लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर एक आम राय बनती जा रही है कि यह बेकार के मुद्दों और उनके समर्थन में की जा रही बेसिर-पैर की बातों की भेंट चढ़ चुका है. इस समय सोशल मीडिया पर एक बड़ा तबक़ा इस बात के पक्ष दो तरह की दलीलें दे रहा है. इन लोगों का कहना है कि एक तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पांच साल के कामकाज का रिपोर्ड कार्ड दिखाने के बजाय पाकिस्तान को परमाणु हथियार दिखा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं की पार्टी की लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर चर्चा में आने के लिए हेमंत करकरे जैसे निष्ठावान पुलिस अधिकारी को अपने ‘श्राप’ से मारने का दावा कर रही हैं. कई लोगों का कहना है कि प्रज्ञा ठाकुर अपनी कोशिश में कामयाब होती दिख भी रही हैं, क्योंकि नरेंद्र मोदी के बाद टीवी चैनलों, अख़बारों और वेब मीडिया में भाजपा के जिस दूसरे नेता की चर्चा सबसे ज़्यादा है, वे ‘साध्वी’ प्रज्ञा सिंह ठाकुर ही हैं.

मध्य प्रदेश के भोपाल से कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में उतरीं प्रज्ञा मालेगांव बम धमाके की मुख्य आरोपित हैं और कुछ समय पहले ही ज़मानत पर बाहर आई हैं. हेमंत करकरे पर प्रताड़ना का आरोप लगाने के अलावा हाल के दिनों में उन्होंने और भी ऊट-पटांग व ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान दिए हैं. इनमें बाबरी मस्जिद विध्वंस पर गर्व करने से लेकर गोमूत्र से अपने कैंसर का इलाज करने तक की बात शामिल है. इससे यह तो साफ़ पता चलता है कि भाजपा के कई नेताओं की तरह प्रज्ञा ठाकुर को भी बिना सोचे-समझे जुमलेबाज़ी करने की आदत है. इस लिहाज़ से उनके हास्यास्पद बयानों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है. लेकिन हेमंत करकरे के संबंध में उनके बयान को सीधे-सीधे जुमलेबाज़ी नहीं कहा जा सकता.

मतदाताओं के सामने ख़ुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश

प्रज्ञा ठाकुर अभी भी मालेगांव बम विस्फोट मामले की आरोपित हैं. लेकिन वे जब से ज़मानत पर बाहर आई हैं, वे और उनके समर्थक उन्हें इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे अदालत ने उन्हें निर्दोष क़रार दिया हो. कई जानकारों के मुताबिक़ ख़ुद को मतदाताओं की नज़रों में निर्दोष साबित करने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र एटीएस के पूर्व प्रमुख दिवंगत हेमंत करकरे को निशाना बनाया. प्रज्ञा ने कहा कि हेमंत करकरे ने उन्हें ‘जेल में बुरी तरह प्रताड़ित किया, गालियां दीं और किसी भी क़ीमत पर सज़ा दिलाने की धमकी दी थी’. प्रज्ञा के मुताबिक उन्होंने इसी कथित प्रताड़ना के चलते करकरे को श्राप दिया था जिसके चलते सवा महीने बाद मुंबई आतंकी हमले में करकरे मारे गए.

क्या प्रज्ञा सिंह को नौ सालों में केवल हेमंत करकरे ने ‘प्रताड़ित’ किया था?

प्रज्ञा ठाकुर के इस बयान की जमकर आलोचना भी हुई और उनका मज़ाक़ भी उड़ा. लेकिन इस सबसे अलग यह बात ग़ौर करने वाली है कि इस कथित साध्वी को गिरफ्तार करने के एक महीने बाद ही हेमंत करकरे मुंबई हमले के आतंकियों का सामना करते हुए शहीद हो गए थे. जबकि प्रज्ञा ठाकुर बाद में नौ सालों तक जेल में रहीं. क्या उस दौरान किसी ने भी उन्हें ‘प्रताड़ित’ नहीं किया? रिपोर्टें उनके इस रुख़ पर सवाल खड़ा करती हैं.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार की दिसंबर, 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रज्ञा ठाकुर के साथ जेल में किए गए कथित अमानवीय व्यवहार की शिकायत मिलने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने महाराष्ट्र पुलिस पर लगे आरोपों की जांच शुरू की थी. आयोग के निर्देश और महाराष्ट्र में (भाजपा द्वारा) सत्ता परिवर्तन के मद्देनज़र राज्य पुलिस ने महिला पुलिस अधिकारियों की एक टीम को इस कैदी का बयान लेने के लिए मध्य प्रदेश भेजा था. यह बयान भोपाल के एक चिकित्सा संस्थान में लिया गया जहां प्रज्ञा अपना इलाज करवा रही थीं. रिपोर्ट के मुताबिक़ अपने बयान में मालेगांव बम धमाके की इस आरोपित ने कहा कि पुलिस ने उन्हें इतना प्रताड़ित किया कि उनके शरीर का नीचे का हिस्सा ‘लकवाग्रस्त’ हो गया. प्रज्ञा ने तब भी महिला पुलिस अधिकारियों को बताया था कि महाराष्ट्र पुलिस उन्हें ‘रातों को बेल्ट से मारती थी, कई दिन भूखा रखती थी, बिजली के झटके देती थी, गालियां देती थी और पुरुष क़ैदियों के साथ बंदकर अश्लील सामग्री सुनने को मजबूर करती थी.’

लेकिन प्रज्ञा के बयान से जुड़ी इस रिपोर्ट में हेमंत करकरे का नाम कहीं नहीं था. इसमें प्रज्ञा ने महाराष्ट्र के पांच-छह पुलिसकर्मियों का ज़िक्र जरूर किया था. वहीं, एनडीटीवी ने अपनी एक न्यूज़ रिपोर्ट में बताया है कि जिन अधिकारियों ने प्रज्ञा ठाकुर के ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी, वे आज भाजपा के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार के पुलिस विभाग में ऊंचे पदों पर आसीन हैं. ताज्जुब की बात है कि भाजपा उम्मीदवार बनने के बाद प्रज्ञा ने इनमें से किसी का नाम नहीं लिया.

प्रज्ञा ठाकुर और भाजपा के वैचारिक साथी भी हेमंत करकरे का समर्थन कर रहे हैं

सच तो यह है कि हेमंत करकरे के ख़िलाफ़ ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि उन्होंने प्रज्ञा के साथ दुर्व्यवहार किया. एनडीटीवी से बातचीत में मालेगांव मामले की एक पूर्व सरकारी वकील रोहिणी साल्यान ने प्रज्ञा के आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया साथ ही उनके दावे को ‘बेबुनियाद और घटिया’ बताया.

प्रज्ञा को हेमंत करकरे के नेतृत्व वाली एटीएस द्वारा प्रताड़ित किया गया, इस बारे में अदालती तथ्य भी उनका साथ नहीं देते. बॉम्बे हाई कोर्ट ने मार्च, 2010 में प्रज्ञा की ज़मानत की अर्ज़ी ख़ारिज की थी. उस पर फ़ैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा था कि एटीएस पर तमाम आरोप लगाने के बावजूद आरोपित ने इस बात से इनकार नहीं किया कि उसे जेल में नहीं, बल्कि एहतियातन मुंबई के अलग-अलग होटलों में और तबीयत ख़राब होने की सूरत में अस्पतालों में रखा गया था. उस समय प्रज्ञा ठाकुर की एक अनुयायी भी उनके साथ रहती थी. बाद में प्रज्ञा को महिला पुलिस की कस्टडी में भेज दिया गया.

साभार | इंडियाकानून डॉट ओआरजी
साभार | इंडियाकानून डॉट ओआरजी

प्रज्ञा ठाकुर के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताकर कड़ी आलोचना करने वालों में केवल विपक्ष के लोग नहीं हैं, बल्कि हिंदुत्व की विचारधारा पर चलने वाले लोग भी इनमें शामिल हैं. हेमंत करकरे के संबंध में समीर कुलकर्णी का हालिया बयान बेहद महत्वपूर्ण है. प्रज्ञा के साथ वे भी मालेगांव मामले में आरोपित हैं. भाजपा प्रत्याशी के बयान को ‘ग़लती’ बताते हुए समीर ने कहा कि अगर करकरे जीवित होते तो अब तक वे (समीर) सभी आरोपों से मुक्त हो गए होते. यह ध्यान देने वाली बात है कि हाल में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर महाराष्ट्र के लोगों से कांग्रेस और एनसीपी को वोट न करने की अपील करने वाले समीर कुलकर्णी ने करकरे की मौत को देश का दुर्भाग्य बताया है.

उनके अलावा महाराष्ट्र में भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रही शिवसेना ने भी ‘साध्वी’ के बयान के हवाले से सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है. अपने मुखपत्र सामना में शिवसेना ने कहा कि उसने मालेगांव मामले में प्रज्ञा का समर्थन किया है, लेकिन हेमंत करकरे को लेकर दिए बयान पर वह उनके साथ नहीं है. इस संपादकीय में पार्टी ने कहा कि शहीदों के बलिदान को देश-विरोधी बताने से मोदी की छवि पर ‘कलंक’ लगता है.

इतना ही नहीं, देश के पूर्व शीर्ष पुलिस अधिकारियों और नौकरशाहों ने भी भाजपा प्रत्याशी के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए उनकी कड़ी आलोचना की है और उनकी उम्मीदवारी रद्द करने की मांग की है. इन लोगों ने करकरे की निष्ठा को लेकर कहा कि अगर वे केंद्र की आरामदेह नौकरी छोड़कर आतंकी गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए एटीएस में नहीं आते तो आज जीवित होते.

हेमंत करकरे शहीद होने से पहले मालेगांव मामले में प्रज्ञा पर शिकंजा कस चुके थे

ऊपर दिए तमाम तथ्य बताते हैं कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने हेमंत करकरे के ख़िलाफ़ जो भी आरोप लगाए वे सही नहीं हैं. अगर उनके आरोपों में सच्चाई होती तो वे अपने बयान से नहीं पलटतीं और न ही माफ़ी मांगतीं. उनकी पार्टी ने भले ही उनकी उम्मीदवारी का बचाव करते हुए उन्हें प्रताड़ित किए जाने की बात कही है, लेकिन हेमंत करकरे का नाम उसने भी नहीं लिया. बल्कि पहली प्रतिक्रिया में भाजपा ने प्रज्ञा के बयान से पल्ला झाड़ लिया था.

सच तो यह है कि शहीद होने से पहले हेमंत करकरे ने मालेगांव बम विस्फोट मामले में प्रज्ञा ठाकुर की भूमिका साबित कर दी थी. अपनी जांच में करकरे ने धमाके में इस्तेमाल हुई बाइक का पता लगा लिया था जो प्रज्ञा के नाम पर रजिस्टर थी. इसके अलावा मालेगांव मामले के एक और आरोपित कर्नल पुरोहित ने भी ‘साध्वी’ को ही धमाकों का ज़िम्मेदार बताया था. आज ये दोनों ज़मानत पर बाहर हैं. लेकिन करकरे के नेतृत्व वाली एटीएस ने 2008 में ही इन दोनों समेत कई आरोपितों पर शिकंजा कस दिया था. यह संभव है कि इसी भूमिका के चलते वे प्रज्ञा को याद रह गए. मालेगांव मामले की जांच के दौरान करकरे शहीद हो गए थे, इस संयोग का चुनावी फ़ायदा उठाने के लिए भाजपा उम्मीदवार ने इसे ‘श्राप’ का रूप दे दिया.