1996 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भारी उथल-पुथल रही. पूरा साल किसी न किसी घोटाले की धमक से कांपता ही रहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के जीवन का यह शायद सबसे कठिन साल रहा होगा. आइये, उस साल हुए घोटालों पर एक सरसरी नज़र डालते हैं.

हवाला स्कैंडल

राजनीति में काले धन का व्यापक लेनदेन कोई दबी-ढकी बात नहीं है. पर हवाला स्कैंडल में कई राजनेताओं के नाम आने से संसद की गरिमा पर प्रश्नचिन्ह लग गया था. इस घोटाले का खुलना भी एक इत्तेफ़ाक था. हुआ यह कि मार्च, 1991 में दिल्ली पुलिस ने आतंकी संगठन हिज़बुल मुजाहिद्दीन से ताल्लुक रखनेवाले अशफ़ाक लोन को पकड़ा. उससे ज़रिये मालूम हुआ कि दिल्ली में एक जैन परिवार है जो हवाला के रास्ते इस संगठन को धन मुहैया करवाता है. ज़ाहिर है यह पैसा बाहर से ग़ैरक़ानूनी तरीके से देश में आता था.

सीबीआई ने छापा मारकर सुरेंद्र जैन को उसके घर से गिरफ़्तार किया. उससे मिली डायरी में कई राजनेताओं के नाम थे. ये ‘शॉर्टनेम’ थे मसलन एलके, वीसी, बीजे, एमएस आदि और इनके आगे रुपयों के लेन-देन का जिक्र था. सीबीआई ने एलके का मतलब लालकृष्ण आडवाणी लगाया. इसी तरह उसने वीसी यानी विद्याचरण शुक्ल, बीजे यानी बलराम जाखड़, एमएस यानी माधवराव सिंधिया माना. कई निर्दलीय सांसदों और विधायकों के भी नाम थे. ज्यों-ज्यों तफ़्तीश आगे बढ़ती गई, मामले में सीके जाफ़र शरीफ़, एनडी तिवारी, नटवर सिंह, बूटा सिंह और आरके धवन जैसे और भी बड़े नाम आए. कइयों को इस्तीफ़े देने पड़े. वहीं, आडवाणी ने जांच पूरी होने तक अपनी लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी थी.

हवाला ने हंगामा मचा दिया था. कई कहते हैं कि यह प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के इशारे पर की गई कार्रवाई थी जो कांग्रेस के भीतर और बाहर अपनी प्रतिद्वंदिता ख़त्म करना चाहते थे. हालांकि अगर ऐसा था तो सब कुछ वैसा नहीं हुआ जैसा वे चाहते थे. 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई.

उधर, कुछ लोगों का मानना था कि सीबीआई के तत्कालीन मुखिया जोगिन्दर सिंह इस मामले में काफ़ी हद तक आगे बढ़ चुके थे और उनके हाथ कुछ अहम सुराग लगे थे, इसलिए रातों-रात उन्हें अपने पद से हटा दिया गया. यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया था. लेकिन सबूतों के अभाव में सब बरी हो गए. हां, इसका एक फ़ायदा हुआ कि शीर्ष अदालत ने किसी भी सीबीआई निदेशक को दो साल पहले उसके पद से न हटाने का फैसला दे दिया.

झारखंड मुक्ति मोर्चा घूस कांड

1991 के चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. कांग्रेस 231 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. सरकार बनाने के लिए 256 सीटों की ज़रूरत होती है. जैसे-तैसे करके कांग्रेस की सरकार बनी. 1993 में विपक्ष कांग्रेस के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाया. उसे सरकार गिरने की पूरी उम्मीद थी. पर नरसिम्हा राव ने ‘जादुई’ तरीके से संसद में समर्थन हासिल कर लिया.

कुछ साल बाद सीबीआई ने इस ‘जादुई’ तरीके का खुलासा किया. उसने दावा किया कि वीसी शुक्ल, आरके धवन, कैप्टेन सतीश शर्मा जैसे कांग्रेस के दिग्गजों और होटल व्यवसाय से जुड़े उद्योगपति ललित सूरी ने झारखंड मुक्ति मोर्चा पार्टी के चार सांसदों को भारी घूस देकर अपनी सरकार के समर्थन में वोट करवाया था. हालांकि, पार्टी के मुखिया शिबू सोरेन ने ऐसे किसी भी आरोप को मानने से इंकार दिया. ट्रायल कोर्ट ने नरसिम्हा राव को दोषी ठहराया. फिर मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक गया और जैसा अमूमन इन मामलों में होता है, सभी आरोपित बरी हो गए.

लखूभाई पाठक मामला

यह एक ऐसी दास्तां है जिसमें एक तरफ़ पूंजीवाद था और दूसरी तरफ़ उसी पूंजीवाद के रहनुमाओं यानी हमारे राजनेताओं और दलालों का ख़तरनाक गठजोड़. किस्सा सितंबर 1987 से शुरू होता है. इंग्लैंड में ‘पिकल (अचार) किंग’ कहे जाने वाले गुजराती एनआरआई लखूभाई पाठक ने भारत में नरसिम्हा राव के तांत्रिक दोस्त चंद्रास्वामी और उनके साथी केएन अग्रवाल उर्फ़ ‘मामाजी’ के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी का केस दर्ज़ करवाया था. उन्होंने आरोप लगाया था कि चार साल पहले यानी 1983 में वे अमेरिका के एक होटल में नरसिम्हा राव और तांत्रिक चंद्रास्वामी से मिले थे. लखूभाई के मुताबिक दोनों ने उनसे वादा किया था कि वे उन्हें भारत में न्यूज़प्रिंट पेपर और लुग्दी की सप्लाई का काम दिलवा देंगे.

अगले दिन लखूभाई पाठक ने चंद्रास्वामी को 2,70000 और 73,000 डॉलर के दो चेक दिए. यह भुगतान और वह भी चेक द्वारा क्यों दिया गया? क्या यह रिश्वत थी? इसके जवाब में लखूभाई पाठक ने कहा था कि ‘हां. यह रिश्वत थी’.

1984 में राजीव गांधी की सरकार बनी. नरसिम्हा राव विदेश मंत्री नियुक्त हुए, पर पाठक को भारत में काम नहीं मिला. यहां यह बताना जरूरी है कि आज के दौर में भी अखबारों को इस लुग्दी की ख़रीद पर सरकार से सब्सिडी मिलती है. खैर, लखूभाई पाठक की ‘गुहार’ पर 1988 में सीबीआई ने एफआईआर दर्ज़ की. केस धीमी चाल से बढ़ता रहा. इसी दौरान 1991 में नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बन गए. हालांकि अगले पांच सालों में उनकी स्थिति कमज़ोर हो गई. अप्रैल, 1996 में मेट्रोपॉलिटन जज प्रेम कुमार ने राव को अभियुक्त बनाते हुए कोर्ट में हाज़िर होने को कहा. हालांकि उन्हें कोर्ट में रोज़ न हाज़िर होने की छूट मिल गई.

इस बीच कांग्रेस की आम चुनाव में हार हो गई. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री नहीं रहे. चीफ़ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (सीएमएम) ने राव, चंद्रास्वामी और ‘मामाजी’ को दोषी करार दिया. 30 जुलाई, 1996 को दिल्ली हाई कोर्ट ने सीएमएम के फ़ैसले को बरक़रार रखते हुए तीनों को दोषी पाया. यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट गया. सुप्रीम कोर्ट ने इसे दूसरी अदालत में भेज दिया. दिसंबर, 2003 में सबूतों के अभाव में तीनों आरोपित बरी हो गए. बाद में कुछ जानकारों ने कहा कि यह मामला राजनैतिक था और लखूभाई पाठक ने राव को इस मामले में भाजपा की शह पर खींचा था.

सेंट किट्स मामला

सितंबर 1996 में घोटालों की बोरी से एक और कांड निकला. इसे सेंट किट्स स्कैंडल कहा जाता है. इसकी जड़ें 1989 में पनपी थीं जब बोफ़ोर्स कांड पर विश्वनाथ प्रताप सिंह कांग्रेस की बखिया उधेड़ रहे थे. तब विदेश मंत्री नरसिम्हा राव थे और केके तिवारी विदेश राज्य मंत्री. वीपी सिंह के हमलों से बचने के लिए कांग्रेस ने खोज निकाला कि कैरेबियाई द्वीपों के समूह में से एक सेंट किट्स के एक बैंक में वीपी सिंह के पुत्र अजेय सिंह का खाता है.

इस खाते से संबंधित और वीपी सिंह और उनके पुत्र के दस्तख़त किये हुए कागजात राव और तिवारी ने बतौर सबूत पेश किये. यानी वीपी सिंह कांग्रेस के ख़िलाफ़ ‘बोफ़ोर्स-बोफ़ोर्स’ का राग अलाप रहे थे और कांग्रेस वीपी सिंह के ख़िलाफ़ ‘सेंट्स किट्स-सेंट किट्स’ की डफ़ली बजा रही थी. सरकार ने प्रवर्तन निदेशालय के एक अधिकारी को जांच करने के लिए सेंट किट्स भेजा. उसने आकर अपनी रिपोर्ट में वहां वीपी सिंह और उनके बेटे का अकाउंट होने की बात कही. सीबीआई ने मुक़दमा दर्ज़ कर लिया.

1989 के आम चुनावों में कांग्रेस हार गई. वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनते ही नरसिम्हा राव, चंद्रास्वामी, मामाजी और सीबीआई के पूर्व निदेशक के ख़िलाफ़ सीबीआई जांच बिठा दी. फॉरेंसिक विभाग ने पाया कि वीपी सिंह और उनके बेटे के जाली दस्तख़त बनाए गए थे. आखिर में इस मामले का भी वही हाल हुआ जो बाकियों का हुआ था. सबूतों की कमी के चलते सीबीआई नरसि्हा राव और उनके साथियों के ख़िलाफ़ कोई मज़बूत केस पेश नहीं कर पाई. कोर्ट में सभी बरी हो गए. आज तक यह भी नहीं मालूम चला कि वे जाली दस्तख़त किसने किए थे.

दूरसंचार घोटाला

अगर आप थके न हों तो 1996 में हुए दूरसंचार घोटाले के बारे में भी पढ़ लीजिये. तब तत्कालीन दूरसंचार मंत्री और मंडी (हिमाचल प्रदेश) से लोकसभा सांसद सुखराम के घर पर सीबीआई ने छापा मारकर लगभग 3.5 करोड़ रुपये नकद बरामद किए थे. आरोप लगा कि उनके कार्यकाल के दौरान दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने एक प्राइवेट कंपनी से कई गुना ऊंची कीमतों पर उपकरण ख़रीदे थे. यह भी कहा गया कि दूरसंचार लाइसेंस के वितरण में उन्होंने हिमाचल फ्यूचुरिस्टिक कंपनी लिमिटेड को फ़ायदा पहुंचाया था. सीबीआई ने मामले की तफ़्तीश की और अदालत ने सुखराम को तीन साल की सश्रम सज़ा सुनाई.

1996 का साल इन्हीं घोटालों की भेंट चढ़ गया. चुनावों में कांग्रेस की करारी हुई. नरसिम्हा राव के सिर पर अर्थव्यवस्था को खोलने का सेहरा बांधा गया तो उन्हें घोटालों की माला भी पहननी पड़ी. उनके जीवन के आखिरी साल कोर्ट के चक्कर काटते हुए बीते. पर आश्चर्यजनक रूप से वे और उनके साथी हर मामले में बरी हो गए.