निर्देशक : सार्थक दासगुप्ता

लेखक : सार्थक दासगुप्ता, गौरव शर्मा (संवाद)

कलाकार : मानव कौल, अमृता बागची, दिव्या दत्ता, नीना गुप्ता, निहारिका दत्त

रेटिंग : 3/5

कुछ फिल्में खुद को फिल्में मानकर नहीं रचतीं. इसलिए वे फिल्मों वाला असर भी नहीं रखतीं. उन्हें देखना किसी किताब को ‘इंटिमेट’ होकर पढ़ने जैसा अनुभव होता है. सिनेमाई जादूगरियों से आगे बढ़कर वे विजुअल्स से ज्यादा किसी जहीन किताब में लिखे शब्दों को एकांत में इत्मिनान से पढ़ने वाला सुख देती हैं.

‘म्यूजिक टीचर’ में वैसे तो मनाली के निहायत ही खूबसूरत विजुअल्स मौजूद हैं – इतने कि गर्मी के इस मौसम की शुरुआत में ही आपका मन पहाड़ों की तरफ भाग जाने का करेगा – लेकिन उनसे आगे बढ़कर यह फिल्म अपने मुख्य किरदार के अकेलेपन और उसकी असफलताओं से उपजी खलिश का उम्दा चित्रण करने की वजह से दिल में उतरती है. इस कसक को टटोलते हुए यह फिल्म एक प्रौढ़ म्यूजिक टीचर की बारीक कैरेक्टर-स्टडी किसी सुघड़ नॉवल की तरह रचती है और मानव कौल अभिनीत यह किरदार फिल्म की कमियों से आगे निकलकर आपके साथ लंबे वक्त तक शॉल ओढ़े चलता रहता है. कभी-कभी तो, रेडियो बंद करके खुद ही ‘फिर वही रात है’ नाम का गीत गुनगुनाने लगता है.

एक जमाने में ‘द ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई’ (2007) नाम की इंडी फिल्म बनाने वाले निर्देशक सार्थक दासगुप्ता की दूसरी फिल्म ‘म्यूजिक टीचर’ का शिल्प पहली फिल्म से बेहद मुख्तलिफ और निखरा हुआ है. उनका कैमरा (कौशिक मंडल) मनाली की ‘फिल्मी’ लोकेशन्स की जगह ऊंचे-ऊंचे दरख्तों के बीच घूमता हुआ मिलता है और स्थानीय जीवन को पकड़ने की उम्दा कोशिश करता है. जिन घरों में किरदार बसते हैं, जिन सड़कों पर वे चलते हैं, वे आपको बॉलीवुड की किसी फिल्म का हिस्सा न लगकर रस्किन बांड जैसे लेखकों की उन किताबों का हिस्सा लगते हैं जिनमें पहाड़ों के जीवन का सूक्ष्म चित्रण मौजूद होता है. इसके किरदार आज के होकर भी खुद को इंस्टाग्राम, ट्विटर और मोबाइल फोन से दूर रखते हैं और आप यह जानते हुए भी कि ऐसा होना मुमकिन नहीं है, इन आधुनिक चीजों के न होने से उपजी सरलता को पसंद करने लगते हैं.

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गुरु-शिष्य के बीच के रिश्तों पर संगीत की टेक लेकर केवल हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ही कई फिल्में बनी हैं. ‘अभिमान’ (1973) से लेकर ‘सुर’ (2002) और ‘आशिकी 2’ (2013) तक ने बड़ी उम्र के अनुभवी गायक और मासूम व अनगढ़ कम उम्र की शिष्या के बीच के डायनेमिक्स को खूब एक्सप्लोर किया है. ‘म्यूजिक टीचर’ इसी जाने-पहचाने टेम्पलेट के इर्द-गिर्द की ही कहानी कहती है और ‘अ स्टार इज बॉर्न’ (2018) जैसी परतदार अमेरिकी फिल्म वाले वर्तमान दौर में इस थीम के इर्द-गिर्द बुनी गई एक सरल कहानी से ज्यादा नहीं हो पाती.

लेकिन, नेटफ्लिक्स की इस मौलिक हिंदी फिल्म की खास बात इसके मुख्य किरदार (बेनी माधव) के आंतरिक द्वद्वों को खूबसूरती से उकेरा जाना है. इस किरदार की लिखाई में ढेर सारे ऐसे व्यवहारिक शेड्स और खलिश मौजूद हैं कि अलग-अलग किस्म के दर्शकों को उसमें अपने लिए कुछ न कुछ जरूर मिलेगा. हिंदी फिल्म संगीत में नाम कमाने का सपना, प्यार को भूलकर अपने इस सपने को अपनी शिष्या की आंखों में देखने की बदहवासी, अपना छोटा-सा शहर छोड़कर मुंबई वापस न जा पाने की सतत टीस (‘ये पहाड़ मर चुके हैं’), आर्टिस्ट की तरह आजाद ख्याल होकर कभी नौकरी नहीं करने की परम सौगंध, और प्यार को खोने की आठ साल लंबी कसक जो आठ साल लंबे ‘इंतजार’ के चलते उसे वक्त से पहले बूढ़ा बना रही है.

फिर पहाड़ों में रहने वाले स्थानीय लोगों में बसने वाली मासूमियत को भी मानव कौल बेहिसाब तन्मयता से चेहरा देते हैं. एक सीन में दिव्या दत्ता का पड़ोसी किरदार उनसे कहता है कि रात में जब वे गाना गाते हैं तो उसे वे गाने बहुत भाते हैं. पलटकर बेनी माधव चेहरे पर नायाब अचरज ओढ़कर कहता है कि ‘आवाज यहां तक आती है!’ बाद में भी इस विषय से जुड़ी एक और मासूम बात जब यह किरदार कहता है, तो उसे सुनकर आप इस ‘पहाड़ी’ मासूमियत पर फिदा हो जाते हैं.

दिव्या दत्ता हाल ही में शहर से मनाली लौटीं धीमी आवाज में बात करने वाली एक शादीशुदा महिला के रोल में हैं जिनके साथ मानव कौल के किरदार के कई सुंदर दृश्य हैं. यह किरदार बेनी माधव के किरदार के अधूरेपन को पूरा करने की कोशिश करता है और दिव्या दत्ता इस रोल में खूब फबती हैं. पितृसत्ता के नियम-कायदों पर प्रहार करने वाला अंतिम-संस्कार से जुड़ा उनका एक सीन तो एकदम लाजवाब है और उसी स्तर का उनका लाजवाब व निर्भीक अभिनय पूरी फिल्म में हमारी नजर होता है.

मानव कौल की शिष्या के रोल में अमृता बागची नाम की नई अभिनेत्री नजर आई हैं जिनका कि सफल गायिका का किरदार जोनाई आठ साल बाद मुंबई से अपने गृह-नगर मनाली एक म्यूजिक शो के लिए आने वाला है. उसके आने से ही नायक के सीने में जज्ब इमोशन्स वापस सतह पर आकर तूफान का रूप ले लेते हैं. कभी मनाली में रही बिंदास, पागलों-सी हंसी हंसने वाली बंगाली लड़की के रोल में अमृता बागची प्रभावशाली अभिनय करती हैं. आप महसूस कर पाते हैं कि जिस लड़की के लिए नायक आठ साल तक इंतजार करता रहा, वो यह नायिका हो सकती है.

हालांकि कहानी नायिका के नजरिए से नहीं कही गई, इसलिए वे फिल्म में कम मौजूद हैं और उनकी तरफ की कहानी दर्शकों को देखने-सुनने को कम मिलती है. जिस एक महत्वपूर्ण सीन तक पहुंचने के लिए फिल्म शुरू से लेकर आखिर तक अपना कथा-संसार शिद्दत से रचती है, वहां पहुंचकर भी बागची का अभिनय थोड़ा निराशाजनक मालूम होता है. मानव कौल तो अपना सबकुछ उस क्लाइमेक्स वाले सीन में देते हैं (‘तुम्हारा इंतजार बहुत सुंदर है’) और दर्शकों को खालीपन से लबरेज कर देते हैं. लेकिन कमजोर लिखाई के चलते न सिर्फ यह महत्वपूर्ण सीन कम असर रखता है बल्कि नायिका का औसत अभिनय भी अखरता है.

फिल्म की कुछ और उल्लेखनीय कमियों में से एक तो कहानी का जाना-पहचाना होना है और दूसरा औसत संगीत का उपयोग. संगीत आधारित फिल्मों में मौलिक गीतों का होना फिल्म का स्तर बहुत ऊंचा उठाता रहा है. याद करिए कि ‘सुर’ जैसी मेलोड्रामा-ग्रसित फिल्म का स्तर एमएम क्रीम के संगीत और लकी अली की आवाज से कितना ज्यादा ऊंचा हुआ था. लेकिन ‘म्यूजिक टीचर’ में दो साधारण से मौलिक गीतों के अलावा बाकी दो गाने पुराने हिंदी फिल्म गीतों के नए संस्करण भर हैं. इनमें से पापोन का गाया ‘फिर वही रात है’ तो अपनी गायकी और फिल्मांकन की खूबसूरती से सीधे दिल में उतरता है, लेकिन यही बात आप बेहद फिल्मी लगते ‘रिमझिम गिरे सावन’ के लिए नहीं कह सकते. जिस सिचुएशन पर यह आता है उस पर कोई मौलिक गीत ज्यादा फबता.

‘म्यूजिक टीचर’ फिर भी अपनी कमियों से ऊपर उठ जाती है, क्योंकि उसके पास मानव कौल हैं. लेखक-अभिनेता मानव कौल की लिखी किताबें अगर आप पढ़ेंगे तो उनमें ठहराव और दर्शन की सतत मौजूदगी के अलावा विनोद कुमार शुक्ल जैसा लिखने की इच्छा को भी मौजूद पाएंगे. और जो शख्स विनोद कुमार शुक्ल का मुरीद हो वो आम से किरदारों की खासियतें पकड़ने में दक्ष हो ही जाता है!

शायद इसलिए भी, एक आम इंसान बेनी माधव का किरदार निभाते वक्त जितनी कामयाबी से दिलचस्प शारीरिक मुरकियों का उपयोग मानव कौल करते हैं, उतना ही अकेलेपन और अधूरेपन को जी रहे उस किरदार के मेंटल स्पेस का खाका खींचने में भी कामयाब रहते हैं. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वे बेनी माधव के किरदार को जीते हैं और अभिनय से दो-चार कदम आगे का कुछ करते हैं. हमने अब तक उन्हें इतनी फिल्मों में तो देख ही लिया है कि उनके एक्सप्रेशन्स को ‘प्रिडिक्ट’ करना आसान हो चुका है. लेकिन बावजूद इसके वे अपने किरदार के आंतरिक द्वंद्वों को चेहरा देते वक्त कई बार चौंका जाते हैं. ये एक्सप्रेशन्स जिन मानव कौल को हम जानते हैं उनके मालूम नहीं होते.

और ऐसा होना तभी मुमकिन होता है जब एक अभिनेता अभिनय के आगे का कुछ अपने किरदारों में शामिल करता है. अपनी आत्मा?

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