‘इस बार ऐसा है कि धंधा जीरो बट्टा जीरो चल रहा है. ऐसा इलेक्शन हमने अपनी पूरी लाइफ में नहीं देखा. कहते हैं कि पार्टियां काफी पैसे खर्च कर रही हैं, लेकिन किस पे कर रही हैं...यही हमें नहीं पता. हमारे पास तो कोई झंडा खरीदने तक नहीं आया.’

ये शब्द पुरानी दिल्ली के सदर बाजार में चुनाव प्रचार सामग्री की दुकान चलाने वाले हरप्रीत सिंह के हैं. दिल्ली का यह बाजार प्रचार सामग्री का देश का सबसे बड़ा ठिकाना माना जाता है. शाम का वक्त है. सड़कों पर ग्राहकों की चहल-पहल दिख रही है. दूसरी दुकानों पर कारोबारी खरीददारों के साथ व्यस्त दिख रहे हैं, लेकिन हरप्रीत के साथ ऐसा नहीं है. वे अपने मोबाइल पर गेम खेल रहे हैं. उनके स्टाफ की निगाहें सड़क की ओर हैं.

हरप्रीत सिंह 23 वर्षों से चुनाव प्रचार से जुड़ी सामग्री का कारोबार कर रहे हैं. वे देश के अलग-अलग राज्यों में छोटे-छोटे कारोबारियों को भी माल सप्लाई करते हैं. लेकिन साल 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर वे काफी निराश हैं. हरप्रीत कहते हैं, ‘2014 में हम लोगों को फुर्सत नहीं थी. उसी को ध्यान में रखते हुए हमने इस बार ज्यादा तैयारी की थी, लेकिन सबकुछ धरा का धरा रह गया! इस बार मेरा बिजनेस पांच परसेंट हुआ है, 2014 के मुकाबले.’ इस तरह के मुश्किल हालात से केवल हरप्रीत ही नहीं जूझ रहे हैं. सदर बाजार में हम आधा दर्जन दुकानदारों से बातचीत करते हैं और पता चलता है कि सभी करीब-करीब इसी तरह की मुश्किल से जूझ रहे हैं.

हरप्रीत सिंह
हरप्रीत सिंह

लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) की एक रिपोर्ट सामने आई है. इस रिपोर्ट की मानें तो यह चुनाव दुनिया के किसी भी देश में हुए चुनाव की तुलना में सबसे महंगा होने वाला है. इसमें पिछले आम चुनाव (2014) के मुकाबले 40 फीसदी अधिक रकम खर्च होगी और यह आंकड़ा 50,000 करोड़ रुपये से अधिक होगा. यह आंकड़ा अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव (करीब 46,000 करोड़ रुपये) से भी अधिक है. सीएमएस के अध्यक्ष भास्कर राव के मुताबिक इसकी वजह सोशल मीडिया, यात्रा और विज्ञापन के खर्च में हुई बढ़ोतरी है. विज्ञापन से जुड़ी एजेंसियों के मुताबिक इस चुनाव में प्रचार के लिए राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा करीब 3,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का अनुमान है. इसमें सोशल मीडिया की हिस्सेदारी करीब 500 करोड़ रुपये की है.

जाहिर है कि राजनीतिक दल अपने चुनावी अभियान पर पहले से अधिक खर्च कर रहे हैं, फिर ऐसा क्यों हैं कि प्रचार से जुड़ी चीजों का धंधा मंदा है? ऑल इंडिया इलेक्शन मैटेरियल मैन्युफैक्चरर्स और ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल गुप्ता इस सवाल पर कहते हैं, ‘इसकी वजह यह है कि इलेक्शन मीडिया में पहुंच गया है. अब ज्यादा लोग टीवी पर लगे रहते हैं.... और कुछ चुनाव आयोग की पाबंदियां हैं. झंडा वगैरह लग ही नहीं रहा है. सब बंद हो गया है.’

अनिल गुप्ता
अनिल गुप्ता

हम अनिल गुप्ता से पूछते हैं कि रैली या रोडशो में इन चीजों की जरूरत तो अब भी होती है न? इस पर वे कहते हैं, ‘पहले तो घर-घर में झंडा लगता था. लेकिन अब वह काम नहीं है. पहले प्रत्याशी जिस गली में जाता था उस गली को सजाया जाता था, लेकिन अब ऐसा भी नहीं होता. आजकल प्रत्याशी कब आया और कब चला गया, कुछ पता ही नहीं चलता!’ इन बातों के साथ वे इस कारोबार में सप्लायर्स की संख्या बढ़ने की बात भी करते हैं. उनकी मानें तो इस वजह से भी मार्केट में कॉम्पिटीशन बढ़ गया है. अनिल गुप्ता अपने कारोबार का थोड़ा दायरा बढ़ाते हुए अब ऑनलाइन कारोबार करने वालों को भी इनकी आपूर्ति करते हैं.

हालांकि, इन चीजों के कुल कारोबार में ऑनलाइन सेल्स की हिस्सेदारी न के बराबर है. इनका कारोबार अब भी देश के अलग-अलग कोनों में छोटे-छोटे दुकानदारों से चलता है और सदर बाजार इसका मुख्य केंद्र है. लेकिन, इस चुनाव में सभी हैरान-परेशान दिख रहे हैं. हरप्रीत सिंह कहते हैं, ‘सब प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (टीवी) में चला गया. इस बार कोई माल खरीदने के लिए नहीं आया. न पार्टी, न दुकानदार. जो छोटे दुकानदार हैं, वे ठीक-ठाक बिक्री की उम्मीद में माल लेकर गए थे. लेकिन उनका सामान बिका ही नहीं तो वे दोबारा माल लेने भला क्यों आएंगे! छोटे दुकानदार यहां पूरे इंडिया से आते थे.’

इन कारोबारियों की मानें तो प्रचार से जुड़े चीजों की तैयारियां चुनाव से कई महीने पहले से करनी होती हैं ताकि सही वक्त पर इन आपूर्ति की जा सके. हरप्रीत कौर ने बीते साल दीपावली के बाद से ही इसके लिए अपनी कमर कसनी शुरू कर दी थी. इसके लिए उन्होंने अपनी दुकान में स्टाफ की संख्या भी बढ़ा दी. वे बताते हैं, ‘स्टाफ तो इस बार ही ज्यादे रखे हैं. पिछली बार मालूम ही नहीं था कि इतना काम होगा, लड़के भी कम थे. इस बार लड़के भी ज्यादा रखे. लेकिन काम बिल्कुल नहीं हुआ. हमें उम्मीद थी कि इस बार बीजेपी भी जोर लगाएगी. कांग्रेस भी जोर लगाएगी. लेकिन, पता नहीं कहां चले गए सारे!’

सदर बाजार के कारोबारियों को देश में बदलते राजनीतिक समीकरणों और परिस्थितियों की वजह से भी बड़ा झटका लगा है. इस इलाके में सबसे पुराने दुकानदारों में से एक गफ्फार भाई झंडेवाला के बेटे राजा गफ्फार अंसारी बताते हैं, ‘हमारे धंधे पर महागठबंधन (उत्तर प्रदेश) का भी असर हुआ है. अब एक ही झंडे में तीन पार्टियों (या दो) के निशान होते हैं. पहले इन सबका अलग-अलग झंडे का डिमांड होता था. लेकिन अब एक से ही काम चल जाता है.’

राजा गफ्फार अंसारी
राजा गफ्फार अंसारी

अनिल गुप्ता की मानें तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन को लेकर संशय की स्थिति होने से दिल्ली में प्रचार अभियान देरी से शुरू हुआ है और इसका भी उनके कारोबार पर असर पड़ा है. वे आगे कहते हैं, ‘दिल्ली को लेकर वैसे भी ज्यादा उम्मीद नहीं थी. यहां प्रचार कहां होता है? पढ़े-लिखे लोग हैं. वे इन चीजों को अधिक पसंद नहीं करते.’ अनिल गुप्ता नरेंद्र मोदी को लेकर लोगों में आकर्षण घटने को भी कारोबार मंदा होने की एक वजह बताते हैं. वहीं उनके साथ सभी कारोबारियों का यह जरूर कहना है कि सबसे अधिक बिक्री भाजपा से जुड़ी प्रचार सामग्री की हो रही है. इन चीजों में दुपट्टा, टोपी, टीशर्ट, हैंडबैंड, छाते और गुब्बारे के अलावा बिल्ला यानी बैज़ भी हैं.

इस बीच हमारी मुलाकात सदर बाजार से 10 किलोमीटर दूर जाफराबाद के रहने वाले शाहनवाज खान ऊर्फ बाबर बिल्ले वाले से भी हुई. उनकी हालत भी बाकियों जैसी ही है. वे बताते हैं, ‘इस बार काम पिट गया. कर्जदार हो गए हैं हम. केवल बीजेपी पार्टी ऐसी है, जिसके पास पैसा है और किसी के पास पैसा नहीं है. कांग्रेस के पास भी नहीं है. पैसा कोई खर्च करने के मूड में नहीं है.’ वे आगे बताते हैं कि इस बार यह धंधा पिटने के बाद केवल कारोबारी ही मुश्किलों में नहीं घिरे बल्कि, हजारों गरीब लोगों की जिंदगी भी बुरी तरह प्रभावित हुई है. साल 2014 के चुनाव में उन्होंने बिल्ला तैयार करने के लिए करीब 150 लोगों को लगा रखा था. लेकिन, इस बार यह संख्या आधी रह गई है. साथ ही, एक बार जो माल तैयार हुआ है, उसकी भी बिक्री नहीं हो पाई है. इसकी वजह से उनके कामगार जिनमें अधिकांश झुग्गी-झोपड़ियों की महिलाएं और बच्चे हैं, उनकी आमदनी मारी गई है.

शाहनवाज खान
शाहनवाज खान

शाहनवाज आगे जानकारी देते हैं, ‘हमारे बनाए दो लाख बिल्ले मार्केट में गए हुए हैं लेकिन अब तक स्टोर में यूं ही रखे हुए हैं. इनमें एक लाख बिल्ले की पेमेंट रुकी हुई है.’ अगर सभी बिल्ले न बिके तो क्या आपके पैसे मिलेंगे? इसके जवाब में वे बताते हैं, ‘पेमेंट तो हो जाएगी लेकिन तब पैसे किस्तों में मिलेंगे. कभी 10 हजार दे दिए, कभी दो हजार दे दिए, तीन हजार दे दिए. अब वो दुकानदार भी क्या करे. वो भी कह रहा है कि ये माल रखा हुआ है. न हो तो माल ही वापस ले जाओ.’

शाहनवाज खान बताते हैं कि साल 2014 में ठीक-ठाक काम हुआ था और उन्होंने दो-ढाई लाख रुपये कमा लिए थे. उनके मुताबिक अब प्रचार से जुड़े कई चीजें बाहर से बनकर आती है. इनमें से अधिकांश ‘मेड इन चाइना’ होती हैं. लेकिन झंडों की सिलाई का काम अभी भी दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में महिलाएं और उनके परिवार के अन्य सदस्य करते हैं. मंदी की मार इन लोगों पर भी पड़ी है. अब इन लोगों का काम भी कम हो गया है. इनके लिए प्रिंटेट कपड़े महाराष्ट्र और गुजरात से आते हैं. शाहनवाज से बात करने के बाद हम जाफराबाद की पतली गलियों में स्थित उन घरों में पहुंचते हैं जहां झंडे सिलाई का काम होता है. इन गलियों से गुजरते हुए आप घरों से आने वाली सिलाई मशीन चलने की आवाज सुन सकते हैं.

‘2014 की तुलना में काम बहुत कम है. आधा भी नहीं है, पौन (25 फीसदी) ही समझो. एक महीने से सिलाई का काम रहे हैं. घर के सभी सदस्य लगे हुए हैं. 10 साल से इस काम में लगी हुई हैं. ये काम खाली बैठे से बढ़िया है. काम का पेमेंट भी सही समय पर मिल जाता है.’ शाहनवाज के घर से करीब एक किलोमीटर दूर रहने वाली शाहिदा सत्याग्रह को बताती हैं. उनके साथ उनके परिवार के अन्य सदस्य भी कांग्रेस के झंडे की सिलाई करने में लगे हुए हैं.

शाहिदा (सबसे बाएं) और उनके परिवार के अन्य सदस्य
शाहिदा (सबसे बाएं) और उनके परिवार के अन्य सदस्य

इस इलाके में फिलहाल 25 घरों में ये काम हो रहा है. यहां सदर बाजार के गफ्फार भाई के लिए काम करने वाले 42 साल के मुंशी शम्सुल खान बताते हैं, ‘2014 (आम चुनाव) में करीब 100 घरों के लोग इस काम में लगे हुए थे. लेकिन इस बार काम ही नहीं है. जो काम हो रहा है वह भी हफ्ता-दस दिन में खत्म हो जाएगा.’ वे उत्तर प्रदेश के हरदोई के रहने वाले हैं. लिवर की बीमारी से पीड़ित शम्सुल केवल चुनाव के वक्त या जब ऑर्डर आता है तो दिल्ली आकर इस काम को संभालते हैं.

जिस तरह हमारे धार्मिक पर्वों के लिए अलग-अलग स्तर पर तैयारियां होती हैं और लोग जुटते हैं, ठीक वैसा ही लोकतंत्र के इस महापर्व में भी होता है. बड़ी संख्या में लोग न केवल इसमें उत्साह से हिस्सा लेते हैं बल्कि, इनमें से कई की आजीविका भी कुछ महीनों के लिए इस पर निर्भर होती है. इस बात को सिलाई का काम करने वाली रूख्साना के शब्दों के जरिए बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. वे कहती हैं, ‘बच्चे की पढ़ाई-लिखाई सब इसकी कमाई से ही होती है. यदि ये काम रूक जाएं तो फिर कुछ भी नहीं हो पाएगा. अभी 1000 रुपये तक का रोज काम कर लेते हैं. इस काम से हम ज्यादा खुश हैं. हमारे सारे त्योहार के खर्चे भी इस काम से निकल जाते हैं.’

हालांकि, रुख्साना और शाहिदा सहित उनके जैसे अन्य कामगारों को शायद इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि उनकी इस खुशी की मियाद अगले 10 दिनों में खत्म हो सकती है. वहीं, सदर बाजार के भी बड़े कारोबारियों को नहीं मालूम था कि इस बार उनकी उम्मीदों के उलट इस महापर्व में उनकी दुकानों में मातम सा माहौल बन सकता है. भले ही चुनावी पंडित इस चुनाव को देश के लिए ऐतिहासिक बता रहे हों लेकिन चुनावी प्रचार की चीजों से जुड़े कारोबारी और कामगार इस चुनाव को याद रखना नहीं चाहेंगे.