हाल में खबर आई कि कांग्रेस और सीपीएम ने चुनाव आयोग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान में दखल देने की मांग की है. उनकी शिकायत है कि नरेंद्र मोदी लगातार अपने चुनावी भाषणों में सेना का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन्होंने इसे तत्काल रोके जाने की अपील की है.

बीते महीने आयोग ने राजनीतिक दलों को अपने अभियान में सेना का इस्तेमाल न करने का निर्देश दिया था. हालांकि, इसका असर न के बराबर होता दिख रहा है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ भारतीय सेना का अपने-अपने भाषण में भरपूर इस्तेमाल करते हुए दिखे हैं. आदित्यनाथ ने तो एक जनसभा में सेना को ‘मोदी जी की सेना’ बता दिया.

यही नहीं, सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के कई नेता भी एक धर्म विशेष के मतदाताओं को अपनी पार्टी या गठबंधन को वोट करने के लिए प्रेरित करते हुए दिखे हैं. इनमें बसपा प्रमुख मायावती और कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू शामिल हैं. बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद चुनाव आयोग ने इनमें से कई नेताओं के चुनावी अभियान पर 48 घंटे से लेकर 72 घंटे की रोक लगाई थी. हालांकि, चुनाव आयोग अब तक नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ कोई कदम उठाता हुआ नहीं दिखा है. यही वजह है कि देश की शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं में शामिल आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं.

उधर, बीते हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में आयोग को धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की गई थी. इस पर चुनाव आयोग का कहना था कि उसकी ताकत सीमित है और वह आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में उम्मीदवारों को अयोग्य नहीं ठहरा सकता. हालांकि, अदालत की फटकार के बाद उसने मायावती और आदित्यनाथ के खिलाफ कार्रवाई की थी. इसके अगले दिन शीर्ष न्यायालय ने तंज भरे लहजे में आयोग से कहा, ‘लगता है, आयोग को अपनी ताकत का अहसास हो गया है.’

सवाल है कि क्या संवैधानिक और कानूनी तौर पर आयोग के पास वास्तव में कोई ऐसी ताकत है जिसके जरिए वह राजनीतिक दलों या इसके प्रत्याशियों पर लगाम कस सके. या फिर वह बेबस होकर चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन को देखने के लिए मजबूर है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए कई अधिकार दिए गए हैं. इनमें पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए चुनावी आचार संहिता बनाना और इसे लागू करना भी शामिल है. यह संहिता चुनाव की तारीखों के एलान के साथ ही लागू हो जाती है और इससे जुड़ी प्रक्रिया पूरी होते ही यह खत्म भी हो जाती है. इसके दायरे में केंद्रीय या राज्य सरकार द्वारा वित्त पोषित संस्थाएं, संगठन, समिति और आयोग आदि आते हैं.

आचार संहिता का मुख्य मकसद चुनावी अपराध या भ्रष्टाचार को रोकना है. इसमें अलग-अलग समुदायों के बीच नफरत पैदा करना, किसी उम्मीदवार पर निजी टिप्पणी करना और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए किसी नई परियोजना का एलान करना या घूस देना शामिल हैं. हालांकि, इस संहिता को भारतीय दंड संहिता-1860 (आईपीसी) की तरह कानूनी दर्जा हासिल नहीं है. यानी यह एक ऐसा दस्तावेज है जिसका लेना-देना नैतिकता से ज्यादा है. इसके उल्लंघन पर आयोग के पास कानूनी की जगह केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई का विकल्प होता है.

हालांकि, चुनाव आयोग द्वारा अतीत में कई ऐसे कदम उठाए गए हैं जिनमें उसने आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की है. साल 1993 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की बात है. उस वक्त टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे. उन्होंने राज्य के सतना में मतदान रद्द कर दिया था. वजह यह थी कि हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद ने अपने पुत्र के लिए चुनावी प्रचार अभियान में हिस्सा लिया था. अहमद मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता थे. इस घटना के बाद उन्हें राज्यपाल के पद से इस्तीफा देना पड़ा था. पिछले लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो चुनाव आयोग ने भाजपा नेता गिरिराज सिंह को बिहार और झारखंड में चुनाव प्रचार करने से प्रतिबंधित कर दिया था. गिरिराज सिंह के खिलाफ यह कार्रवाई उनके इस बयान के बाद की गई थी कि नरेंद्र मोदी को वोट न देने वालों को पाकिस्तान भेज दिया जाएगा.

फिर भी ऐसे उदाहरण अपवाद ही हैं. पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी द्वारा संपादित पुस्तक ‘द ग्रेट मार्च ऑफ डेमोक्रेसी’ के एक आलेख में टीएन शेषन ने चुनावी आचार संहिता को नख-दंत विहीन बताया था. शेषन का मानना था कि यह पवित्र इरादे के साथ बनाई गई दिखावटी चीज है. हालांकि अपने आलेख में उन्होंने यह भी लिखा था कि इसके बावजूद अन्य कानूनों के जरिए यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि आचार संहिता का पालन हो. उनका कहना था कि इसका उल्लंघन करने वालों पर आईपीसी और जनप्रतिनिधित्व कानून-1951 के तहत मामले दर्ज किए जा सकते हैं.

उदाहरण के लिए यदि कोई किसी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं का अपमान करता है तो आईपीसी की धारा-295 (ए) के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है. इस धारा में इसे गंभीर अपराध माना गया है. साथ ही, इसमें पुलिस को बिना वारंट के आरोपित को गिरफ्तार करने का अधिकार है. इसके अलावा मतदाताओं को घूस देना भी आईपीसी की धारा-171 (बी) के तहत कानूनी अपराध है.

वहीं, जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 126 (1) में भी चुनावी अपराध के लिए कुछ प्रावधान तय किए गए हैं. जैसे मतदान की समाप्ति के लिए तय किए समय से 48 घंटे पहले चुनावी अभियान खत्म करना होगा. इसके उल्लंघन पर दो साल की सजा तय है. हालांकि, इसके आगे धारा 126 (2) में साफ किया गया है कि कोई अदालत तब तक इसका संज्ञान नहीं लेगी जब तक चुनाव आयोग या उसके निर्वाचक अधिकारी द्वारा इसकी शिकायत दर्ज न की जाए.

बताया जाता है कि ऐसे मामलों में चुनाव आयोग की कार्रवाई उल्लंघन की गंभीरता के अलावा इस बात पर भी निर्भर करती है कि क्या आरोपित बार-बार ऐसा करता रहा है. नफरत फैलाने वाले भाषणों के मामले में आयोग भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और जनप्रतिनिधित्व कानून की अलग-अलग धाराओं के तहत कार्रवाई कर सकता है. ऐसे मामलों में चुनाव आयोग का कोई अधिकारी पुलिस को शिकायत दर्ज करने के निर्देश दे सकता है. इसके बाद अदालत मामले को राष्ट्रपति के पास भेज सकती है जो चुनाव आयोग से राय मांग सकता है. आयोग संबंधित आरोपित को वोट डालने या चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की राय दे सकता है.

1999 में ऐसा ही हुआ था. चुनाव आयोग ने शिव सेना के तत्कालीन मुखिया बाला साहेब ठाकरे को वोट डालने और कोई चुनाव लड़ने से छह साल के लिए प्रतिबंधित कर दिया था. ठाकरे को 1987 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान मुंबई में हुए एक रैली में भड़काऊ भाषण देने का दोषी पाया गया था. इसके 12 साल बाद आया चुनाव आयोग का फैसला 1995 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर आधारित था जिसने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए इस मामले में बाल ठाकरे को अपराधी माना था.

इन बातों से साफ है कि यदि चुनाव आयोग चाहे तो आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्रतीकात्मक की जगह ठोस कार्रवाई कर सकता है. इसके लिए उसके पास शक्तियां और कानूनी अधिकार भी हैं. हाल में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने भी चुनाव आयोग को नसीहत दी थी. 19 अप्रैल को इंदौर में एक कार्यक्रम में उनका कहना था, ‘आयोग के पास पर्याप्त शक्तियां हैं. वो ईश्वर से यह नहीं बोल सकता कि हे प्रभु, मुझे शक्ति दे दो.’

बीते सोमवार ही को एक चुनाव अधिकारी ने पुलिस को भोपाल से भाजपा उम्मीदवार प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया है. इसका असर भाजपा द्वारा मौजूदा सांसद आलोक संजर को बतौर डमी उम्मीदवार के रूप में उतारने को लेकर देखा जा सकता है. पार्टी को आशंका है कि चुनाव आयोग प्रज्ञा का नामांकन पर्चा खारिज भी कर सकता है. बीते हफ्ते भाजपा उम्मीदवार ने अपने एक बयान में कहा था कि वे बाबरी मस्जिद को ध्वस्त (छह दिसंबर, 1992) करने में शामिल थीं. बहुत से लोग मानते हैं कि आयोग इस तरह की सक्रियता दिखाता रहे तो आचार संहिता का पालन सुनिश्चित किया जा सकता है.