लोकसभा चुनाव 2019 में एक भी प्रत्याशी नहीं उतारने वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के प्रमुख राज ठाकरे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ख़िलाफ़ अपनी रैलियों को लेकर चर्चा में हैं. इनमें वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ख़ास तौर पर निशाना साधते हैं. राज ठाकरे भाजपा के सबसे बड़े नेता के चुनावी वादों और कामकाज से जुड़े वीडियो दिखाते हैं और ‘ज़मीनी हक़ीक़त’ से लोगों को रूबरू कराते हैं. जानकार कह रहे हैं कि पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की जम कर वकालत करने वाले राज ठाकरे अपनी रैलियों के ज़रिये इस बार भाजपा के लिए सिरदर्द साबित हो सकते हैं.

नरेंद्र मोदी और भाजपा के ख़िलाफ़ राज ठाकरे की रैलियों का प्रभाव कैसा है, इस बारे में आउटलुक की एक रिपोर्ट कहती है, ‘राज ठाकरे ने अपनी रैलियों से इतने लोगों और यूट्यूब यूज़र्स का ध्यान खींचा है, जितना महाराष्ट्र के किसी बड़े वरिष्ठ नेता ने नहीं खींचा.’ एमएनएस प्रमुख की रैलियों से भाजपा ख़ेमे में कितनी घबराहट है, इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि पार्टी ने चुनाव आयोग से शिकायत कर कहा है कि वह जांच करे कि राज ठाकरे की रैलियों के लिए पैसा कौन दे रहा है.

अघोषित चुनावी रणनीति का हिस्सा?

राज ठाकरे अपनी जनसभाओं में दावा कर रहे हैं कि उनके मोदी-विरोध की वजह देश का लोकतंत्र बचाना है. लेकिन जानकार उनके इस रुख़ को एक अघोषित चुनावी रणनीति से जोड़ते हैं. दरअसल, पिछले साल फ़रवरी में राज ठाकरे ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार की पार्टी एनसीपी के साथ जाने के संकेत दिए थे. कुछ समय पहले लोकसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर एनसीपी और एमएनएस के बीच बातचीत की ख़बरें भी आई थीं. इस बारे में हफ़िंग्टन पोस्ट (एचपी) की एक रिपोर्ट एनसीपी के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से बताती है, ‘इस पर बातचीत हुई थी कि एमनएनस को कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में शामिल किया जाए या नहीं. मुंबई में कांग्रेस और एनसीपी दोनों के संगठन मज़बूत नहीं हैं, जबकि चुनावी नुक़सान के बावजूद एमएनएस का जनाधार मज़बूत है.’

इसके बावजूद एमएनएस को गठबंधन में शामिल क्यों नहीं किया गया, इसे लेकर एनसीपी नेता का कहना था, ‘क्योंकि ऐसा करने से वे (कांग्रेस-एनसीपी) महाराष्ट्र में रह रहे उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के वोट खो सकते थे. अब ऐसा करने के बजाय कांग्रेस नेता हमसे अपने चुनाव क्षेत्रों में राज ठाकरे की रैलियां आयोजित कराने की बात कह रहे हैं.’ वहीं, यह कहते हुए कि यह सब ‘बहुत अच्छे से मैनेज किया जा रहा है’, नेता ने कोई और जानकारी दी.

उधर, बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में यह पूछे जाने पर कि एमएनएस की रैलियों से कांग्रेस-एनसीपी को फ़ायदा हो रहा है, राज ठाकरे कहते हैं, ‘होने दो. मेरे भाषण आज पूरे देश में हैं. मेरे भाषणों के क्लिप दूसरी भाषाओं में दिखाई जा रही हैं. तो वहां (दूसरे राज्य) की जो पार्टियां हैं उनको भी तो फ़ायदा होगा. आप कांग्रेस-एनसीपी को लेकर क्यों बैठे हैं?’

विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए आम चुनाव में मोदी का विरोध?

मोदी सरकार को लेकर राज ठाकरे के इस रुख़ के पीछे की एक और वजह महाराष्ट्र का विधानसभा चुनाव भी है. जानकारों की मानें तो एमएनएस प्रमुख राज्य के चुनाव से पहले शिवसेना के नाराज़ धड़े को अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं. उनका कहना है कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के नेता और कार्यकर्ता लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा से गठबंधन करने को लेकर ख़ासे नाराज़ हैं.

एचपी ने अपनी रिपोर्ट में एक वरिष्ठ पत्रकार के हवाले से इसकी वजह भी बताई है. नाम नहीं ज़ाहिर करने की शर्त पर पत्रकार ने कहा, ‘उद्धव साढ़े चार सालों तक भाजपा को कोसते रहे. लेकिन फिर उसी से गठबंधन भी कर लिया. शिवसेना कैडर का बड़ा वर्ग इससे चिंतित और निराश हैं. अगर राज, मोदी को लेकर आक्रामक रुख़ अपनाए रहते हैं तो अक्टूबर में विधानसभा चुनाव से पहले यह वर्ग उनकी तरफ़ जा सकता है.’

वहीं, आउटलुक की रिपोर्ट में पत्रकार रहे कांग्रेस के राज्यसभा सांसद कुमार केतकर कहते हैं, ‘वे (शिवसेना कार्यकर्ता व नेता) अंदर से समझ सकते हैं कि राज (ठाकरे) क्या कह रहे हैं. उनसे उनका नाता भी है. वे पिछले तीन साल अपनी आलोचना पर क़ायम हैं और गठबंधन को लेकर उनका स्टैंड साफ़ है.’

कई जानकारों की राय में अगर एमएनएस की मौजूदा स्थिति देखें तो राज ठाकरे के मोदी-विरोध की ज़्यादा मज़बूत वजह सामने आती है. साल 2006 में शिवसेना से अलग होने के बाद राज ठाकरे ने अपनी पार्टी बनाई. साल 2009 में पार्टी ने विधानसभा चुनाव लड़ा और 13 सीटें जीतीं. लेकिन 2014 में यह संख्या एक रह गई जो जल्दी ही शून्य में बदल गई, क्योंकि एमएनएस के एकमात्र विधायक चुनाव जीतने के कुछ ही समय बाद शिवसेना में चले गए. फिर 2017 के निकाय चुनाव में एमएनएस नासिक की मेयर सीट हार गई. उसके बाद दलबदलू नेताओं ने फिर राज ठाकरे को झटका दिया जब उनकी पार्टी के पार्षद भी शिवसेना में शामिल हो गए.

साफ़ है कि 2014 के बाद एमएनएस को चुनाव के साथ संगठन के स्तर पर भी नुक़सान हुआ है. अगर उन्हें चुनावी नुक़सान की भरपाई करनी है, तो पहले संगठन को संभालना और बढ़ाना होगा. लोकसभा चुनाव में एक भी प्रत्याशी न होने के बाद भी उनका एक के बाद एक रैलियां करना इस संदर्भ में उनकी कोशिश की ओर ही संकेत करता है.