इस लोकसभा चुनाव में राजस्थान की जिन सीटों पर राजनीतिकारों की नज़रें टिकी हैं, जयपुर ग्रामीण उनमें से प्रमुख है. यहां से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ पर भरोसा जताया है तो कांग्रेस ने अपनी विधायक कृष्णा पूनिया पर दांव खेला है. इन दोनों प्रत्याशियों की शक़्ल में यहां प्रदेश के तकरीबन सभी संभावित राजनैतिक द्वंद महसूस किए जा सकते हैं, मसलन - राजपूत बनाम जाट, सवर्ण बनाम ओबीसी, पुरुष बनाम महिला, जातिगत अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक और सैन्य राष्ट्रवाद बनाम कृषि आधारित राष्ट्रवाद.

इन सभी विषमताओं के बावजूद राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और कृष्णा पूनिया में कुछ समानताएं भी हैं. ये दोनों ही अंतरराष्ट्रीय खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करने के साथ पदक भी जीत चुके हैं. इसके अलावा इन दोनों ने राजनीति में भी एक ही साथ यानी वर्ष 2013 में कदम रखा था.

इनमें से यदि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की बात करें तो वे सिर्फ़ एक सांसद के तौर पर चुनाव नहीं लड़ रहे. प्रदेश के राजनीतिकारों का एक वर्ग उनमें भविष्य का मुख्यमंत्री भी देखता है. यही कारण है कि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खेमे को राठौड़, प्रदेश से आने वाले एक और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की ही तरह कुछ खास नहीं सुहाते हैं.

इस सीट पर राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का यह दूसरा चुनाव है. 2014 के चुनाव में उन्होंने यहां से प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता सीपी जोशी को पटखनी दी थी. कहने वाली बात नहीं कि पिछली बार की तरह इस बार भी राठौड़ ने अपने प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम को जमकर भुनाने की कोशिश की है. साथ ही देशभर के अन्य भाजपा नेताओं की तरह उन्होंने अपने संबोधनों में फौज़ और राष्ट्रवाद का भी खूब सहारा लिया है. सेना में कर्नल रह चुके होने की वजह से राठौड़ की इन बातों का मतदाताओं पर खासा प्रभाव भी होता दिखा है.

अब बात कृष्णा पूनिया की. वे राजस्थान के ही चुरु जिले से विधायक हैं. अपने पूरे प्रचार में वे बार-बार स्थानीय मुद्दों की की बात करती दिखीं. इशारों-इशारों में उन्होंने लोगों को इस बात का भी ख़ूब अहसास करवाया है कि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ एक सभ्रांत वर्ग से आते हैं, जबकि वे जमीन से जुड़ी रही हैं. जैसे एक जनसभा में उनका कहना था, ‘उन्होंने (राठौड़ ने) बंद एसी हॉल में अपने खेल का अभ्यास किया और मैंने कड़ी धूप में.’ इसके अलावा कृष्णा पूनिया ने कांग्रेस की न्यूनतम आय योजना का भी बार-बार ज़िक्र कर मतदाताओं को जमकर लुभाने की कोशिश की है.

जयपुर ग्रामीण लोकसभा क्षेत्र में जो बात पूनिया के पक्ष में सर्वाधिक जाती है वह है यहां के जातिगत समीकरण. जयपुर ग्रामीण क्षेत्र के करीब 19.50 लाख मतदाताओं में से तकरीबन 2.75 लाख जाट, 2.5 लाख ब्राह्मण, 2.5 लाख एससी, 1.70 लाख गुर्जर, 1.70 लाख मीणा, 1.50 लाख यादव, 1.10 लाख माली और 75 हजार राजपूतों की तादाद मानी जाती है. विश्लेषकों की मानें तो कृष्णा पूनिया की वजह से इस बार क्षेत्र के अधिकतर जाट वोट कांग्रेस के खाते में जाएंगे. वहीं, दलित और मुस्लिमों को भी कांग्रेस का ही वोटबैंक माना जा रहा है. जबकि यहां के ब्राह्मण मतदाता बंटे हुए दिखते हैं.

स्थानीय जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो काफ़ी हद तक अपने माली समुदाय को खींच पाने में सफल हो जाएंगे, लेकिन सचिन पायलट को मुख्यमंत्री न बनाए जाने की वजह से गुर्जर तबके में कांग्रेस के प्रति नाराज़गी महसूस की जा सकती है. विशेषज्ञों के मुताबिक इस सीट पर यादव, गुर्जर और मीणा मत निर्णायक साबित होने वाले हैं. हालांकि इसकी काट के तौर पर यह तर्क़ दिया जा सकता है कि राजस्थान में राजपूत प्रत्याशियों के मैदान में होने की वजह से अक्सर जातिगत समीकरण विफल हो जाते हैं.

दोनों प्रत्याशियों की तुलनात्मक चर्चा करने पर वरिष्ठ पत्रकार अवधेश आकोदिया बताते हैं, ‘2014 में लोगों को राज्यवर्धन सिंह से सिर्फ़ उम्मीदें थीं, शिकायतें नहीं. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. मोदी फैक्टर चल तो रहा है, लेकिन उतना प्रभावी नहीं है. राठौड़ क्षेत्र की उन बड़ी समस्याओं को नहीं सुधार पाए जिसके वायदे उन्होंने पिछली बार किए थे. फिर चाहे जयपुर-दिल्ली राजमार्ग हो या जमुवारामगढ़ का बांध और अभ्यारण्य.’ अकोदिया आगे जोड़ते हैं, ‘राठौड़ को ये बात भी परेशान कर सकती है कि कुछ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में क्षेत्र की आठों विधानसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है. जबकि पूनिया सत्ताधारी दल की विधायक होने की वजह से हार के दबाव से मुक्त होकर चुनाव लड़ रही हैं.’

वहीं, क्षेत्र की राजनीति पर नज़र रखने वाले हरीश शर्मा गठवाड़ी बताते हैं कि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने यहां हर विधानसभा में आठ-दस लोगों को अपने प्रतिनिधि के तौर पर नियुक्त किया था. लेकिन उन सभी ने इसका ग़लत फ़ायदा उठाया और अपनी कार्य और व्यवहार शैली से लोगों को जमकर नाराज़ कर दिया. इस बात के लिए कई मतदाताओं ने तो प्रचार के दौरान ही राठौड़ को सरेआम आड़े हाथों भी लिया है.

इस सीट से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि वोटिंग वाले दिन यानी छह मई को आखातीज भी है. राजस्थान में आखातीज को शादियों के लिए सबसे शुभ माना जाता है. इसलिए प्रदेश के ग्रामीण अंचल में इस दिन बेहिसाब शादियां होती हैं. इस बारे में गठवाड़ी कहते हैं, ‘पूनिया के जीतने की संभावना सिर्फ़ तभी बनती है जब मतदान प्रतिशत ज्यादा होगा. ऐसे में उनकी टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने समर्थकों के शादियों में जाने से पहले ही उनसे वोट डलवा लेने की है.’ उनके शब्दों में ‘पूनिया क्षेत्र की आधी आबादी यानी महिलाओं को ख़ुद से जोड़ पाने में सफल होती दिखी हैं. लेकिन शादी-ब्याह में महिलाएं दो-चार दिन पहले ही नाते-रिश्तेदारी में चली जाती हैं. पूनिया को यह बात बड़ा नुकसान दे सकती है. नतीजतन यह चुनाव इस बात पर भी आ टिका है लोग पहले शादियों में जाना चुनेंगे या फिर वोट डालना.’