हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के कुछ साक्षात्कार अलग-अलग माध्यमों से लोगों के सामने आए हैं. प्रधानमंत्री मोदी का एक ‘गैर राजनीतिक’ बताया गया इंटरव्यू’ मशहूर ​अभिनेता अक्षय कुमार ने किया. इसके साथ-साथ उन्होंने कुछ और चैनलों को भी इंटरव्यू दिए हैं. ऐसे ही राहुल गांधी ने दो चैनलों और एक पत्रिका को इंटरव्यू दिया है.

रैलियों और अलग-अलग राजनीतिक मंचों पर दोनों नेताओं के विचारों को लेकर काफी बात होती है. नरेंद्र मोदी का समर्थन करने वाले लोग राहुल गांधी की बातों को आधार बनाकर उन्हें ‘पप्पू’ कहते हैं तो राहुल गांधी से सहानुभूति रखने वाले लोग और मूल तौर पर मोदी विरोधी लोग नरेंद्र मोदी को ‘फेंकू’ बताते हैं. राजनीतिक मंचों और उनमें भी खास तौर पर चुनावी मंचों के बारे में राजनीतिेक वर्ग और एक हद तक आम जनता में भी यह स्वीकार्यता है कि इन मंचों पर बड़बोलापन हर दल के नेता दिखाते हैं.

लेकिन साक्षात्कारों में उम्मीद की जाती है कि यहां राजनेता अधिक तार्किक ढंग से सवालों के जवाब देंगे. साक्षात्कार को अहम इसलिए भी माना जाता है क्योंकि इसमें संवाद दोतरफा होता है. इसमें भी पत्रकारों द्वारा जो साक्षात्कार लिए जाते हैं, उनके बारे में अपेक्षा यह की जाती है कि इनमें सभ्यता और निष्पक्षता के दायरे में रहते हुए कठिन से कठिन सवाल पूछे जाएंगे.

इन पैमानों पर अगर नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के साक्षात्कारों की तुलना करें तो कई बातें स्पष्ट तौर पर उभरकर सामने आती हैं. सबसे पहला फर्क तो साक्षात्कारों की पूरी पृष्ठभूमि को लेकर दिखता है. नरेंद्र मोदी के विरोधी और स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक भी उन पर यह आरोप लगाते हैं कि वे या तो सिर्फ अक्षय कुमार और प्रसून जोशी जैसे फिल्म जगत से जुड़े लोगों से अपना इंटरव्यू कराते हैं या कुछ गिने-चुने पत्रकारों से.

इन आरोपों को इस बात से भी बल मिलता है कि नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू में उनसे असहज सवाल कोई नहीं पूछता. बल्कि जो पत्रकार उनका इंटरव्यू कर रहे होते हैं, वे उनकी सरकार की उपलब्धियों के बारे में और उनके महिमामंडन से ही अपना सवाल शुरू करते हैं और फिर हल्की-फुल्की दिशाओं में आगे बढ़ जाते हैं.

इस संदर्भ में अगर राहुल गांधी के साक्षात्कारों को देखें तो उनमें एक ताजगी दिख रही है. इंडिया टुडे के इंटरव्यू में उन्होंने कई असहज सवालों का जवाब बेहद सहजता से दिया है. यह इंटरव्यू प्रचार अभियान के दौरान राहुल गांधी के विमान में लिया गया है. छपा हुआ इंटरव्यू होने की वजह से राहुल गांधी के विरोधी कुछ लोग यह आरोप लगा सकते हैं कि उन्हें इंडिया टुडे के पत्रकारों ने पहले से सवाल दे दिये होंगे जिनके जवाब उनकी टीम ने तैयार कर दिये होंगे. वैसे इस इंटरव्यू में उनकी विमान के अंदर की कई तस्वीरें हैं जिनसे यह बात स्थापित होती है कि यह बातचीत हुई है. इसके बावजूद यह आरोप लगाया जा सकता है कि राहुल गांधी को सवालों के लिखित जवाब दिए गए हों.

लेकिन जो इंटरव्यू राहुल गांधी ने एनडीटीवी के पत्रकार श्रीनिवासन जैन को दिया है, उसमें भी इस तरह के कई असहज करने वाले सवाल पूछे गए हैं जिनका जवाब राहुल गांधी उसी सहजता से​ देते हुए दिख रहे हैं. टीवी-9 को दिये उनके इंटरव्यू में भी ऐसा ही कुछ नजर आता है.

इन साक्षात्कारों में राहुल गांधी से प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस को लेकर कई ऐसे सवाल पूछे गए जो उन्हें असहज करने वाले थे लेकिन राहुल गांधी ने इन सभी सवालों का पूरे आत्मविश्वास और सहजता से जवाब दिया. आम तौर पर ऐसे सवालों पर नरेंद्र मोदी तिलमिला जाते हैं और उलटा पत्रकार और मीडिया की साख पर ही सवाल खड़े करने लगते हैं. प्रधानमंत्री बनने से पहले एक असहज सवाल पर उन्होंने एक इंटरव्यू बीच में यह कहते हुए छोड़ दिया था कि दोस्ती बनी रहे. इन बातों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि असहज सवालों का सामना करने के मामले में नरेंद्र मोदी के मुकाबले अभी राहुल गांधी ज्यादा सहज दिख रहे हैं.

नरेंद्र मोदी के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे आम तौर पर उन्हीं पत्रकारों को इंटरव्यू देते हैं जिनके बारे में आम धारणा यह है कि वे उनके और उनकी भारतीय जनता पार्टी के प्रति सहानुभूति रखते हैं. हाल के समय में उन्होंने अभिनेता अक्षय कुमार के अलावा आज तक और इंडिया टीवी को इंटरव्यू दिया है.

दुर्भाग्य से राहुल गांधी ने भी जिन पत्रकारों को इंटरव्यू देने के लिए चुना उनमें भी यह बात दिखती है. कई लोगों को लगता है कि एनडीटीवी नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति कुछ ज्यादा ही सख्त रुख अपनाने वाला चैनल है. टीवी-9 के इंटरव्यू में खुद राहुल गांधी ने इंटरव्यू लेने वाली पत्रकार की एक पुरानी बात का हवाला दिया. इसमें से यह कहते नजर आते हैं कि आपने ही कहा था कि रफाल मुद्दा लोगों के खून में घुस गया है और भाजपा लाख चाहे लेकिन अब यह बाहर नहीं निकल सकता. इससे संबंधित पत्रकार और राहुल गांधी की आपसी सहजता का पता चलता है. लेकिन इंडिया टुडे के राज चेंगप्पा के बारे में ये बात नहीं कही जा सकती. राज चेंगप्पा जिस इंडिया टुडे समूह में काम करते हैं, उसके बारे में कुछ लोगों की यह राय है कि यह राहुल गांधी और विपक्षी खेमे के मुकाबले नरेंद्र मोदी और भाजपा खेमे के ज्यादा अनुकूल है. इसके बावजूद राहुल गांधी का इंडिया टुडे को इंटरव्यू देना उनके आत्मविश्वास को भी दिखाता है.

नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू कई बार एक ‘इवेंट’ की तरह आयोजित किये जाते हैं. अक्षय कुमार के साथ उनका कथित ‘गैर राजनीतिक इंटरव्यू’ भी ऐसा ही था. आज तक को उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र बनारस के घाट पर और गंगा नदी में पानी के जहाज में बैठकर इंटरव्यू दिया. इंडिया टीवी के रजत शर्मा ने नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में हजारों लोगों की भीड़ के बीच रिकॉर्ड किया. संभव है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी को इसका चुनावी लाभ भी मिल जाए लेकिन ऐसा होने की वजह से कई लोगों को यह बातचीत कृत्रिम लगती है. उदाहरण के तौर पर बनारस में इंटरव्यू के दौरान नरेंद्र मोदी को एक सामान्य चाय वाले की चाय यह कहते हुए पिलाई जाती है कि पता नहीं आप ऐसा कर सकते हैं या नहीं, एसपीजी आपको ऐसा करने देगी या नहीं. जबकि कोई बच्चा भी बता सकता है कि देश के प्रधानमंत्री को चलते-फिरते किसी भी चाय वाले की चाय पिलाना तो दूर ऐसा सोच पाना भी मुमकिन नहीं है.

इसके उलट राहुल गांधी ने एनडीटीवी और टीवी-9 को जो इंटरव्यू दिए हैं, वे जनसभाओं के बीच दिए गए हैं. पीछे लोगों का शोर है. इसके बावजूद राहुल गांधी ने शोर से परेशान हुए बिना बहुत सधे अंदाज में ये इंटरव्यू दिए हैं. बल्कि कई बार तो उन्होंने अपने जवाब देते हुए आम जनता को भी बड़ी चतुराई से इनमें शामिल कर लिया है. उनके इन साक्षात्कारों में नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू वाली ‘कृत्रिमता’ के बजाय काफी ‘सहजता’ नजर आती है. यहां एक बात साफ दिखाई देती है - अपने साक्षात्कारों में कठिन से कठिन सवालों का जवाब राहुल गांधी चलते-फिरते और लोगों के शोर के बीच भी देते हैं. जबकि नरेंद्र मोदी अनुकूल से लगने वाले ज्यादातर सवालों का जवाब इवेंट जैसे साक्षात्कारों में ही देना पसंद करते हैं.

नरेंद्र मोदी अपने इंटरव्यू में आम लोगों की भाषा में अधिक सहज दिखते हैं. हिंदी में जब वे बात करते हैं तो अधिक सहजता के साथ लोगों के साथ जुड़ते हुए दिखते हैं. वहीं राहुल गांधी अधिक सहज अंग्रेजी में संवाद करते हुए नजर आते हैं. हालांकि उन्होंने अपनी हिंदी में काफी सुधार किया है लेकिन इस मामले में अब भी नरेंद्र मोदी उन पर भारी पड़ते दिखते हैं. शायद यही वजह है कि राहुल गांधी ने अब तक जो तीन साक्षात्कार दिये हैं उनमें से पहले दो और सबसे लंबे अंग्रेजी में ही हैं.

जहां तक बातचीत में गहराई की बात है तो अपने हाल के साक्षात्कारों में राहुल गांधी नरेंद्र मोदी पर भारी पड़ते लग रहे हैं. इंडिया टुडे के इंटरव्यू में उन्होंने नेतृत्व के सवाल पर, प्रधानमंत्री बनने के सवाल पर, अपनी मां और बहन से संबंधों के सवाल पर और अपनी पसंद-नापसंद के सवाल पर एक अलग स्तर पर जाकर जवाब दिया. नरेंद्र मोदी आम तौर पर ऐसे सवालों से बचने की कोशिश करते हैं या फिर इन सवालों का बेहद राजनीतिक जवाब देते हैं.

इन दोनों नेताओं के इंटरव्यू में एक और फर्क यह दिखता है कि नरेंद्र मोदी अक्सर अपने साक्षात्कारों में खुद को ‘पीड़ित’ साबित करने की कोशिश करते हैं. वे अपने हर इंटरव्यू में कहते हैं कि पिछड़ी जाति से होने की वजह से, आम परिवार से होने की वजह और अन्य ऐसी ही वजहों से कांग्रेस और विपक्ष उन पर निशाना साधते हैं. लेकिन राहुल गांधी कभी यह कहते हुए नहीं दिखते. वे इन साक्षात्कारों में खुद पर, अपनी मां-बहन और पूरे परिवार पर नरेंद्र मोदी या भाजपा के हमलों की बात नहीं करते नजर आते हैं.

राहुल गांधी ने इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने 2012 से 2014 के दौरान गलत नीतियां अपनाईं. वे कहते हैं कि नरेंद्र मोदी भी उन्हीं गलत नीतियों को आगे बढ़ा रहे हैं. इसके जरिए भले ऊपर से ही हो पर वे यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे अपनी और कांग्रेस पार्टी की गलतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी कभी अपने इंटरव्यू में अपनी कोई गलती स्वीकार करते हुए नहीं दिखते हैं.