प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले करीब डेढ़ महीने में पांच टेलीविजन चैनलों को इंटरव्यू दिया. इनमें से चार की रेटिंग्स आ चुकी हैं. ये रेटिंग्स उम्मीद से काफी कम हैं. मोदी के 2014 के साक्षात्कारों की रेटिंग्स से तुलना करें तो दोनों में ज़मीन-आसमान का फर्क दिखता है.

कम रेटिंग्स भाजपा के अंदर खलबली मचाने के लिए काफी हैं. क्योंकि यह भी एक ऐसा पैमाना है जिससे जनता के मिजाज का अंदाज़ा लगता है. टेलीविजन रेटिंग पर रिसर्च करने वालों की मानें तो चुनाव के वक्त हर पार्टी की नजर नेताओं के इंटरव्यू की रेटिंग्स पर रहती है. इससे उन्हें किसी नेता के बारे में जनता की उत्सुकता और उसकी लोकप्रियता का अंदाजा मिल जाता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना एक इंटरव्यू अपने लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में भी दिया. यहां काफी वक्त निकालकर एक अलग तरीके का प्रयोग किया गया. इसमें ‘आज तक’ के तीन एंकर कभी चाय की चर्चा करते दिखे तो कभी गंगा नदी पर क्रूज के अंदर प्रधानमंत्री से बात करते नजर आए. लेकिन खुद चैनल के विज्ञापन में कहा गया कि इसकी रेटिंग सिर्फ 27 फीसदी ही आई.

अगर किसी छोटे चैनल पर इतनी रेटिंग आती तो कोई बात नहीं थी. लेकिन रेटिंग में लगातार नंबर वन बने रहन वाले चैनल पर जब प्रधानमंत्री के साक्षात्कार की रेटिंग का आंकड़ा 40 तक भी न पहुंच पाए तो भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का चिंतित होना लाजमी है. भाजपा के मीडिया प्रबंधन से जुड़े एक प्रभावशाली सूत्र बताते हैं कि इस रेटिंग की जब बारीकी से जांच हुई तो तथ्य थोड़े और चिंताजनक लग रहे थे. इसके मुताबिक शहरी इलाकों में प्रधानमंत्री का इंटरव्यू ज्यादा देखा गया और यहां के टॉप बीस कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री का इंटरव्यू तीसरे नंबर पर रहा. लेकिन ग्रामीण इलाकों में प्रधानमंत्री का इंटरव्यू टॉप 20 कार्यक्रमों में भी शुमार नहीं हो पाया.

टेलीविजन की रेटिंग को समझने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि इससे इतना तो साफ है कि ग्रामीण दर्शकों ने नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू को बहुत कम देखा. शहर के वोटर तो हमेशा से भाजपा के वोट बैंक माने जाते हैं लेकिन गांव के वोटर तो पिछले कुछ समय से ही भाजपा से जुड़ते देखे गये हैं.

जिस चैनल पर यह इंटरव्यू चला उसी चैनल के एक प्रमुख पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि जिस अंदाज़ में इस इंटरव्यू की तैयारी की गई थी उसकी तुलना में इसकी रेटिंग कुछ भी नहीं थी. इंटरव्यू के लिए दिल्ली से चैनल की एक पूरी फौज वाराणसी भेजी गई थी. इंटरव्यू को भव्य बनाने के लिए वहां कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी गई. जब इंटरव्यू चलने वाला था तो प्रमोशन के तौर पर टैगलाइन दी गई - अद्भुत, अविश्वसनीय और अकल्पनीय, लेकिन रेटिंग अविश्वसनीय और अकल्पनीय नहीं आई.

इस इंटरव्यू की तुलना अगर नरेंद्र मोदी के 2014 के एक इंटरव्यू से करें तो फर्क साफ दिखता है. इस बार नंबर वन चैनल पर मोदी के इंटरव्यू की रेटिंग सिर्फ 27 फीसदी आई, जबकि 2014 में उस वक्त के नंबर दो चैनल पर चले इंटरव्यू की रेटिंग 55 फीसदी आई थी.

इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना सबसे पहला इंटरव्यू अंग्रेजी पत्रकार और रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी को उनके हिंदी चैनल - रिपब्लिक भारत - के लिए दिया था. मीडिया के सूत्र बताते हैं कि चैनल को लग रहा था कि प्रधानमंत्री के इंटरव्यू की बदौलत वह नंबर तीन से सीधे नंबर एक पर पहुंच जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

इसके बाद अगला इंटरव्यू एक हिंदी चैनल को दिया गया. इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक की जगह दो पत्रकार सवाल पूछे रहे थे. इंटरव्यू को प्रमोट करने के लिए देश के प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर चैनल की तरफ से विज्ञापन भी छापा गया. लेकिन चैनल को सिर्फ 17 फीसदी रेटिंग से ही संतोष करना पड़ा.

तीसरी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू देश के सबसे बड़े न्यूज़ नेटवर्क का दावा करने वाली मीडिया कंपनी को मिला. देश भर में इसके होर्डिंग लगाए गये. लेकिन इस नेटवर्क का नेशनल चैनल नंबर तीन तक भी नहीं पहुंच पाया. डीडी न्यूज़ से लेकर राज्यसभा टीवी को दिए उनके इंटरव्यू की भी कोई बहुत खास रेटिंग नहीं आ सकी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साक्षात्कार अभिनेता अक्षय कुमार को भी दिया. इस इंटरव्यू के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है. सुनी-सुनाई है कि इसे रिकॉर्ड करने में देश के एक बड़े न्यूज़ चैनल की तकनीकी टीम ने मदद की थी और यह बात इसलिए पक्की हो गई क्योंकि इस टीम के साथ अक्षय कुमार और प्रधानमंत्री ने तस्वीर भी खिंचवाई थी. इसे उन्होंने फेसबुक और सोशल मीडिया पर डाल दिया जिससे यह बात गुप्त नहीं रह पाई. इस साक्षात्कार को न्यूज़ एजेंसी के जरिए जारी किया गया, इसलिए हर छोटे-बड़े चैनल ने इसे चलाया. इस वजह से इस साक्षात्कार को पैमाना बनाना मुश्किल होगा.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ नरेंद्र मोदी की रेटिंग कम आ रही है और बाकी नेताओं की ज्यादा. राहुल गांधी ने चुनाव के आखिर में टीवी इंटरव्यू देना शुरू किया है और वे अब भी पंद्रह मिनट से ज्यादा लंबा इंटरव्यू नहीं दे रहे हैं. लेकिन उनकी टीम ने जिन चैनलों को इसके लिए चुना उनकी अपनी रेटिंग ही बहुत कम है. इसलिए राहुल की टीम को भी इनकी बहुत ज्यादा रेटिंग की उम्मीद नहीं होगी.