ठाकुर नाथू सिंह राठौड़ ब्रिटेन की सैंडहर्स्ट रॉयल मिलिट्री एकेडमी से पास आउट होने वाले दूसरे भारतीय ऑफ़िसर थे जो 3 स्टार रैंक वाले जनरल बने. पहले थे राजेन्द्र सिंह जड़ेजा जो केएम करिअप्पा के बाद सेनाध्यक्ष हुए. ठाकुर नाथू सिंह के साथ यह तथ्य भी जुड़ा हुआ है कि वे ऐसे अधिकारी थे जिन्हें सरकार ने पहला सेनाध्यक्ष बनने का मौका दिया था पर उन्होंने करिअप्पा को अपना वरिष्ठ बताते हुए उनके लिए यह पद छोड़ दिया. नाथू सिंह राठौड़ की शख़्सियत में और भी कई रंग हैं जो उन्हें देश के सबसे चर्चित फ़ौजी अफ़सरों में से एक बनाते हैं.

राष्ट्रवाद ब्रिटिश इंडियन आर्मी से बढ़कर

नाथू सिंह के लिए राष्ट्र सेवा से भी बढ़कर राष्ट्र था. बात चौंकाने वाली लग सकती है पर हक़ीक़त यही है. 1921 में सैंडहर्स्ट एकेडेमी में ट्रेनिंग के दौरान ब्रिटिश जनरल ने भाषण देते हुए कहा कि चूंकि अंग्रेज़ लंबे समय के लिए हिंदुस्तान में रहने वाले हैं, इसलिए जो काबिल हैं, वही भारतीय फ़ौज ज्वाइन करें. बताया जाता है कि यह सुनकर नाथू सिंह कमांडेंट के पास गए और कहा कि अगर अंग्रेज़ भारत नहीं छोड़ने वाले तो वे सेना में कमीशन लेने के इच्छुक नहीं हैं.

अपने राष्ट्रवादी नज़रिए के लिए अकादमी में नाथू सिंह राठौड़ को बाग़ी के तौर पर ही देखा जाता जबकि उनके साथ ट्रेनिंग लेने वाले भारतीय कैडेट्स उन्हें फ़ौजी गांधी कहते. मेजर जनरल वीके सिंह ‘लीडरशिप इन इंडियन आर्मी’ में लिखते हैं कि यह तमगा उन्हें पसंद नहीं था और वे सुभाष चंद्र बोस को पसंद करते थे.

सैंडहर्स्ट से पास होने के बाद सेकेंड लेफ्टिनेंट नाथू सिंह राठौड़ ने 1/7 राजपूत राइफल्स ज्वाइन की. वे राजपूत थे और राजपूताना (राजस्थान) की डूंगरपुर रियासत से ताल्लुक रखते थे. ख़ुद को ऊंची जाति का मानने के कारण एक बार उन्होंने ऑफ़िसर्स मेस में अंग्रेज़ों के साथ खाना खाने से मना कर दिया और इस वजह से उन्हें फ़ौज से बर्खास्त किए जाने की नौबत आ गई थी. पर उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और अकादमी में रिकॉर्ड को देखते हुए उन्हें दूसरा मौका दिया गया. फिर इसके बाद कभी कोई शिकायत नहीं आई.

भारतीय फ़ौज में होते हुए भी नाथू सिंह राठौड़ इंडियन नेशनल कांग्रेस के चोटी के नेताओं से संपर्क में रहे. कहते हैं कि एक दफ़ा उन्होंने मोतीलाल नेहरु से फ़ौज छोड़कर राजनीति में आने की इच्छा जताई पर मोतीलाल ने यह कहकर उन्हें मना कर दिया कि आजादी के बाद देश को सेना के लिए अच्छे अफ़सरों की ज़रूरत रहेगी. ध्यान देने की बात है कि जनरल थिमय्या को भी मोतीलाल नेहरू ने यही सलाह दी थी.

कैसा है साहिब?

नाथू सिंह फ़ौजी कैप नहीं लगाते थे उन्हें राजपूती साफ़ा पसंद था. इससे जुड़े क़िस्से को समझने के लिए एक बात बताना ज़रूरी है. भारतीय सेना में जो अफ़सर सैंडहर्स्ट से पासआउट होते थे उन्हें किंग्स कमीशंड ऑफ़िसर (केसीओ) और जो इंडियन मिलिट्री अकादमी से पासआउट थे उन्हें वाइसराय कमीशंड ऑफ़िसर (वीसीओ) कहा जाता था. वीसीओ को ब्रिटिश अफसर ‘साहिब’ कहकर बुलाते. एक दफ़ा कमांडर-इन-चीफ़ फ़ील्ड मार्शल सर विलियम बर्डवुड गार्ड ऑफ़ ऑनर ले रहे थे. साफ़ा पहने नाथू सिंह को देख कर बर्डवुड ने कहा ‘कैसा है, साहिब?’ वे तुरंत जवाब देते हुए बोले, ‘बहुत अच्छा है, साहिब’. जब उनको बताया गया कि नाथू सैंडहर्स्ट से पासआउट हैं तो ग़लती सुधारते हुए वे बोले- ‘हाउ आर यू, मिस्टर नाथू सिंह?’ नाथू ने फिर जवाब दिया: ‘वैरी वेल, सर’

गांधी से मुलाकात

आज़ादी के बाद उन्हें कुरुक्षेत्र में शरणार्थी शिविर की देखभाल करने का ज़िम्मा मिला जहां तकरीबन 20000 शरणार्थी रह रहे थे. एक दिन यहां निरीक्षण पर आईं एडविना माउंटबेटन उनके काम से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने महात्मा गांधी को यह कैंप देखने का न्यौता दिया. नाथू सिंह राठौड़ ने गांधी से उस ऐतिहासिक मुलाकात में कई सवाल पूछ लिए, मसलन उनका अहिंसा का सिद्धांत इस माहौल में कैसे काम करेगा? 1921 में उन्होंने (गांधी) किस आधार पर कहा था कि एक साल में आज़ादी मिल जाएगी. क्यों नहीं मिली? बताते हैं गांधी के पास कोई उत्तर नहीं था.

सेनाध्यक्ष बनने से इंकार

1946 में तत्कालीन ब्रिटिश कमांडर औचिनलेक ने नाथू सिंह राठौड़ को पहला कमांडर इन चीफ़ बनाने का प्रस्ताव दिया था. जब तत्कालीन रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह ने उन्हें यह सूचना दी तो उन्होंने कहा कि वे इस पद को पाकर यकीनन ख़ुशकिस्मत समझेंगे पर वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते. पूछने पर उन्होंने बताया कि लेफ्टिनेंट जनरल करिअप्पा उनसे कुछ महीने वरिष्ठ हैं और क़ाबिल भी. संभव है उन्हें उम्मीद रही हो कि उन्हें अगला सेनाध्यक्ष बनाया जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ और वे लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर हो गए.

जब उन्होंने विभाजन को भारत मां का बलात्कार कहा

राष्ट्रवादी नाथू सिंह ने देश और सेना के विभाजन पर बड़ी बेबाक राय दी. बलदेव सिंह को लिखे पत्र में कहा कि देश का विभाजन भारत मां के बलात्कार समान है. सेना के मुल्कों में बांटे जाने पर उन्होंने लिखा कि इससे कुछ ही सालों में देश में गृह युद्ध के हालात पैदा हो जाएंगे. जनरल वीके सिंह लिखते हैं कि उन्होंने नेहरू और अन्य नेताओं द्वारा विभाजन के मसले पर सेना की राय न लेने के लिए उन्हें कभी माफ़ नहीं किया.

जब नेहरू के प्रधानमंत्री बनने पर सवाल खड़ा कर दिया

नाथू सिंह राठौड़ और जवाहरलाल नेहरू के बीच रिश्ते कभी सामान्य नहीं थे. फिर चाहे वह कश्मीर का मुद्दा रहा हो या सेना का भारतीयकरण. 1948 में जब कश्मीर में कबायलियों का आक्रमण हुआ तो उन्होंने नेहरू को लाहौर पर आक्रमण करने का सुझाव दिया. नाथू सिंह का मानना था कि इस सूरत में पकिस्तान सरकार समझौता करने पर मजबूर हो जाएगी. नेहरू ने उनके सुझाव को सिरे से खारिज कर दिया. वीके सिंह लिखते हैं कि 1965 की भारत-पाक लड़ाई में लाल बहादुर शास्त्री ने भारतीय सेना के इसी प्लान को मंज़ूरी दी थी और यह कामयाब हुआ था. जब सेना लाहौर से कुछ ही किलोमीटर दूर रह गई तो घबराकर पाकिस्तान ने युद्ध विराम की अपील कर दी थी.

जवाहरलाल नेहरू ने कई दफ़ा फ़ौज के आधुनिकीरण और सशक्तिकरण की बात तो कही थी पर वास्तव में इसके कोई संजीदा प्रयास नहीं किये थे. शायद उन्हें लगता था कि लोकतंत्र में फ़ौज को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए. पकिस्तान के सैन्य इतिहास के जानकार परवेज़ हुडबॉय कहते हैं कि भारतीय कमांडर इन चीफ़ के बंगले को अपना आधिकारिक निवास बनाना इस बात को दर्शता है कि नेहरू लोकतांत्रिक ढ़ांचे में फ़ौज को किस स्थान पर रखना चाहते थे. नेहरू का नज़रिया पूर्णतया ग़लत नहीं था. दक्षिण एशिया और अफ्रीका के मुल्कों में आज़ादी के कुछ समय बाद लोकतांत्रिक सरकारों के तख़्ता के बाद फ़ौजी शासन लागू हो गए थे. पर सेना की हद तक की अनदेखी भी उचित नहीं. चीन से हुए युद्ध में हमारी हार इसकी मिसाल कही जा सकती है.

नाथू सिंह राठौड़ और जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा एक बड़ा मशहूर वाकया है. एक उच्चस्तरीय बैठक में ये दोनों मौजूद थे. नेहरू ने सेना में पेशेवर भारतीय अफ़सरों की कमी के चलते पाकिस्तान की तरह ब्रिटिश अफ़सरों की मौजूदगी बरक़रार रखने का का प्रस्ताव दिया. नाथू सिंह ने तुरंत कहा कि जो भारतीय अफ़सर इस मीटिंग में मौजूद हैं उन्हें 25 वर्षों का फ़ौजी अनुभव है और वे वरिष्ठ पदों को सुशोभित कर सकते हैं. आगे उनका कहना था, ‘और रही बात तजुर्बे की, तो क्या आपको प्रधानमंत्री बनने का तजुर्बा है?’ मीटिंग में सन्नाटा छा गया. पर अंततः नेहरू का प्रस्ताव ही स्वीकार किया गया था.

इतिहास गवाह है कि कश्मीर युद्ध के दौरान भारतीय सेना के तत्कालीन अध्यक्ष रॉय के बुचर, जो कि ब्रिटिश नागरिक थे, ने पाकिस्तान सेना के ख़िलाफ़ लड़ने से मना कर दिया था क्योंकि उधर भी अंग्रेज़ अफ़सर ही थे. इसी प्रकार जब सरदार पटेल ने हैदराबाद पर कार्रवाई करने का आदेश दिया था तो तब भी बूचर ने आनाकानी की थी. यह अलग बात है कि टेल के आगे उनकी नहीं चली.

यूरोप से लैंडरोवर गाड़ी मंगवाई

नाथू सिंह राठौड़ को लैंडरोवर कार बड़ी पसंद थी. उनके बेटे लैंडरोवर को सड़क के रास्ते यूरोप से भारत लाये. पाकिस्तानी सीमा में घुसने से पहले उन्हें रोक दिया गया. तब नाथू सिंह ने अपने दोस्त पाकिस्तानी जनरल अयूब ख़ान को फ़ोन किया. जब तक गाड़ी पाकिस्तानी सीमा में रही, अयूब ने उसके साथ मिलिट्री की पायलट जीप को चलने का निर्देश दिया. आज के दौर की बात होती तो कई नाथू सिंह को देशद्रोही कह देते कि वे पाकिस्तानी जनरल के दोस्त हैं.

खैर, इस क़िस्से को समेटा जाए. ठाकुर साहब के बाग़ी और बेबाक तेवर अफ़सरों को कम पसंद आते थे और इस वजह से वे सेना की सर्वोच्च कुर्सी पर नहीं बैठ सके, जबकि ब्रिटिश कमांडर औचिनलेक के वे सबसे पसंदीदा भारतीय अफ़सर थे और उन्होंने ही ‘बाग़ी’ नाथू सिंह को कमांडर इन चीफ बनाने का सुझाव दिया था. अंग्रेजों का सेंस ऑफ़ जस्टिस बेहद कमाल का था. हिंदुस्तान में अब तो सुदर्शन फ़ाकिर की ग़ज़ल का शेर मौज़ूं होता है, ‘मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है, क्या मेरे हक़ में फ़ैसला देगा.’