‘चाय की प्याली में तूफान’ एक अंग्रेजी मुहावरा है जिसका मतलब है छोटी सी बात पर बड़ा हंगामा. तकरीबन 22 साल पहले चाय की प्याली में उठे एक तूफान ने इस कदर उथल-पुथल मचाई थी कि सरकारें हिल गई थीं. हालांकि बात छोटी नहीं थी. हुआ यह था कि दूरसंचार विभाग में किसी ने हिंदुस्तान के सबसे इज्ज़तदार कॉर्पोरेट घराने टाटा संस के नामचीनों के फ़ोन टैप कर लिए थे. यह साल 1997 की बात है.

पांच, अक्टूबर 1997 की सुबह इंडियन एक्सप्रेस के फ्रंट पेज पर छपी एक ख़बर ने लोगों को चौंका दिया. इसमें टाटा संस के चेयरमैन रतन टाटा, बॉम्बे डाईंग के मुखिया नुस्ली वाडिया, फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशा और राज्यसभा सांसद जयंत मल्होत्रा के बीच हुई बातचीत का हूबहू ब्यौरा अखबार में छपा था. ख़बर करने वाली थीं चर्चित पत्रकार रीता सरीन.

एक दूसरे से बात करते हुए ये लोग तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत की असम गण परिषद (ऐजीपी) सरकार द्वारा टाटा समूह की कंपनी टाटा चाय लिमिटेड के लिए दिक्कतें पैदा करने की कोशिश का ज़िक्र कर रहे थे. साथ ही, कैसे इस समस्या से निपटा जाए, इस पर विचार करते हुए वे केंद्र सरकार के सीनियर आईएएस अधिकारियों के नाम ले रहे थे.

महंत ऐसा क्यों कर रहे थे?

बात यह थी कि 23 अगस्त, 1997 को असम के प्रतिबंधित संगठन उल्फ़ा की सांस्कृतिक सचिव प्रनेती डेका और उसके दो सहयोगियों को मुंबई के सांताक्रूज़ हवाई अड्डे पर गिरफ़्तार किया गया. खबर आई कि उनमें से एक के पास टाटा संस के एक बड़े अधिकारी का विज़िटिंग कार्ड मिला है.

पूछताछ में मालूम हुआ कि प्रनेती इलाज के लिए मुंबई आई थी जिसका पूरा ख़र्च टाटा समूह उठा रहा था. बस फिर क्या था? प्रफुल्ल कुमार महंत ने टाटा समूह पर उल्फ़ा को मदद देने और राज्य और देश को अस्थिर करने का आरोप लगाया. इस बात से दिल्ली में तो हंगामा उठ खड़ा हुआ पर असम के चाय बागानों में सन्नाटा पसर गया. इसके बाद चाय लॉबी के उल्फ़ा से गठजोड़ की बात सामने आई.

चाय लॉबी और उल्फ़ा के संबंध

उल्फ़ा आतंकवादी संगठन था जिसने असम में दहशत का माहौल पैदा कर रखा था. उल्फ़ा के लोग सरेआम चाय के बागानों में काम करने वाले अधिकारियों का अपहरण कर फ़िरौती वसूलते थे. बागानों में ज़्यादातर दूसरे राज्यों से आये अधिकारी काम करते थे. उल्फ़ा की दलील थी कि ये मैनेजर स्थानीय मज़दूरों का शोषण करते हैं. अकेले 1989 में लगभग 10 अधिकारी मार दिए गए और तकरीबन 12 का अपहरण किया गया जिन्हें छुड़ाने के लिए कंपनियों को मोटी फ़िरौती देनी पड़ी.

क्या उल्फ़ा और टाटा में संबध थे?

ताज्जुब की बात यह है कि ख़ुद उल्फ़ा ने टाटा से किसी भी प्रकार के संबंध की बात नकार दी. उसके स्वयंभू कमांडर परेश बरुआ ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उल्फ़ा ने टाटा के अधिकारियों से संपर्क करके संगठन को मदद देने का दबाव ज़रूर बनाया पर टाटा समूह ने साफ़ इंकार कर दिया. टाटा समूह अपनी नीति के तहत किसी अतिवादी संगठन की मदद के बजाय असमिया समाज की सहायता करने के लिए ज़्यादा इच्छुक था. इसी के चलते उसने असमिया लोगों को मेडिकल सुविधा प्रदान करने के लिए एक ट्रस्ट बनाया था जिसके तहत प्रनेती डेका का मुंबई में इलाज हुआ था.

फिर महंत ने इल्ज़ाम क्यों लगाया?

प्रफ़ुल्ल कुमार महंत असम के दो बार मुख्यमंत्री रहे थे. बताया जाता है कि 1985 के विधानसभा के चुनावों के सिलसिले में वे एक बार कोलकाता में ताकतवर टी लॉबी से मिले थे और उससे फंडिंग मांगी थी. उन दिनों असम में कानून-व्यवस्था ख़स्ताहाल थी. टी लॉबी ने उनके प्रस्ताव में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, टाटा समूह ने तो साफ़ इंकार कर दिया कि वह राजनीतिक फंडिंग नहीं करता. शायद महंत को यह बात चुभ गई. वे चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन गए पर टाटा के प्रति गिरह उनके मन में बनी रही.

असम सरकार का गिरना

प्रफुल्ल कुमार महंत के कार्यकाल में उल्फ़ा की गतिविधियों में कोई कमी नहीं आई. आए दिन धमकियों के सिलसिले से चाय बागानों के मालिक परेशान हो गए. बताते हैं कि 1990 में असम के डिब्रूगढ़ जिले के एक चाय बागान में टी एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया और उल्फ़ा के बीच मीटिंग हुई थी. इसमें उल्फ़ा ने खुले तौर पर प्रति किलोग्राम चाय के उत्पादन पर एक रुपये की फ़िरौती मांगी. उन दिनों राज्य में 3.5 करोड़ किलो चाय का उत्पादन होता था.

एक रुपये प्रति किलो उल्फा को देने के बाद भी उद्योगपतियों के लिए यह फ़ायदे का सौदा था. पर हिंदुस्तान यूनिलीवर जैसी कुछ कंपनियों ने उल्फ़ा के दबाव के आगे झुकने के बजाए काम बंद करना उचित समझा. जब उसकी सहायक इकाई डूमडूमा इंडिया के कर्मचारियों को धमकी भरे संदेश मिलने लगे तो उसने रातों-रात अपने अधिकारियों को एयरलिफ्ट करके मुंबई बुला लिया. असम में चाय का व्यवसाय राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है. इस घटना के बाद प्रफुल्ल कुमार महंत की सरकार पर ज़बर्दस्त दबाव बन गया और केंद्र ने उसे बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया.

1997 में जब प्रफुल्ल कुमार महंत दोबारा मुख्यमंत्री बने तो उल्फ़ा का आतंक अपने चरम पर था. इस संगठन ने उन पर जानलेवा हमला किया जिसमें वे बाल-बाल बच गए थे. तब महंत ने उल्फ़ा को नेस्तनाबूद करने की ठान ली थी. इसी दौरान प्रनेती डेका की गिरफ़्तारी हो गई.

असम में टाटा समूह की दिक्कतें

उधर, प्रनेती डेका पकड़ी गई और इधर, असम में पुलिस ने टाटा टी लिमिटेड के जनरल मैनेजर एसएस डोगरा को गिरफ़्तार कर लिया. साथ ही, उसके मैनेजिंग डायरेक्टर आरके कृष्ण कुमार और रीजनल मैनेजर बोलिन बोरदोलोई के खिलाफ गिरफ़्तारी वारंट जारी कर दिया गया. बोलिन बोरदोलोई पर इलज़ाम लगा कि वे प्रनेती डेका को अपने साथ असम से मुंबई लाये थे.

टाटा समूह के लिए यह बड़ी चिंता की बात थी. समूह अपने कर्मचारियों का विशेष ध्यान रखने के लिए जाना जाता है. चेयरमैन रतन टाटा ने डोगरा की रिहाई और कृष्ण कुमार तथा बोरदोलोई की अग्रिम जमानत लेने के लिए राम जेठमलानी और अरुण जेटली को अपना वकील चुना. बताते हैं कि इसी कोशिश में रतन टाटा ने नुस्ली वाडिया और मानेकशा की मदद लेकर अपने पक्ष में लॉबीइंग करने को कहा और यही बातचीत टैप की गई थी.

उद्योग जगत हिल गया

इस घटना ने उद्योग जगत को हिला दिया. कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल को पत्र लिखा. इस वाकये को कॉर्पोरेट जगत की निजता के हनन के तौर पर देखा गया. टाटा समूह चाहता था कि केंद्र असम सरकार से बातचीत कर उसे इस समस्या से बाहर निकाले.

क्या महंत ग़लत थे?

देखा जाए तो नहीं. हो सकता है कि उनके मन में चाय उद्योग के प्रति खटास रही हो. पर यह भी उतना ही सच है कि उल्फ़ा को बाहर और भीतर दोनों तरफ़ से मदद मिल रही थी. अगर उल्फ़ा का आतंक ख़त्म करना था तो उसे मिलने वाली हर तरह की मदद को बंद करना ज़रूरी था.

आखिर में क्या हुआ?

टाटा के सभी अधिकारियों को जमानत मिल गई. मामला रफ़ा-दफ़ा हो गया. उसी साल यूनाइटेड फ्रंट की सरकार गिर गई. महंत ने चाय उद्योग संगठन से सुलह कर ली पर 1998 में हुए चुनाव में वे हार गए. पर आज तक यह मालूम नहीं चल सका कि जिसने फ़ोन टैप किये थे वह कौन था और किसके इशारे पर ऐसा कर रहा था. राज्यसभा सांसद जयंत मल्होत्रा ने तत्कालीन संचार मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को पत्र लिखकर फ़ोन टैपिंग में लिप्त लोगों के बारे में मालूम करने को कहा था. केंद्र सरकार ने तुरंत वक्तव्य जारी कर किसी भी केंद्रीय संस्था या महाराष्ट्र सरकार के हाथ होने की बात नकार दी.