वसुंधरा एक और विवाद में घिरीं | सोमवार, 29 जून 2015
ललित मोदी प्रकरण में घिरीं राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर एक और विवाद खड़ा हुआ. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि धौलपुर पैलेस एक सरकारी संपत्ति है जिसे वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह और आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी ने अपनी निजी संपत्ति बना लिया है. पार्टी नेता जयराम रमेश ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ दस्तावेज़ दिखाते हुए यह दावा किया. उधर, कांग्रेस के आरोपों का खंडन करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि धौलपुर पैलेस दुष्यंत सिंह की निजी संपत्ति है. राजस्थान में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी ने जयपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दावा किया कि भारत सरकार के दस्तावेज़ दुष्यंत के मालिकाना हक़ को साबित करते हैं. वसुंधरा राजे पर आईपीएल में वित्तीय गड़बड़ी के आरोपी ललित मोदी की मदद करने का आरोप है. 2010 में प्रवर्तन निदेशालय की जांच शुरू होने के बाद से ललित मोदी लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं.
जयललिता की रिकॉर्डतोड़ जीत | मंगलवार, 30 जून 2015
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता ने दो दर्जन से ज्यादा प्रतिद्वंदियों की जमानत जब्त कराते हुए विधानसभा का उपचुनाव जीत लिया. राज्य की आरके नगर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उन्होंने डेढ़ लाख से ज्यादा मतों के अंतर से जीत हासिल की. सितंबर 2014 में आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में निचली अदालत द्वारा जयललिता को दोषी करार दिया गया था. इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद के साथ-साथ विधानसभा सदस्यता से भी हाथ धोना पड़ गया था. इसी साल मई में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को निरस्त करते हुए उनकी सजा रद्द कर दी जिसके बाद वे फिर से मुख्यमंत्री बन गईं. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद छह महीनों के अंदर जयललिता का विधानसभा सदस्य चुना जाना अनिवार्य था. तमिलनाडु के अलावा चार और राज्यों त्रिपुरा , मध्यप्रदेश, केरल और मेघालय की पांच विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में इन राज्यों की सत्ताधारी पार्टियों – सीपीआई-एम, भाजपा और कांग्रेस – के प्रत्याशी चुनाव जीतने में सफल रहे.
दुष्कर्म के मामलों में किसी भी तरह का समझौता मंजूर नहीं : सुप्रीम कोर्ट | बुधवार, एक जुलाई 2015
दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता और अपराधी के बीच किसी भी तरह के समझौते को देश की सबसे बड़ी अदालत ने अस्वीकार्य करार दिया. सुप्रीम कोर्ट ने इस कवायद को पीड़ित महिला की गरिमा के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में दोनों की शादी करा देने या किसी भी अन्य तरह के समझौते का प्रयास पूरी तरह से अनुचित और अवैध माना जाएगा. शीर्ष अदालत ने इस तरह के मामलों में अदालतों के नरम रवैये पर भी सवाल उठाते हुए उन्हें सख्त कार्रवाई करने की नसीहत पिलाई है. सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश में हुए दुष्कर्म के एक मामले में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. दरअसल मध्यप्रदेश की एक निचली अदालत ने मदनलाल नाम के एक व्यक्ति को एक सात वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म का दोषी मानते हुए उसे पांच साल कैद की सजा सुनाई थी. लेकिन भोपाल हाइकोर्ट ने इसे छेड़छाड़ का मामला मानते हुए उसे रिहा कर दिया. इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा जिस पर अदालत की यह टिप्पणी आई. इस टिप्पणी को महिला अधिकारों की दृष्टि से बेहद सराहनीय माना जा रहा है. जानकारों का मानना है कि इसके बाद दुष्कर्म के मामलों में होने वाले समझौतों पर काफी हद तक अंकुश लग सकेगा. भारत में इस तरह के मामलों को समझौते के जरिए निपटा देने के ढेरों उदाहरण हैं.
महाराष्ट्र सरकार ने कहा, मदरसे स्कूल नहीं | गुरुवार, दो जुलाई 2015
महाराष्ट्र के मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को अब स्कूली छात्र नहीं माना जाएगा. राज्य सरकार ने वहां के सभी मदरसों को स्कूल की श्रेणी से बाहर कर दिया. इसके साथ ही सरकार ने सभी जिलों के अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे अपने-अपने जिलों में स्थित मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को ‘आउट ऑफ स्कूल चिल्ड्रेन’ घोषित कर दें. राज्य सरकार ने मदरसों के सामने यह शर्त रखी है कि यदि वे सरकारी मान्यता और अनुदान पाते रहना चाहते हैं तो उन्हें अपने पाठ्यक्रम में गणित विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे औपचारिक स्कूली विषयों को भी शामिल करना होगा. अपने इस फैसले के पीछे महाराष्ट्र सरकार ने दलील दी है कि इसका मकसद मदरसों में तालीम पाने वाले बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा प्रदान कराना है. सरकार का कहना है कि मदरसों में पढ़ने वालों को व्यावहारिक ज्ञान के बजाय धार्मिक शिक्षा दी जाती है जिसके चलते उन्हें मुख्यधारा से जुड़ी सीमित जानकारियां ही मिल पाती हैं. सरकार ने उम्मीद जताई है कि मदरसों को स्कूल की श्रेणी से हटा दिए जाने के बाद लोग अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में करेंगे. वहीं दूसरी तरफ, मुस्लिम धर्मगुरुओं ने सरकार के इस फैसले को लेकर विरोध जताना शुरू कर दिया है.
मोबाइल कंपनियों ने ‘नंबर पोर्टेबिलिटी’ सुविधा शुरू की | शुक्रवार, तीन जुलाई 2015
नंबर बदलने और रोमिंग के झंझट से परेशान मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए एक अच्छी खबर है. मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों ने देश के अधिकतर राज्यों में ‘मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी’ (एमएनपी) की सुविधा शुरू कर दी है. इससे लोग दूसरे राज्यों में जाने के बाद बिना मोबाइल नंबर बदले किसी भी अन्य मोबाइल कंपनी की सेवा ले सकेंगे. इसके लिए उन्हें 19 रूपये का प्राथमिक शुल्क जमा करने के अलावा किसी भी तरह का अन्य चार्ज नहीं देना पड़ेगा. इस फैसले को ‘एक देश, एक व्यक्ति और एक मोबाइल नंबर’ की दिशा में बेहद अहम पड़ाव माना जा रहा है. देशभर के मोबाइल उपभोक्ताओं की मांग को देखते हुए केंद्र सरकार ने मोबाइल कंपनियों के सामने एमएनपी लागू करने के लिए तीन जुलाई की डेडलाइन रखी थी. इस फैसले से करोड़ों मोबाइल उपभोक्ताओं को राहत मिलने की उम्मीद है. दरअसल मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी की मांग पिछले कई सालों से चली आ रही थी. देश भर के 15 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता तो इसको लेकर लिखित मांग तक कर चुके हैं.
जेठमलानी ने छोटा शकील के दावे पर 'मुहर' लगाई, सरकार ने चुप्पी साधी | शनिवार, चार जुलाई 2015
जानेमाने वकील राम जेठमलानी ने ‘दाऊद इब्राहिम की आत्मसमर्पण की पेशकश’ को भारत द्वारा नामंजूर कर दिए जाने संबंधी छोटा शकील के दावे की पुष्टि की है. पूर्व कानून मंत्री जेठमलानी ने कहा है कि 1993 के मुंबई धमाकों का आरोपी दाऊद वाकई भारत सरकार के सामने आत्मसमर्पण करना चाहता था, लेकिन उसे ऐसा नहीं करने दिया गया. जेठमलानी के मुताबिक महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार ने उसकी इस पेशकश को ठुकरा दिया था. उन्होंने यह भी कहा कि पवार के अलावा उस समय की केंद्र सरकार भी इसके लिए राजी नहीं थी. एक समाचार एजेंसी से बात करते हुए जेठमलानी का यह भी कहना था कि मुंबई हमले के बाद दाऊद इब्राहिम ने उनसे लंदन में मुलाकात की थी और भारत लौटने की इच्छा जताई थी. उनके मुताबिक वह इस शर्त पर भारत आना चाहता था कि पुलिस उसके साथ नरमी से पेश आए और सरकार उसकी सुरक्षा की पूरी गारंटी ले. दाऊद को डर था कि उसके खिलाफ चलने वाले मामले की सुनवाई के दौरान उसकी हत्या की जा सकती है. जेठमलानी का यह बयान टाइम्स आफ इंडिया में छपे छोटा शकील के उस इंटरव्यू के बाद आया है जिसमें उसने आरोप लगाया था कि भारत सरकार ने दाऊद का सरेंडर नहीं होने दिया था. इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार ने फिलहाल कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है. पत्रकारों द्वारा जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि वे इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करना चाहते.