प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए हाल में कुछ मीडिया संस्थानों को इंटरव्यू दिए. सोशल मीडिया की चुनावी चर्चा में ये इंटरव्यू बहस का विषय बने हुए हैं. कई लोगों का कहना है कि इन साक्षात्कारों में नरेंद्र मोदी ने बेरोज़गारी, ग़रीबी, अर्थव्यवस्था जैसे ज़रूरी मुद्दों पर ठोस चर्चा नहीं की. बजाय इसके उन्होंने अपने राजनीतिक व्यक्तित्व और निजी जीवन से जुड़े क़िस्से आदि ज़्यादा सुनाए. वहीं, एक बड़े तबक़े का तर्क यह है कि प्रधानमंत्री मोदी तमाम संघर्ष करते हुए इस मुक़ाम तक पहुंचे हैं, इसलिए अगर वे अपने अनुभवों को साझा कर रहे हैं तो इसमें किसी को क्यों परेशानी होनी चाहिए.

बतौर प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी के साक्षात्कारों पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं. उनके आलोचकों का आरोप है कि ये साक्षात्कार ‘मोदी समर्थक चैनलों को ही दिए जाते हैं जिनमें सबकुछ फ़िक्स होता है’. प्रधानमंत्री से कौन से सवाल पूछे जाएंगे, उनका वे क्या जवाब देंगे ये सब पहले से तय होता है. आम लोगों का एक बड़ा हिस्सा इन आरोपों का समर्थन करता है. इन दिनों जो साक्षात्कार नरेंद्र मोदी दे रहे हैं, वे भी इन आरोपों के दायरे में दिखते हैं.

कई लोगों के मुताबिक़ ध्यान देने पर प्रधानमंत्री के इन साक्षात्कारों से कुछ बातें साफ़ तौर पर निकलकर आती है. एक तो यह कि प्रधानमंत्री इस पर काफ़ी नज़र रखते हैं कि मीडिया में उनके और उनकी सरकार के बारे में क्या कुछ दिखाया-बताया जा रहा है. दूसरा, इनमें प्रधानमंत्री से बहुत हल्के सवाल किए गए और उनके भी अपेक्षित और वाजिब जवाब उन्होंने नहीं दिए.

इन साक्षात्कारों में जिन सवालों को पूछते हुए पत्रकार सबसे ज़्यादा आत्मविश्वास में दिखे उनमें से कुछ यों थे: नरेंद्र मोदी जी, आप थकते क्यों नहीं... आप इतने ऊर्जावान कैसे हैं... नवरात्रों में व्रत रखा है आपने... आप इतना कम क्यों सोते हैं, वग़ैरा-वग़ैरा. हालांकि, इन साक्षात्कारों में चुनाव और मोदी सरकार से जुड़े कई मुद्दों व विवादों पर भी सवाल किए गए लेकिन, उनमें से लगभग सभी सतही थे जिनके प्रधानमंत्री ने भी सतही या टालने वाले जवाब दिए.

उदाहरण के तौर पर रफ़ाल मामले से जुड़े किसी सवाल का प्रधानमंत्री सीधा जवाब नहीं देते. बजाय इसके वे कहते हैं कि मीडिया विपक्ष से सवाल करे तो लोगों को इस डील से जुड़े सब सवालों के जवाब मिल जाएंगे. और प्रधानमंत्री के इस तरह के जवाबों पर कोई काउंटर सवाल करने के बजाय मीडिया ने उन्हें आराम से दूसरी दिशा में चले जाने का मौका दे दिया. अगर कुछ मुद्दों पर पत्रकारों ने उनके जवाबों पर सवाल करने की कोशिश की भी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उलटा उन्हीं से सवाल कर जवाब या सफ़ाई मांगते दिखे. इस दौरान ऐसा प्रतीत होता था मानो प्रधानमंत्री इंटरव्यू दे नहीं रहे थे, बल्कि ले रहे थे. कई लोगों का कहना है कि इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंटरव्यू देने वाले से ज्यादा इंटरव्यू करने वाले पत्रकार नजर आ रहे थे. इसे कुछ नीचे दिये गये उदाहरणों से समझा जा सकता है.

आजतक

देश के जाने-माने हिंदी न्यूज़ चैनल आजतक के इंटरव्यू में प्रधानमंत्री से पूछा गया कि वे विपक्ष के इस आरोप को कैसे देखते हैं कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे का इस्तेमाल लोगों का ध्यान रोज़गार, कृषि संकट जैसे मुद्दों से भटकाने लिए करते हैं. इस पर प्रधानमंत्री कहते हैं, ‘आप कांग्रेस प्रवक्ता हैं या निष्पक्ष मीडिया हैं?’

राहुल कंवल : (कांग्रेस प्रवक्ता) बिलकुल नहीं हैं. हम निष्पक्ष हैं.

नरेंद्र मोदी : तो मेरे जितने भी भाषण हैं, वे आपके पास रिकॉर्डेड हैं. उसका विश्लेषण कीजिए. मान लीजिए एक स्पीच मेरी 40 मिनट की है, तो राष्ट्रीय सुरक्षा को भी तीन-चार मिनट दिए हैं. बाक़ी सब किसान, प्रधानमंत्री सम्मान निधि, सड़क, बिजली सब विषय हैं. अब आप टीआरपी के लिए करते रहेंगे तो हम क्या करेंगे. सवाल कांग्रेस से पूछना चाहिए... क्या आपको टीवी चैनलों पर फ़ुर्सत नहीं है, कि इन चीज़ों (आतंकवाद) पर गंभीरता दिखाएं. इन लोगों को बेनक़ाब करना, निष्पक्ष मीडिया का काम है या नहीं है? कांग्रेस के सवालों को लेकर आप कितने दिन घूमते फिरोगे भई?

राहुल कंवल : हम पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज प्रोग्राम चलाते हैं जिसमें हम लोगों से पूछते हैं कि इस चुनाव में अहम मुद्दे क्या हैं. 36 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि रोज़गार सबसे बड़ा मुद्दा है.

नरेंद्र मोदी : आप फिर कांग्रेस का एजेंडा लेकर चल पड़े हो, उसी को आगे बढ़ा रहे हो. क्या सेवा कर रहे हो मुझे मालूम नहीं है... 2014 में महंगाई हेडलाइन बनती थी. इस चुनाव में महंगाई की चर्चा ही नहीं है. और आपने किसी कांग्रेस नेता को पूछा ही नहीं... आपकी उन पर बड़ी मेहरबानी है.

राहुल कंवल : नहीं बहुत सवाल पूछते हैं. वे कहते हैं कि आप विपक्ष के पीछे पड़े हुए हैं.

नरेंद्र मोदी : महंगाई पर तो कभी नहीं पूछा गया.

राहुल कंवल : पांच सालों में खाद्य महंगाई दर काफ़ी मॉडरेट रही है और किसानों की ज़मीनों के टुकड़े छोटे हो रहे हैं. ऐसे में आप किसानों की आय 2022 तक कैसे दोगुनी करेंगे?

नरेंद्र मोदी : मैं मेरे देश के मीडिया से प्रार्थना करूंगा... आग लगाने के अलावा आपका कोई और रोल ही नहीं है. पुनर्विचार करिए इस पर.

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टाइम्स नाउ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के एक बड़े अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल टाइम्स नाउ के दो शीर्ष पत्रकारों को भी इंटरव्यू दिया. इसमें वे उन्हें बार-बार मशविरा देते नज़र आते हैं कि उन्हें अपनी न्यूज़ रिपोर्टों में क्या दिखाना चाहिए और क्या सवाल करने चाहिए. एक घंटे से ज़्यादा के इस इंटरव्यू में रोज़गार से जुड़े एक सवाल का जवाब देने से पहले प्रधानमंत्री उल्टा पत्रकार से सवाल कर बैठते हैं. इंटरव्यू का यह हिस्सा इस प्रकार है:

पत्रकार : आपने (2014 में ) कहा था कि पांच साल में दस करोड़ नौकरियां देंगे.

नरेंद्र मोदी : आप रिसर्च करते हैं क्या? मैं चाहूंगा कि रिसर्च कीजिए. कब, कहां, क्या लिखा हुआ वो भी चेक कर लीजिए. लेकिन कांग्रेस की चर्चा ही आपके सवाल का आधार है... टाइम्स नाउ को रिसर्च टीम बनानी चाहिए.

पत्रकार : पेपरों में काफ़ी आकड़े आए हैं... आपने कहा था आप हिसाब देंगे.

नरेंद्र मोदी : मैंने संसद में हिसाब दिया है. मुद्रा योजना से 17 करोड़ लोन बिना गारंटी के मिले... उसमें सवा चार करोड़ लोगों ने पहली बार लोन प्राप्त करे, आप मुझे बताइए, वह (लोन) क्यों लेगा? वह पैसे लेगा क्यों? कोई न कोई रोज़गार शुरू किया होगा. रेलवे, सड़क पर पहले से दोगुना काम कर रहे हैं. क्या वो बिना रोज़गार के होता होगा? मेट्रो बन रही है, बिना मैन पावर के होता होगा? लेकिन कांग्रेस जो झूठ चला रही है, उसे लेकर कुछ लुटियंस मीडिया चलें, वह तो मैं समझ सकता हूं. लेकिन टाइम्स नाउ ऐसा नहीं कर सकता.

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एबीपी न्यूज़

हाल में नरेंद्र मोदी ने जितने भी टीवी इंटरव्यू दिए, उनमें एबीपी न्यूज़ का इंटरव्यू काफ़ी चर्चा में रहा. इसमें रफ़ाल विवाद से जुड़े एक सवाल पर प्रधानमंत्री ख़ासे नाराज़ हो गए थे. चैनल की पत्रकार रूबिका लियाकत ने सवाल किया था कि क्या रफ़ाल सौदे में प्रधानमंत्री ने अनिल अंबानी को फ़ायदा नहीं पहुंचाया. इस पर उन्होंने कहा, ‘आप सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोसा नहीं करोगे? आप सीएजी पर भी भरोसा नहीं करोगे क्या? क्या फ़्रांस के (मौजूदा) राष्ट्रपति की बात को नहीं मानोगे? आप लोग इतने पक्षपातपूर्ण हैं. मैं सीधा एबीपी पर आरोप लगाता हूं... एक झूठ जो कहीं सिद्ध नहीं हुआ, उसे पूछने वाले से सवाल करने की आपकी हिम्मत नहीं है... आपकी क्या मजबूरी है, आप जानें. दूसरी बात, कहीं किसी सोशल मीडिया में भी (भाजपा को लेकर) एकाध चीज़ बुरी आ जाए, तो आप 24 घंटे की हेडलाइन बनाते हैं. लेकिन पिछले दस दिन में एक ऑनलाइन मैगज़ीन में इस परिवार (गांधी) पर सबूतों के साथ भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. कल देश के वित्त मंत्री ने उस रिपोर्ट के आधार पर प्रेस कॉन्फ़्रेंस की. आपके एबीपी ने उसे ब्लैकआउट किया, उस पर चर्चा नहीं की. आप एक झूठी ख़बर (रफाल) पर देश के प्रधानमंत्री से सवाल करने की हिम्मत कर सकते हैं... लेकिन वित्त मंत्री की प्रेस कॉन्फ़्रेंस को ब्लैकआउट करे... उस परिवार से आप जवाब नहीं मांगते. क्या मजबूरी है आप लोगों की? क्यों सच बाहर नहीं लाते हो?’

प्रधानमंत्री की इस नाराज़गी पर चैनल के एक अन्य पत्रकार सुमित अवस्थी ने कहा, ‘प्रधानमंत्री जी, कोई मजबूरी नहीं है. हम सवाल पूछते हैं. जब वे मिलेंगे तो उनसे भी सवाल पूछेंगे. इसकी गारंटी में आपको दे रहा हूं.’ वहीं, रूबिका लियाकत सफ़ाई में कहती हैं, ‘प्रधानमंत्री जी मैंने रफ़ाल पर कई डीबेट की हैं. हमने बहुत सवाल पूछे हैं.’

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रिपब्लिक भारत

नरेंद्र मोदी ने रिपब्लिक भारत को भी इंटरव्यू दिया. इसमें चैनल के संपादक अर्णब गोस्वामी ने उनसे कई सवाल पूछे. इनमें एक सवाल वंशवादी राजनीति को लेकर था. अर्णब ने मोदी से पूछा कि वंशवाद से उन्हें समस्या क्या है. इस पर मोदी ने कहा कि यह लोकतंत्र के लिए ख़तरा है. इस पर अर्णब ने कहा कि ऐसा तो भाजपा में भी है. उसके बाद प्रधानमंत्री ने कहा, ‘आप मुझे बताएं आंध्र में टीडीपी में एक ही परिवार के कितने लोग उस पार्टी में चुनाव लड़ रहे हैं. आपने देखा है? क्यों चर्चा नहीं करते हो? फिर आप कहोगे के राजनाथ जी का भी बेटा है. यहीं आप अटक जाते हो. ऐसा करके आप लोकतंत्र के इतने बड़े संकट को छोटा करने की कोशिश करते हो.’

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