जेट एयरवेज का आर्थिक संकट एक बार फिर भारतीय विमानन क्षेत्र की चर्चाओं के केंद्र में है. एक समय इस क्षेत्र का सितारा रही जेट का परिचालन फिलहाल ठप है. भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के नेतृत्व में 26 बैंकों के समूह ने इस एयरलाइन के कर्जों की पुनर्गठन और इसके ‘प्रबंधन-नियंत्रण’ में बदलाव के लिए बोली मांगने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है.

इस प्रक्रिया के बीच एक बार फिर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि टाटा समूह एक बार फिर जेट एयरवेज को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहा है. यह चर्चा इस तथ्य के बावजूद जोर पकड़े हुए है कि एसबीआई द्वारा मांगी गई बोलियों में टाटा समूह ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है. जानकारों का मानना है कि समूह जेट के सौदे के लिए उसके दिवालिया कोर्ट में जाने का इंतजार कर रहा है.

जेट एयरवेज में टाटा समूह की दिलचस्पी नई नहीं है. पिछले साल नवंबर-दिसंबर के दौरान जब जेट की आर्थिक परेशानियां बढ़ने लगी थीं और उसके अधिग्रहण की चर्चाएं चली थीं तब भी टाटा समूह को खरीददारों की सूची में नंबर एक पर माना जा रहा था. उस समय ऐसी भी खबरें आईं थी कि खुद केंद्र सरकार चाहती है कि टाटा समूह जेट एयरवेज को खरीद ले और इसके बदले उसे जेट के तमाम बकायों में से छूट दी जा सकती है. पर, तब कुछ वजहों से ऐसा नहीं हो सका.

लेकिन, तब से अब तक हालात काफी बदल चुके हैं. 8500 करोड़ से ज्यादा के बकाए से जूझ रही जेट एयरवेज आखिरकार 18 अप्रैल को अपना परिचालन पूरी तरह बंद कर चुकी है. एयरलाइन के चेयरमैन नरेश गोयल और उनकी पत्नी बोर्ड से इस्तीफा दे चुके हैं और कंपनी में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 25 फीसद रह गई है. इसके बाद ऋण समाधान योजना के तहज जेट के ऋणदाताओं ने एयरलाइन का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है. अब एसबीआई के नेतृत्व में एयरलाइंस की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है.

जेट एयरवेज की 75 फीसद हिस्सेदारी बेचने के लिए एसबीआई ने जो बोलियां मांगी हैं, उसमें छह बड़े निवेशकों ने रुचि दिखाई है. इनमें टीपीजी, एतिहाद एयरलाइंस, इंडिगो पार्टनर्स और एनआईआईएफ बताए जा रहे हैं. जानकारों के मुताबिक, 8500 करोड़ के कर्ज के अलावा जेट पर चढ़ी अन्य देनदारियों को मिला दिया जाए तो बकाए का कुल आंकड़ा दस हजार करोड़ के आसपास बैठता है और अब तक निवेशकों की ओर से जो प्रस्ताव आए हैं वे बहुत उत्साहजनक नहीं कहे जा सकते हैं.

सवाल उठता है कि जेट के लिए एसबीआई की समाधान योजना में टाटा के कोई रुचि नहीं दिखाने के बाद भी ऐसा क्यों माना जा रहा है कि जेट को खरीदने की दौड़ में सबसे आगे वही है? जानकार बताते हैं कि जेट के साथ फिलहाल जो हो रहा है वह कर्ज के पुनर्गठन और मैनेजमेंट में बदलाव की सामान्य प्रक्रिया है. जेट के कर्जदाताओं का समूह भी मानता है कि इस प्रक्रिया से उनके पैसे वापस आ जाएंगे, ऐसा नहीं लगता. सूत्रों के मुताबिक जेट के कर्जदाताओं के कंसॉर्टियम ने टाटा समूह से इस बारे में संपर्क भी किया था, लेकिन टाटा का इस पर कहना था कि वह इस सौदे में तभी कोई दिलचस्पी दिखाएगा, जब मामला दिवालिया कोर्ट में पहुंच जाएगा.

कर्ज संकट में फंसी जेट एयरवेज की हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया की अगुवाई कर रहे एसबीआई ने उम्मीद जताई है कि 31 मई तक यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. लेकिन जानकारों का कहना है कि इसके लिए आई बोलियों पर बात बन जाएगी, ऐसा नहीं लगता. ऐसे में कंपनी के दिवालिया घोषित होने और मामला अदालत में जाने पर टाटा जेट को खरीदने के सबसे बड़े दावेदार के तौर पर सामने आ सकता है.

इस बात की संभावना इसलिए भी है कि अब तक टाटा समूह को नरेश गोयल ने ही अटका रखा था जिनका नियंत्रण अब एयरलाइन से खत्म हो चुका है. पिछले साल भी टाटा ने जब जेट में निवेश को लेकर उनसे बातचीत की थी तो इसका कोई नतीजा नहीं निकला था. टाटा समूह चाहता था कि नरेश गोयल कंपनी से नियंत्रण छोड़ें. यह भी कि टाटा समूह अगर जेट एयरवेज को खरीदेगा तो एयरलाइन के सभी मौजूदा वेंडर कांट्रेक्ट खत्म होंगे. लेकिन नरेश गोयल इसके लिए तैयार नहीं हुए बल्कि वे तो कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का विकल्प भी सुरक्षित रखना चाहते थे.

फिलहाल तो वे परिदृश्य से बाहर हैं, लेकिन टाटा कुछ अन्य वजहों से बोली प्रक्रिया में शामिल होने के बजाय दिवालिया कोर्ट के जरिये जेट एयरवेज में हिस्सेदारी खरीदना चाहता है. जानकारों के मुताबिक, इसके पीछे टाटा समूह का पिछली बातचीत का तल्ख अनुभव होने के साथ व्यवासायिक रणनीति भी है. दिवालिया कोर्ट में कंपनी सौदे में अपने मनमुताबिक कुछ शर्तें भी जुड़वा सकती है.

इसके अलावा, टाटा समूह की जेट एयरवेज में दिलचस्पी के कुछ अन्य कारण भी हैं. जानकार मानते हैं कि यह महज संयोग ही नहीं है कि भारतीय विमानन सेक्टर में कोई बड़ी हलचल होने पर टाटा का नाम जरूर सामने आता है. असल में टाटा समूह का नागरिक उड्डयन से पुराना रिश्ता रहा है. उदारीकरण के बाद भी जब विमानन क्षेत्र में निजी कंपनियों के लिए मौके खुले तब से टाटा समूह इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करता रहा है. ऐसे में उसके लिए जेट एयरवेज का अधिग्रहण काफी मुफीद साबित हो सकता है.

इतिहास में जाएं तो 1929 में जेआरडी टाटा ने भारत का पहला पायलट लाइसेंस हासिल किया और 1929 में देश की पहली एयरलाइंस स्थापित की. कराची से बंबई तक की पहली उड़ान के बाद टाटा एयरलाइंस ने दिल्ली से बंबई की कुछ नियमित सेवायें भी शुरु कीं. 1946 में टाटा एयरलाइंस को एक सार्वजनिक कंपनी में बदल दिया गया और 1953 में सरकार ने इसका राष्ट्रीयकरण कर इसे एयर इंडिया कर दिया. हालांकि, इसके बाद 1977 तक जेआरडी टाटा ही इसके चेयरमैन रहे. बाद में रतन टाटा भी 1986 से 1989 तक एयर इंडिया के चेयरमैन रहे.

उदारीकरण के बाद टाटा ने फिर उड्डयन क्षेत्र में हाथ आजमाने की कोशिश की, लेकिन उसके शुरुआती अनुभव काफी तीखे रहे. 1996 में समूह ने सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिलकर भारत में एयरलाइंस संचालन की अनुमति मांगी थी. लेकिन विदेशी निवेश के नियमों का हवाला देकर सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया. साल 2000 में भी इस तरह का एक प्रस्ताव सिरे नहीं चढ़ सका. टाटा की एयरलाइन चालू करने के लिए मंत्रियों के रिश्वत तक मांगने की बात चर्चा में रही. 2013 में उड्डयन क्षेत्र में विदेशी निवेश के नियम बदलने के बाद टाटा ने एयर एशिया में 30 फीसदी हिस्सेदारी ली. इसके बाद 2015 में टाटा ने सिंगापुर एयरलाइंस के साथ विस्तारा नाम से संयुक्त उपक्रम शुरु किया. टाटा समूह ने हाल ही में एयर एशिया में अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी कर ली है.

जानकार मानते हैं कि एयर एशिया और विस्तारा के साथ अगर जेट एयरवेज का नियंत्रण भी टाटा समूह के हाथ में आ जाता है तो कंपनी विमानन सेक्टर में उस मुकाम पर पहुंच सकती है, जिसका प्रयास वह इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की आमद के साथ ही कर रही है. जानकारों का मानना है कि अगर, टाटा समूह जेट को खरीदने की अपनी योजना में कामयाब होता है तो वह घरेलू उड़ानों के मामले में भी इंडिगो को टक्कर दे सकता है, जिसने अभी करीब-करीब इस मामले में अपना एकाधिकार बना रखा है.

आंकड़ों के मुताबिक विस्तारा की घरेलू उड़ान के बाजार में फिलहाल हिस्सेदारी 3.8 फीसदी है, जबकि इंडिगो इसमें 42 फीसदी हिस्सेदारी ऱखता है. स्पाइस जेट की हिस्सेदारी 13.3 फीसदी है. ऐसे में अगर टाटा समूह जेट एयरवेज को खरीदने में सफल रहता है तो घरेलू उड़ानों में हिस्सेदारी बढ़ने के साथ-साथ उसे विदेशी हवाई अड्डों पर पार्किंग और लैंडिंग स्लॉट जैसी सुविधाएं भी हासिल होंगी. यानी अगर टाटा समूह, जेट एयरवेज को खरीद लेता है तो यह व्यावसायिक लिहाज से उपलब्धि तो होगी ही, यह सौदा भारतीय विमानन क्षेत्र का सिरमौर बनने की दिशा में भी उसका एक बड़ा कदम होगा.