उद्योगपति मुकेश अंबानी का रिलायंस जिओ इंस्टीट्यूट पिछले साल इसलिए ख़बरों में था क्योंकि उसे उसकी स्थापना से पहले ही देश के सर्वश्रेष्ठ छह शिक्षण संस्थानों में शुमार करने पर ‘सरकारी सहमति’ मिल गई थी. लेकिन इस साल यह संस्थान फिर इसलिए सुर्ख़ियों में आया है क्योंकि उसने तय समय-सीमा के भीतर निर्धारित शर्तों को पूरा नहीं किया है.
द इकॉनॉमिक टाइम्स के अनुसार केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जिन छह शिक्षण संस्थानों को उत्कृष्ट दर्ज़ा दिया था उनके स्तर की समीक्षा के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त विशेष समिति (ईईसी) बनाई है. इस समिति ने जिओ इंस्टीट्यूट के प्रति नाराज़गी जताई है. नाराज़गी इस बात पर है कि जिओ इंस्टीट्यूट ने अब तक अपनी सारी योजना-तैयारी आदि के बारे में काग़जी जानकारियां ही दी हैं. जबकि ज़मीनी स्तर पर चल रहे कामों में लगातार देरी हो रही है.
बताया जाता है कि बीती 29-30 अप्रैल को ईईसी ने समीक्षा बैठक ली थी. इसमें उत्कृष्ट दर्ज़ा प्राप्त सभी छहों संस्थानों के प्रतिनिधि भी थे. जिओ इंस्टीट्यूट की ओर से उसके निर्वाचित कुलपति (क्योंकि जिओ इंस्टीट्यूट निजी विश्वविद्यालय के तौर पर स्थापित हो रहा है) दीपक जैन और शिक्षा सलाहकार पूर्व आईएएस विनय शील ओबेरॉय उपस्थित थे. इसी बैठक के दौरान ईईसी ने जिओ इंस्टीट्यूट की स्थापना में हो रही देरी पर अपनी नाराज़गी स्पष्ट रूप से व्यक्त की.
ईईसी के प्रमुख एन गोपालस्वामी ने अख़बार से बातचीत में इसकी पुष्टि की है. उन्होंने बताया, ‘उन लोगाें ने माना है कि विभिन्न कामों में देर हो रही है. साथ ही यह भरोसा भी दिया है कि वे काम में तेजी लाएंगे. हमने भी उनसे इस बारे में एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा है.’ गोपालस्वामी ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी ‘जिओ इंस्टीट्यूट को उत्कृष्ट दर्ज़ा देने पर सिर्फ़ सहमति पत्र दिया गया है. यह दर्ज़ा उन्हें तभी मिलेगा जब वे तय समय-सीमा में सभी निर्धारित शर्तें पूरी करेंगे.’
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