नेटफ्लिक्स पर एक पाकिस्तानी फिल्म मौजूद है, नाम है ‘चले थे साथ’. यह फिल्म गिलगित के हुंज़ा की एक डॉक्टर, रेशम और गिलगित आए एक चीनी लड़के एडम की प्रेम कहानी है. रेशम अपनी मेडिकल की पढ़ाई खत्म करने के बाद अपने तीन दोस्तों के साथ गिलगित में एक रोड ट्रिप के लिए निकली है. ट्रिप के आखिर में उसे अपने घर, अपने पिता के पास पहुंचना है.

एडम के गिलगित आने की वजह है उसके पिता. वे साठ के दशक में चीन के एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तहत शुरू हुए काराकोरम हाईवे के निर्माण के लिए यहां आए हज़ारों चीनियों में से एक थे. एडम और रेशम उस क़ब्रिस्तान में मिलते हैं, जहां उसके पिता दफ़न हैं. गाइड बताता है, ‘ये वो जगह है जहां पर चाइनीज़ दफ़न हैं, जो काराकोरम हाईवे की तामीर के दौरान अपने ख़ालिक़-ए-हक़ीक़ी से जा मिले. इस हाईवे को बनाने में सात साल लगे. इस दौरान 200 चाइनीज़ और 800 पाकिस्तानियों की जानें चली गईं, मुख़्तलिफ़ वजूहात के बिना पर.’

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एडम और रेशम एक दूसरे को देखते हैं, और फिर प्यार कर बैठते हैं. क़िस्सा ये भी है कि एडम कि पिता जब एक बार पाकिस्तान (असल में गिलगित, जो कि पाकिस्तानी क़ब्ज़े में है मगर पाकिस्तान नहीं है) आए तो उन्हें यहां के पहाड़ों और सीधे-सादे लोगों से इतना प्यार हो गया कि वे अपनी पत्नी और बेटे के पास वापस चीन नहीं गए. इस बार इन पहाड़ों और लोगों के प्यार में पड़ने की बारी दूसरी पीढ़ी की है. पहली नज़र के प्यार का हश्र ये होता है कि चीनी लड़का छींकने के बाद अलहमदुलिल्लाह कहना सीख लेता है. शुरुआत में लड़की के दोस्तों को ऐतराज़ होता है कि ये हमारे जैसा कभी नहीं हो सकता, मगर वे भी आगे चलकर उसे पठानी सूट पहनने, समोसा खाने और तश्तरी में डालकर चाय पीने की ट्रेनिंग देने लगते हैं.

तमाम मेलोड्रामा के बाद कहानी को हैप्पी एंडिंग मिल जाती है. पाकिस्तान गिलगित की बेटी को ख़ुशी-ख़ुशी चीनी दामाद को सौंप देता है. दूसरे फ़िरक़े और जाति तक को लड़की न देने वाले लोग चीन की सरपरस्ती में काफी उदारवादी होने लगे हैं. पर शायद दो सल्तनतों के बेहतर रिश्ते के लिए सिर्फ उनके आकाओं का करीब होना काफी नहीं, रियाया को भी करीब लाना ज़रूरी है.

आप पूछ सकते हैं कि इस कहानी से आपका क्या ताल्लुक है? तो जवाब से पहले एक सवाल सुन लें. ज़रा फ़र्ज़ करें कि पाकिस्तान और चीन की दोस्ती का परचम लहराती ये कहानी अगर गिलगित की जगह लद्दाख या बारामूला में फ़िल्माई गई होती तब भी क्या आप यही सवाल करते? आम हिंदुस्तानियों के लिए कश्मीर का मसला इतना अहम है कि राजनीतिक पार्टियां चुनावों में कश्मीर के नाम पर भी वोट मांग लेती हैं. अगर कश्मीर की तस्वीर सोचने (एक भू-राजनीतिक कल्पना) को कहा जाए तो हम में से ज़्यादातर लोग भारत के नक़्शे के ऊपरी हिस्से में नज़र आते कश्मीर के नक़्शे के बारे में सोचेंगे. लेकिन उस नक़्शे के भीतर मौजूद शहरों और घाटियों के बारे में अगर सवाल किया जाए तो वे शायद श्रीनगर, बारामूला, पहलगाम, गुलमर्ग, अनंतनाग और अब पुलवामा से आगे न बढ़ पाएं.

हक़ीक़त ये है कि हम भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा और लाइन ऑफ़ कंट्रोल के पूर्व और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (चीन और भारत के बीच की बदलती रहने वाली सीमा, जिसे अभी तक तय नहीं किया जा सका है) के पश्चिम में सिमटे हिंदुस्तानी अधिकार वाले कश्मीर को ही जानते हैं, वह भी काफी कम. जबकि पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाला ‘आज़ाद कश्मीर’, गिलगित-बाल्टिस्तान का इलाक़ा जिसे पाकिस्तान अपना पांचवां राज्य बनाने का मंसूबा रखता है, और चीनी क़ब्ज़े वाले अक्साई चिन का ज़िक्र न तो हम कश्मीर के नाम पर वोट मांगने वाले नेताओं की तहरीरों में सुनते हैं, और न ही मुख्यधारा के मीडिया में.

हम भूल जाते हैं कि पीओके, जिसमें आज़ाद कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान (जिसके एक हिस्से को पाकिस्तान ने 1963 में चीन को तोहफ़े में दे दिया था) शामिल है और अक्साई चिन (जो 1962 के युद्ध में चीन ने क़ब्ज़े में ले लिया) भी कश्मीर समस्या का हिस्सा हैं. और अगर कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो इस लिहाज़ से ये हिस्से भी भारत का अभिन्न अंग होते हैं.

ऐसे में अगर गिलगित भारत का हिस्सा है, तो फिर वहां चीन-पाकिस्तान के ब्याह का मंडप कैसे गाड़ा जा सकता है! हम देख सकते हैं कि यह फिल्म दो मुल्कों के बाशिंदों की प्रेम कहानी से कहीं ज़्यादा उनकी सरकारों की प्रेमकहानी है. और दो सरकारों के प्रेम की निशानी काराकोरम हाईवे को फिल्म के किसी मरकज़ी किरदार से कम जगह नहीं मिली है.

इसी तरह स्थानीय विज्ञापन एजेंसियां भी इस दोस्ती को ध्यान में रखकर विज्ञापन बना रही हैं. मिसाल के लिए मसाले बेचने वाली एक पाकिस्तानी कंपनी शाह फ़ूड्स के इस एड में आप अपने पति के साथ पाकिस्तान में रहने वाली एक चीनी महिला को सर पर दुपट्टा ओढ़े बिरयानी बनाकर पड़ोसी पाकिस्तानियों के घर ले जाते देख सकते हैं. यानी दोनों मुल्क सिर्फ बेटियां ही नहीं, कपड़े और खान-पान भी बदलने को तैयार हैं. ख़बरें ये भी हैं कि चीन और पाकिस्तान की सरकारें मिलकर सीपीईसी यानी चाइना-पाकिस्तान इकॉनॉमिक कॉरीडोर पर भी फिल्म बनाएंगी.

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अगली फिल्म में अगर कश्मीर और पाकिस्तान मिलकर लद्दाख या बाकी कश्मीर को ही पाकिस्तान का हिस्सा मंसूब कर दें, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए. हमें भूलना नहीं चाहिए कि 2010 में वेन जियाबाओ की दूसरी भारत यात्रा की शाम बीजिंग ने बयान दिया था कि भारत और चीन की कुल सीमा मात्र 2000 किलोमीटर है. जिसका अर्थ था कि वे अरुणाचल प्रदेश से लेकर हिमाचल प्रदेश तक की सीमा को ही भारत-चीन सीमा मान रहे थे, लद्दाख से लगी लगभग 1500 किलोमीटर की सीमा को चीन ने मानने से इनकार कर दिया क्योंकि जियाबाओ लद्दाख यानी जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा मान रहे थे.

चीन के विस्तारवादी नज़रिए और भारत की सीमा के भीतर उसके घुसते आने के इतिहास के मद्देनज़र उठाए जा सकने वाले सवालों के अलावा भी हमें इस फिल्म पर सवाल करने की ज़रूरत है. गिलगित-बाल्टिस्तान की ख़ूबसूरत वादियां, ख़ूबसूरत लोग, चीन पाकिस्तान की सदाबहार दोस्ती का रिश्ते में बदलना, फिल्म में सबकुछ काफी फिल्मी है. और इसीलिए इसकी फ़िल्मी रुमानियत इस विवादित इलाक़े की काली हक़ीक़त पर परदा डाल देती है.

गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तानी क़ब्ज़े और चीनी मौजूदगी के चलते होने वाले तमाम तरह के मानवाधिकार हनन, जनसांख्यिक बदलाव और पर्यावरण को हो रहे नुक़सान की ख़बरें बाहर आते रहने के बाद इस फिल्म को नज़रअंदाज़ कर पाना आसान नहीं रह जाता. आपका ताज्जुब तब और बढ़ जाता है जब आप देखते हैं कि निर्देशक ने 2010 में हुंज़ा में हुई झील त्रासदी को भी एक रूमानियत की चाशनी में डुबाकर परोस दिया है. फ़िल्मों के ज़रिए नए सच गढ़े जाने के इस दौर में, यह फिल्म दिखाती है कि ज़मीनी हक़ीक़तों के ऊपर रूमानियत के पर्दे डालकर उसे कैसे छुपाया जा सकता है.