लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण में आज सात राज्यों की 51 लोकसभा सीटों पर मतदान हो रहा है. इनमें सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की 14 सीटें शामिल हैं. इन्हीं में से एक हाई प्रोफाइल सीट है लखनऊ जहां से भाजपा के वरिष्ठ नेता और गृह मंत्री राजनाथ सिंह मैदान में हैं.

लखनऊ का लंबे समय से भाजपा से अटूट नाता रहा है. अटल बिहारी वाजपेयी का यहां से गजब की आत्मीयता का रिश्ता था. 1991 में लखनऊ से पहली बार सांसद चुने जाने से भी बहुत पहले से लखनऊ उनके पसंदीदा अड्डों में शुमार होता था. 1991में दसवीं लोकसभा के सांसद बनने के बाद से तो वे लखनऊ के ही होकर रह गए. 1996 ,1998 ,1999 और 2004 में वे लगातार अपने प्रतिस्पर्धियों को करारी मात देते रहे . 2004 के चुनावों में उन्हें कुल 4 ,94 ,428 वोट मिले थे जबकि उनके निकटतम प्रतिस्पर्धी समाजवादी पार्टी के राजबब्बर को 1,63,127और बसपा के सतीश मिश्रा को महज 31,610 वोट ही मिल पाए थे. कांग्रेस के समर्थन से निर्दलीय लड़े राम जेठमलानी भी सिर्फ 51,610 वोट ही हासिल कर पाए.

एक सांसद के तौर पर भी और प्रधानमंत्री के तौर पर भी अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ के हर सुख दुःख में साझी रहे. बदले में लखनऊ की जनता ने भी उन्हें उतना ही प्यार और सम्मान दिया. यही वजह रही कि जब 2009 में ख़राब स्वास्थ्य के कारण अटल ने चुनाव नहीं लड़ा और वहां से भाजपा ने लाल जी टंडन को चुनाव लड़ने का अवसर दिया गया तो लखनऊ की जनता ने अटल बिहारी वाजपेयी के उत्तराधिकारी के तौर उनको भी सर आंखों पर बिठाया. टंडन के बाद 2014 में भाजपा ने राजनाथ सिंह को मैदान में उतारा और उन्होंने भी अटल के नाम पर आसानी से चुनाव जीत लिया.

इस बार राजनाथ सिंह फिर लखनऊ से चुनाव लड़ रहे हैं. पिछली बार जब वे चुनाव मैदान में थे तब वे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष की हैसियत से लड़ाई लड़ रहे थे. इस बार उनके साथ लखनऊ के सांसद और देश के गृह मंत्री का तमगा भी जुड़ चुका है. पिछली बार उन्होंने अपने निकटतम प्रतिस्पर्धी को 2,72,749 वोटों के अंतर से हराया था. जीत का यह अंतर अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा लखनऊ में जीते गए सभी चुनावों से अधिक था. वाजपेयी सबसे कम 1,17,303 मतों के अंतर से 1991 का चुनाव जीते थे और 2004 में उनकी जीत का अंतर सर्वाधिक 2,18,375 वोटों का रहा था. 2009 में अटल के स्थान पर लड़े लाल जी टंडन को तो महज 40,901 मतों से ही जीत मिल पायी थी. केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी दूसरे नंबर पर रहीं थीं. तब भी टंडन की जीत की सबसे बड़ी वजह अटल फैक्टर ही रहा था और यही कारण 2014 में राजनाथ सिंह की जीत के पीछे भी रहा.

हालांकि इस बार के चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी सशरीर मौजूद नहीं हैं. लेकिन केंद्र सरकार की सफलताओं और जन कल्याण योजनाओं के तमाम दावों के बावजूद राजनाथ सिंह उनकी विरासत और उनके नाम को किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं चाहते. इसीलिए अपने नामांकन के दिन भी वे लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी के सांसद प्रतिनिधि और उनके सबसे करीबी सहयोगी शिव कुमार को अपने साथ रखना नहीं भूले.

वैसे लखनऊ सीट पर सपा-बसपा गठबंधन की और से पूनम सिन्हा और कांग्रेस की ओर से प्रमोद कृष्णम राजनाथ के साथ मुख्य मुकाबले में हैं लेकिन दोनों ही उम्मीदवार अलग अलग वजहों से राजनाथ की राह आसान बनाते दिख रहे हैं. पूनम सिन्हा को वॉलीवुड से अपने रिश्तों और अपने पति शत्रुघ्न सिन्हा की लम्बी जुबान के कारण चर्चा तो खूब मिल रही है लेकिन यही चर्चा उनकी दावेदारी को कमजोर भी करती जा रही है.

मामला शत्रुघ्न सिन्हा के कारण बिगड़ा. भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने के बाद पटना साहिब से चुनाव लड़ रहे शत्रुघ्न सिन्हा जिस तरह लखनऊ में पार्टी लाइन को छोड़ कर अपनी पत्नी और गठबंधन उम्मीदवार पूनम सिन्हा के नामांकन और रोड शो में जिस जोश से शामिल हुए उससे कांग्रेस संगठन सकते में है. नामांकन के दौरान शत्रु जिला निर्वाचन कार्यालय के जिस कमरे में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे उसी कमरे में कांग्रेस उम्मीदवार प्रमोद कृष्णम भी मौजूद थे. लेकिन शत्रु ने उनसे औपचारिक दुआ-सलाम तक नहीं की. रोड शो के दौरान भी वे अखिलेश यादव के साथ लखनऊ की सड़कों पर हाथ हिलाते रहे लेकिन न तो वे लखनऊ में कांग्रेस दफ्तर गए और न ही उन्होंने प्रमोद कृष्णम से किसी प्रकार का संपर्क ही किया. जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि मेरे लिए पत्नी धर्म पहले है और पार्टी धर्म बाद में.

जाहिर है लखनऊ में कांग्रेस के नेता शत्रु के रवैये से परेशान हैं और कांग्रेस के उम्मीदवार प्रमोद कृष्णम बेहद हताश. लेकिन शत्रु कहते हैं कि उन्होंने इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँंधी से बात कर ली थी. हालांकि लखनऊ में कांग्रेस की ख़ामोशी के बावजूद शत्रु को पटना में अपने इस रवैये के कारण पार्टी कार्यालय जाने पर तीखा विरोध भी सहना पड़ा है लेकिन इस प्रकरण में कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी के कारण प्रमोद कृष्णम के साथ खड़े कांग्रेसियों की स्थिति बहुत असमंजस में पड़ गयी है.

राहुल गांधी के इस बयान के बाद कि ‘हमने प्रियंका से कहा है कि यूपी में जहां भी कांग्रेस का उम्मीदवार कमजोर हो वहां एसपी-बीएसपी उम्मीदवारों को नुकसान नहीं होना चाहिए’, कांग्रेसी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि लखनऊ के कांग्रेस उम्मीदवार को मजबूत समझा जाए या कमजोर. अगर प्रमोद कृष्णम कमजोर उम्मीदवार हैं और इसीलिए शत्रुघ्न सिन्हा का गठबंधन प्रत्याशी के पक्ष में खुल कर उतरना कांग्रेस नेतृत्व को अखर नहीं रहा है तो फिर ऐसे कमजोर बाहरी उम्मीदवार के बजाय विधानसभा चुनाव की तैयारी को ध्यान में रख कर किसी नेता को ही टिकट दे दिया जाना चाहिए था. कम से कम एक स्थानीय कांग्रेस नेता की पहचान तो बन जाती.

बहरहाल शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने ही खास अंदाज में लखनऊ चुनाव में अपनी एंट्री तो मार ली है लेकिन उनका अंदाज लखनवी अंदाज से मेल नहीं खा पा रहा है. नवजोत सिंह सिद्धू ने जिस तरह पहले नरेंद्र मोदी और बीजेपी की शान में कसीदे पढ़े थे और फिर कांग्रेस में शामिल होते समय ठीक वही कसीदे सोनिया गांधी और कांग्रेस की शान में दोहरा डाले थे ,एकदम उसी तरह शत्रुघ्न सिन्हा ने भी कांग्रेस में आते समय राहुल गांधी को भारत का भविष्य और प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वाधिक योग्य नेता घोषित कर दिया था. फिर ठीक उसी तरह अपनी पत्नी के चुनाव प्रचार के सिलसिले में उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को विकास पुरुष ,प्रधान मंत्री मैटीरिएल और भारत का भविष्य घोषित करने में जरा भी संकोच नहीं किया. अब शत्रु की कौन सी बात सच मानी जाय और किस बात को उनका ‘डायलॉग ‘ इसे समझ पाने में कांग्रेस समर्थक भी उतनी ही असमंजस में हैं जितनी असमंजस में गठबंधन के समर्थक.

शत्रुघ्न सिन्हा की इस हरकत से समाजवादियों में भी बेचैनी है और कांग्रेसियों में भी. प्रमोद कृष्णम मध्य प्रदेश में अपना रुतबा ज़माने के बाद बड़े अरमानों से लखनऊ की राजनीति में पैर ज़माने पहुंचे थे. मगर यहां का हाल देख कर वे भी हैरान हैं. उन्होंने शत्रु से व्यक्तिगत स्तर पर अनुरोध भी किया कि वे पत्नी के बजाय पार्टी को प्राथमिकता दें लेकिन बिहारी बाबू पर इसका भी कोई असर नहीं हुआ.अब तो हालत ऐसी हो गई है कि कांग्रस के नेता प्रमोद कृष्णम के साथ खड़े होने में भी संकोच करने लगे हैं. इस स्थिति का खामियाजा कांग्रेस और गठबंधन दोनों को भुगतना पड़ रहा है और इसने राजनाथ का चुनाव थोड़ा आसान बना दिया है.