चाहे हाल में श्रीलंका में हुए बम धमाके हों या पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों पर हुआ हमला या फिर साल 2008 का मुंबई हमला. इन सभी वारदातों के लिए एक मुस्तैद संगठन के अलावा उसे चलाने के लिए वैसे ही पैसे की ज़रूरत पड़ती है जैसे किसी भी संगठन को चलाने के लिए होती है. बाकी संगठनों के पास पूंजी और आय के तकरीबन सभी ज्ञात स्रोत होते हैं. सवाल यह है कि आतंकवादी संगठनों के पास यह पैसा कहां से आता है.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ डिफ़ेंस स्टडीज़ एंड एनालिटिसिस (आईडीएसए) के विवेक चड्ढा लाइफब्लड ऑफ़ टेररिज़्म काउंटरिंग टेररिज़्म फाइनांस नाम की अपनी किताब में बताते हैं, ‘किसी भी आतंकी संगठन को बाकी ख़र्चों के अलावा तनख़्वाहों, ठहरने और आने-जाने के ख़र्चे, हथियारों की ख़रीदारी और प्रोपेगैंडा आदि के लिए धन की ज़रूरत होती ही है.’ भारत में मौजूद आतंकवादियों को पाकिस्तान या चीन से आने वाली मदद छुपी हुई नहीं है. आइडीएसए की क्षितिज प्रभा के मुताबिक़ साल 1999 में पाकिस्तान से जम्मू और कश्मीर में आतंकवादियों को आने वाली मदद लगभग 20 से 30 करोड़ रुपये थी.

लेकिन आतंकवाद सिर्फ बाहरी मदद पर नहीं पलता. दुनियाभर में हुए तमाम आतंकी हमलों की पड़ताल के ज़रिए यह सामने आ चुका है कि इन संगठनों को तीन तरह से पैसा मिलता है. पहला - दुश्मन देश की सरकारों से, दूसरा - आतंक के निजीकरण से यानी लूट, फिरौती, ज़बरन वसूली और तस्करी (इसमें अवैध अथियारों, मानव अंगों, नशीले पदार्थों और मानव तस्करी शामिल है) जैसी आपराधिक गतिविधियों से और तीसरा - वैश्विक माध्यमों से जिनमें फ़्रंट ऑर्गनाइज़ेशन बने ग़ैर सरकारी संगठनों को मिलने वाली विदेशी मदद और विदेश से ई-ट्रांसफ़र के ज़रिए आने वाला वह पैसा भी शामिल है, जिस पर सही निगरानी ढांचे की कमी के चलते नज़र नहीं रखी जाती. इसके अलावा हवाला, काले धन को सफ़ेद करने और जाली नोटों के इस्तेमाल से भी काफी पैसा बना लिया जाता है. शीतयुद्ध के दिनों में ज़्यादातर देशों में हुई आतंकी गतिविधियां सरकारों द्वारा प्रायोजित थीं. लेकिन अब तीनों तरह की फंडिंग का यह घालमेल खुद अपनी जड़ें पसार चुका है.

26 अप्रैल को द इकनॉमिक टाइम्स में खबर छपी थी कि श्रीलंका में हुए धमाकों को पैसा मुहैया कराने में पाकिस्तान के ड्रग माफिया का हाथ हो सकता है. बताया जाता है कि मध्य एशिया और रूस के ज़रिए यूरोप तक नशीली दवाएं पहुंचाने वाले रास्ते पर सख़्ती बढ़ने के बाद पाकिस्तानी ड्रग माफ़िया पिछले सात सालों से श्रीलंका के समुद्री रास्ते का इस्तेमाल कर रहा है. सुरक्षा विशेषज्ञ दावा करते हैं कि लिट्टे के साथ ग्रहयुद्ध में व्यस्त श्रीलंकाई सुरक्षा तंत्र ने देश के पूर्वी भाग में बढ़ रहे चरमपंथ पर ध्यान नहीं दिया.

अपराध जगत, भ्रष्टचार और काले धन का आतंक

अपराध, भ्रष्टाचार और कालेधन को सफ़ेद करने वाला तंत्र न सिर्फ भारत की अर्थव्यवस्था को लंबे समय से नुक़सान पहुंचाता रहा है, बल्कि यह देश की सुरक्षा के लिए भी बड़ा ख़तरा बन रहा है. इसने आतंकवादियों को अपराध में लिप्त जनसंख्या का एक बड़ा आधार उपलब्ध करा दिया है जिसका इस्तेमाल, उसकी जानकारी में या उसके बग़ैर भी आतंकी वारदातों के लिए किया जा सकता है. नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी, मानव तस्करी और जाली नोटों को बाज़ार में उतारने वाला अपराध तंत्र आतंकवादियों को न सिर्फ पैसा बल्कि आतंक को अंजाम देने वाले दूसरे संसाधन भी उपलब्ध कराता है. याद रहे कि मुंबई हमलों में भी आईएसआई ने दाऊद इब्राहीम के अपराध तंत्र का ही इस्तेमाल किया था. इसी तरह पंजाब और जम्मू-कश्मीर में नशीली दवाओं के बड़े बाज़ार को वहां फैले आतंकवाद के इतिहास से जोड़कर देखा जा सकता है.

इन अपराध तंत्रों और उनकी अर्थव्यवस्था को ख़त्म किए बिना आतंकवाद का ख़ात्मा नहीं किया जा सकता. लेकिन आतंकवाद को पोषित करने वाले पैसे की तह तक पहुंचना, आतंकवादियों तक पहुंचकर उन्हें गिरफ्तार करने से ज़्यादा मुश्किल काम है. यह इसलिए क्योंकि इस पैसे की जड़ें आतंकवाद के ढ़ांचे से बाहर निकलकर स्थानीय अपराध जगत और मनी लॉन्डरिंग जैसी पेचीदगियों में उलझी होती हैं. ऐसे में जब इन जड़ों को काटे बिना सिर्फ आतंकवादियों को पकड़ा या मार दिया जाता है तब भी आतंकवाद ख़त्म नहीं होता, क्योंकि पैसा होने पर नई भर्तियां होने में मुश्किल नहीं आती. हालांकि भारत की खुफिया एजेंसियां इस मनी ट्रेल को ख़त्म करने की कोशिश करती रही हैं, लेकिन भ्रष्टाचार, विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों में तालमेल न होने, और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते यहां कोई बड़ी कामयाबी नहीं पाई जा सकी है.

पूर्व रॉ चीफ़ विक्रम सूद अपनी किताब द अनएंडिंग गेम में लिखते हैं, ‘किसी खुफिया एजेंसी का ज़्यादा ध्यान एक संगठन के पैसे और हथियारों के स्रोतों और उन्हें जोड़ने वाली कड़ियों पर ज़्यादा होता है ताकि इन कड़ियों को काटकर संगठन को मिलने वाली ऑक्सीजन रोक दी जाए. दुनिया पैसे पर चलती है और यह बात अपराध और आतंकवाद के लिए भी उतनी ही सच है.’ वहीं चड्ढा अपनी किताब में समझाते हैं कि तस्करी, कालाबाज़ारी और अवैध हथियारों की ख़रीद-फ़रोख़्त जैसे अपराध काफी मात्रा में नक़द पैसा बनाते हैं, और फिर इस काले धन को सफ़ेद करने में मदद करता है एक वैश्विक आर्थिक तंत्र. एक अनुमान के मुताबिक़ 2010 तक अगर दुनिया की जीडीपी 63 करोड़ खरब डॉलर थी तो कुल वैश्विक लेन-देन की कीमत उसका 73.5 गुना थी. ऐसे में अलग-अलग देशों के अलग-अलग क़ानूनों और आर्थिक ढ़ांचों के मद्देनज़र हर लेन-देन पर नज़र रखना और उसके स्रोत तक पहुंचना आसान बिल्कुल नहीं है.

तो अपराध और काले धन को सफ़ेद करने वाला तंत्र जहां एक दूसरे की मदद से मुनाफ़ा बना रहे होते हैं, वहीं आतंकवाद इस मौजूदा सिस्टम का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक मंशा पूरी करने के लिए करता है. और यहां इन तीनों के बीच की सीमाएं धुंधली पड़ जाती हैं. साल 2008 तक भारत से ले जाकर विदेशों में जमा किए गए काले धन की कुल कीमत 46200 करोड़ डॉलर यानी भारत की जीडीपी का 16.6 फ़ीसदी थी. इसके अलावा करप्शन इंडेक्स में इस समय भारत 79वें पायदान पर है. चड्ढा के मुताबिक़ लालच और भ्रष्टाचार भारत में आतंकवाद की जड़ों को सुरक्षित रखने में अपनी भूमिका निभाता रहा है. इन जड़ों को काटे बिना आतंक का खात्मा संभव नहीं है.

एनजीओ, ख़ैरात और दान से आने वाली मदद

आतंकवादी संगठनों को मदद पहुंचाने वाले एनजीओ को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. पहले वे जो इन संगठनों के फ़्रंट ऑर्गेनाइज़ेशन के तौर पर काम करते हैं. और दूसरे वे जिनसे लोगों की भलाई के लिए मिलने वाली मदद का इस्तेमाल उनमें कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है.

सूद भी अपनी किताब में लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के फ्रंट ऑर्गेनाइज़ेशन जमात-उद-दावा (जेयूडी) और उसकी चैरिटी विंग फलाह-ए-इंसानियत फ़ाउन्डेशन (एफआईएफ) के बारे में विस्तार से लिखते हैं. वे बताते हैं कि जमात-उद-दावा को न सिर्फ आम जनता और सऊदी अरब जैसे देशों से ज़कात मिलती रही है, बल्कि पाकिस्तान में पंजाब की सरकार से भी इसे आर्थिक मदद मिली है. और इसी पैसे के दम पर एलईटी जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद फैला पाता है. सूद के मुताबिक़ जेयूडी-एलईटी संगठन अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट से कहीं ज़्यादा मजबूत है. अमेरिका और पाकिस्तान के एफआइएफ पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद सितंबर 2018 में भारतीय जांच एजेंसी एनआइए ने हवाला के ज़रिए दिल्ली तक पहुंचाए गए पैसे का पता लगाते हुए कई गिरफ्तारियां की थीं.

इसके अलावा देश से बाहर रह रहे प्रवासियों से आने वाली मदद भी आतंकी संगठनों तक पहुंचती है. पंजाब के खालिस्तान आंदोलन को पाकिस्तान और अन्य देशों में रह रहे सिखों की मदद मिली थी. इसी तरह जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट (जेकेएलएफ) को सरहद के दोनों ओर से जाकर बाहरी देशों में बसने वाले कश्मीरियों ने आर्थिक मदद दी है. देश के भीतर सक्रिय अन्य आतंकी संगठनों को भी पश्चिम एशियाई और यूरोपीय देशों व अमेरिका में रह रहे प्रवासियों से मदद मिलने के ख़ुलासे होते रहे हैं. वहीं आतंकी फ़ंडिंग के मामले में बीती 24 अप्रैल को ही जेकेएलएफ के मुखिया यासीन मलिक को अगले एक महीने के लिए न्यायिक हिरासत में भेजा गया है.

जाली नोटों की काली कमाई

जाली नोट न सिर्फ आतंकवाद को पैसा उपलब्ध कराते हैं, बल्कि ये भारत की अर्थव्यवस्था को भी नुक़सान पहुंचाते हैं. भारत में आतंकी फ़ंडिंग के मामलों की जांच के लिए 2008 में नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) बनाई गई थी. इसका एक मुख्य काम जाली नोटों के नेटवर्क तक पहुंचना भी है. 2014 में एनआईए और इंडियन स्टेटिस्टिकल इन्स्टीट्यूट, कोलकाता की एक संयुक्त रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में मौजूद जाली नोटों की कीमत 400 करोड़ रुपए तक आंकी गई थी.

भारत में जाली नोटों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान से आता है और इसकी गुणवत्ता भारत में छपने वाले जाली नोट से काफी बेहतर होती है. विवेक लिखते हैं कि पाकिस्तान से आने वाले ये नोट राजस्थान की मुन्नाबाव-खोखरापार और जम्मू-कश्मीर की अटारी सीमा से आते हैं. इसके अलावा ये संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल, बांग्लादेश, थाइलैंड, मलेशिया, म्यांमार और श्रीलंका के ज़रिए भी भारत आते हैं. भारत में इनका पहला ठिकाना बैंगलुरु, चेन्नई, कालीकट, कोच्चि, हैदराबाद, मैंगलुरु, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में होता है. पिछले कुछ सालों में चीन के ज़रिए भी जाली नोट भारत तक पहुंचे हैं.

फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफएटीएफ) की सिफ़ारिश पर जाली नोटों के खिलाफ कार्रवाई के लिए भारत में भी गैरकानूनी गतिविधियां निरोधक कानून में साल 2012 में तीसरा संशोधन किया गया था. बताते चलें कि एफएटीएफ एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जिसे 1989 में जी-7 देशों की पहल पर मनी लॉन्ड्रिंग व अन्य आर्थिक अपराधों के खिलाफ कार्रवाई के लिए बनाया गया था. चड्ढा लिखते हैं कि नए क़ानून के कारण न सिर्फ जाली नोट फैलाने वाले कई अपराधियों को सज़ा मिली है, बल्कि इसमें पाकिस्तान का सीधा हाथ होने के सबूत भी सामने आए हैं. वे चिंता जताते हैं कि जाली नोट और मनी लॉन्ड्रिंग से आने वाला पैसा आतंक को पोषित करने और अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुंचाने के अलावा, समाज में अपराध को बढ़ावा देने के काम में भी लाया जाता है.