीचे ढकेलकर अधआदमी बना रहे हैं

घृणा करो उन पंडितों, धर्माचार्यों, मौलवियों से

अपने धर्म-पाठ में हिंसा घुसा रहे हैं

घृणा करो उनसे जो धर्म, सम्प्रदाय, जाति, लिंग के नाम पर

लगातार फैलायी जा रही घृणा के बारे में चुप हैं,

उदासीन बेपरवाह निष्क्रिय हैं,

जो चुप रहकर घृणा की इस हत्यारी बिरादरी में शामिल हैं

घृणा करो उनसे

जो आस्था और बिरादरी के नाम पर,

वीरता और शौर्य के नाम पर,

शुद्धता और पवित्रता के नाम पर,

किसी देवता के नाम पर

तुम्हें मनुष्य होने से बरका रहे हैं

घृणा करो कि बहुत समय नहीं बचा है-

अगर तुम्हारे पास प्रेम और सहानुभूति का साहस नहीं बचा है

तो मनुष्यता भी कम ही होगी

घृणा करो

ताकि प्रेम बचा रहे

ताकि तुम बचा सको उस सबको

बाढ़ में डूब जाने से,

जो सदियों से संजोया-पोसा गया है

घृणा करो

उनसे जो जानबूझकर घृणा का पानी

कुसमय छोड़ रहे हैं

और हम सबके गलों तक पानी आ गया है...

शबो-रोज़ तमाशा’

लोकतंत्र का एक बड़ा अंतर्विरोध यह रहा है कि जो सत्ता लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर आती है, वह देर-सबेर उसी लोकतंत्र में कटौती करने की चेष्टा करने लगती है. हमारे संविधान ने लोकतांत्रिक सत्ता को अपनी मर्यादा में रहने के लिए बाध्य करने के उद्देश्य से एक ऐसा संस्थागत ढांचा बनाया था जो, सारे दबावों के बावजूद अब तक, कुल मिलाकर, कभी-कभार के अपवादों को छोड़कर, स्वायत्त और प्रभावशाली रहा है. भारतीय जनता पार्टी और संघ-परिवार की यह ऐतिहासिक उपलब्धि है कि उन्होंने इस ढांचे को लगभग ध्वस्त करने की लगातार चेष्टा की और उसमें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की. आम चुनाव के अलावा अब लोकतांत्रिक सत्ता लगभग पूरी तरह से निरंकुश हो गयी है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, केंद्रीय निगरानी आयुक्त, नीति आयोग आदि सभी पालतू और गोदी संस्थाएं हो गयी हैं. उनमें कार्यरत सरकारी अधिकारी, बिना संकोच, लाज-शरम या प्रतिरोध के, भाजपा सरकार की मुदित मन गुलामी करने में लगे हैं.

इस अभागी सूची में अब जुड़ गया है केन्द्रीय चुनाव आयोग. इतना कायर, दब्बू और कमज़ोर वह पहले कभी नहीं हुआ. कोशिश तो सर्वोच्च न्यायालय को भी नाथने की होती रही है पर उसमें सफलता नहीं मिल सकी है, हालांंकि सर्वोच्च न्यायालय भी अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर हस्तक्षेप न करने का तकनीकी औचित्य अपनाकर निरंकुश सत्ता की मदद ही करता जान पड़ता है.

आचरण संहिता इस समय अपने उल्लंघन के रोज़ाना उल्लंघन के रूप में ही लागू है. पुलवामा और बालाकोट के नाम पर खुल्लमखुल्ला शिखर से वोट मांगा जा रहा है. एक मुख्यमंत्री, अपने एक सांप्रदायिक वक्तव्य के बारे में आयोग की चेतावनी को धता बताते हुए, चुनाव को बजरंग बली और अली के बीच मुक़ाबला बता रहा है. एक चैनल, बिना क़ानूनी मंजूरी के, चल रहा है, शुद्ध प्रचार के रूप में. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने हिन्दू-जैन-सिख-बौद्ध को छोड़कर सभी अन्य धर्मों के लोगों को देश निकालने की गर्जना की है. चुनाव आयोग हाथ पर हाथ धरे देख रहा है. उसकी चेतावनी का अगर कोई असर नहीं है तो उसे इस बारे में मुखर और सक्रिय होने से कौन रोक रहा है? जब सारी मयार्दाओं का सिरे से सत्ता उल्लघंन कर रही है तो आयोग उसके बारे में प्रतीकात्मक वक्तव्य देकर, वह भी देर और स्पष्ट अनिच्छा और हिचक से, उसकी एक तरह की ताईद (समर्थन) ही कर रहा है. यह अभूतपूर्व पतन है.

अपने समूचे इतिहास में चुनाव आयोग इतना कायर, निष्क्रिय और दब्बू पहले कभी नहीं हुआ. उसकी संवैधानिक सत्ता और प्रतिष्ठा दोनों धूल में मिलायी जा रही है और सत्ता के अलावा स्वयं आयोग उसमें हिस्सेदार है. यह शर्मनाक है. मुझे याद आता है कि अपनी प्रशासनिक सेवा के अन्तिम चरण में मुझे एक आबजर्वर के रूप में हरियाणा के एक विधानसभा क्षेत्र में आयोग ने दशकों पहले भेजा था. टीएन शेषन ने हमसे बात करते हुए कहा था कि आप अनियमितता रोक नहीं सकते पर उसे लेकर फ़ौरन भौंक सकते हैं! क्या आयोग को अपने एक पूर्ववर्ती यशस्वी की यह सलाह आज दी जा सकती है. हर तरह से, हर मंच पर भौंकिये. इस समय आपकी और लोकतंत्र की प्रतिष्ठा दांव पर है और आप लगभग चुप रहकर उसे ध्वस्त करने में शामिल माने जायेंगे. यह ‘मजबूत’ सरकार हर संस्था को ‘मजबूर’ कर रही है.

अगर चुनाव आयोग में, उसके वर्तमान पदाधिकारियों में कर्तव्यनिष्ठा, स्वाभिमान, साहस, संविधान के प्रति निष्ठा बचे हैं तो उसे वर्तमान माहौल में एक अप्रत्याशित क़दम उठाना चाहिये. उसे राष्ट्र के नाम सन्देश देना चाहिये जिसमें प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष, उप्र के मुख्यमंत्री और अन्य दलों के नेताओं द्वारा जो भड़काऊ, साम्प्रदायिक, संविधानविरोधी, स्वयं आयोग की सलाह की अवमानना आदि करते हुए बयान दिये जा रहे हैं, उनका विरोध और निन्दा हो ताकि चुनाव की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा हो सके और सभी दलों के बीच स्वस्थ स्पर्धा के लिए समान ज़मीन बन सके. ऐसा राष्ट्रीय सन्देश दूरदर्शन और सभी चैनलों से प्रसारित और सभी अख़बारों में प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित करने के आयोग के स्पष्ट निर्देश होने चाहिये.

‘भारत के लिए लड़ते हुए’

भारत के लिए लड़ने का दावा बहुत सी शक्तियां कर रही हैं, कर सकती हैं. सेना, भाजपा, राष्ट्रीय सेवक संघ आदि सभी लड़ते नज़र आते हैं. सेना सीमाओं पर मुस्तैदी से लड़ रही है और हर दिन, प्रायः हर दिन एक न एक सैनिक की बलि देती रहती है. भाजपा-संघ गठबंधन ने स्वयं कोई बलिदान नहीं किया है. वह दूसरों को मारने या हाशिये पर ढकेल देने या समाज और देश से बाहर निकालने के लिए लड़ रहे हैं. यह लड़ाई भारत को बचाने की नहीं उसे देर-सबेर एक हिन्दू राष्ट्र बनाने की लड़ाई है. अल्पसंख्यकों-स्त्रियों-दलितों-आदिवासियों-बुद्धिजीवियों आदि के साथ हिंसा, हत्या और बलात्कार, घृणा आदि उसी उपक्रम के रूप हैं.

एक और लड़ाई है जो भारत के लिए लेखक-कलाकार-बुद्धिजीवी आदि सजग नागरिक के रूप में लड़ रहे हैं- यह लड़ाई एक ऐसे भारत को बचाने-बढ़ाने के लिए है जो समावेशी, धर्मबहुल, भाषाबहुल, हर व्यक्ति की गरिमा, बराबरी, न्याय आदि पर आधारित भारत है जो बल पर नहीं बुद्धि पर, घृणा पर नहीं प्रेम और पारस्परिकता पर, हिंसा पर नहीं अहिंसा पर, कल्पित-इच्छित इतिहास पर नहीं भारतीय परम्परा की अदम्य बहुलता पर आधारित है. यह भारत एक खुला भारत है जिसमें स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्य निर्धारक तत्व हैं, जो बहुसंख्यकता बाद के बरक्स लोकतांत्रिक वृत्ति का आग्रह करता है. इस लड़ते हुए भारत की छबियां, कठिनाइयां और बाधाएं, विश्वास और उम्मीदें एक नयी पुस्तक में संकलित हैं जो स्पीकिंग टाइगर ने गीता हरिहरन और सलीम यूसुफ़जी के संपादन में ‘बैटलिंग फ़ॉर इण्डिया’ शीर्षक से प्रकाशित की है. उसमें शान्ता गोखले, के सच्चिदानन्दन, नयनतारा सहगल, शशि देशपाण्डे, उदयप्रकाश, मीना एलेक्ज़ैण्डर, प्रबीर पुरकायस्थ, हर्ष मन्दर, प्रभात पटनायक, पी साईंनाथ, केकी दारूवाला, अनिल सद्गोपाल आदि की रचनाएं मूल अंग्रेज़ी या अनुवाद में शामिल हैं.

सभी जानते हैं कि भारत के लिए लड़ने का यह उपक्रम कई दशकों से चलता रहा है क्योंकि भारतीयता पर संकट, एक तरह से, महात्मा गांधी की 1948 में हत्या से शुरू हुआ था और कमोवश रहता आया है. हाल के वर्षों में उसने नयी प्रखरता और तात्कालिकता पायी है क्योंकि भारत की समावेशी अवधारणा पर लगातार प्रहार करनेवाली शक्तियां सत्तारूढ़ हो कर पूरी बेशरमी से एक क्रूर हिंसक अभियान इस भारत को सीमित करने, उसकी समावेशिता को घटाने, उसकी स्वतंत्रता-समता-न्याय की मूल्यव्यवस्था में कटौती करने और स्वयं लोकतंत्र को एक जवाबदेह व्यवस्था से बदलकर गोदी व्यवस्था में बदलने का पूरी उग्रता से चला रही हैं. यह पुस्तक इसके विरुद्ध एक आह्वान है, चेतावनी भी कि अगर नागरिकों ने सचेत होकर प्रतिरोध नहीं किया तो आशंका सच्चाई में बदल जायेगी. यह प्रतिरोध का एक नया दस्तावेज़ है जो यह भी बताता है कि प्रतिरोध कितना व्यापक, सशक्त और सक्रिय है. आशाप्रद भी.