इन दिनों एक ही विचार से उपजी दो बातें लगातार सुनने को मिल रही हैं. सत्ताधारी पार्टी के प्रचार-प्रसार का हिस्सा बन चुकी ये राजनीतिक तहरीरें हिंदुस्तानी जनता से कहना चाह रही हैं कि ‘मोदी का कोई विकल्प नहीं है’ और इस देश को ‘मजबूर नहीं मजबूत सरकार चाहिए’. मजबूर यानी कांग्रेस और गठबंधन. मजबूत यानी पिछले पांच साल से सत्ता संभालने वाली भाजपा, उर्फ मोदी सरकार.

इस सवाल का जवाब 23 मई को ही मिलेगा कि भाजपा केवल अपने दमखम पर पूर्ण बहुमत वाली मजबूत सरकार बना पाएगी या फिर वह भी नयी-पुरानी सहयोगी पार्टियों की मदद के साथ सरकार बनाने को मजबूर होगी. तभी इस बारे में भी तस्वीर साफ होगी कि वोटरों ने वाकई में इस तहरीर पर यकीन करके वोट दिया है कि ‘मोदी का कोई विकल्प नहीं है’. या फिर उनका लोकतंत्र में विश्वास अडिग था और वे हमेशा से जानते रहे हैं कि भारतीय राजनीति में विकल्पों की कमी कभी नहीं रही. लोकतंत्र कभी केवल एक चेहरे के भरोसे चलने वाली चीज नहीं रही बल्कि एक पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली होती है जो देश चलाती है. इसीलिए, नरेंद्र मोदी की जगह 2019 में उन्होंने दूसरे विकल्पों पर भी गौर किया.

लेकिन, लोकसभा चुनाव 2019 के ये परिणाम आने से पहले भी इस बात पर चर्चा करना बेहद जरूरी है कि क्या सच में मौजूदा भारतीय राजनीति के पास नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है?

कहा जाता है कि हर समकालीन गुत्थी का जवाब इतिहास में छिपा होता है. 69 साल पुराना हमारा भारतीय संविधान और लोकतंत्र भी इतना परिपक्व अपने पुराने अनुभवों से ही हुआ है और इसलिए राजनीतिक जानकार हर नए दौर में खड़े होने वाले सवालों के जवाब इतिहास में तलाशने की कोशिश करते हैं. आजाद भारत की राजनीति का यही संपूर्ण इतिहास जानने के बाद ‘अगर मोदी नहीं तो कौन?’ और ‘मोदी का कोई विकल्प नहीं है’ जैसी बातें बचकानी लगने लगती हैं.

लेकिन, इस इतिहास की तरफ लौटने से पहले हमें यह महत्वपूर्ण बात अच्छे से समझनी होगी कि हिंदुस्तान का लोकतंत्र अपने संघीय ढांचे की वजह से ही अभी तक मजबूत बना हुआ है. इस फेडरल स्ट्रक्चर में सत्ता का विकेंद्रीकरण ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है. अगर ये व्यक्तिवादी हो जाए, चुनाव सिर्फ एक चेहरे के भरोसे लड़े और जीते जाने लगें, और ताकत केवल एक-दो चुनिंदा लोगों के हाथों में सिमटकर केंद्रीकृत हो जाए तो ऐसे वक्त में लोकतंत्र की ताकत खत्म होने लगती है. सिर्फ एक चेहरे के आधार पर चुनाव लड़ने वाला लोकतंत्र मजबूत सरकारों के नाम पर ‘कल्ट’ बनाने के अलावा अक्सर तानाशाहों को जन्म देता है, और विश्व-इतिहास में ऐसा होते हुए हम कई बार देख चुके हैं.

तानाशाही वाया लोकतंत्र

अडॉल्फ हिटलर ने लोकतांत्रिक तरीकों से चुनाव जीतने के बाद ही जर्मनी के तानाशाह का रूप धरा था. जिम्बाब्वे पर 37 साल तक राज करने वाले राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे (95) पहली बार सत्ता में 1980 का ऐतिहासिक लोकतांत्रिक चुनाव जीतने के बाद ही आए थे. लेकिन आगे चलकर वे काफी लंबे समय तक लोकतांत्रिक चुनावों को कंट्रोल करके एक और अफ्रीकी तानाशाह बन गए. तुर्की के मौजूदा राष्ट्रपति अर्दोआन पिछले 16 सालों से लोकतांत्रिक चुनावों का ही इस्तेमाल कर सत्ता पर काबिज हैं और सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपने कब्जे में ले लेने के चलते उनकी लगातार आलोचनाएं हो रही हैं. सिंगापुर का कायाकल्प कर देने वाले राष्ट्रपति स्वर्गीय ली कुआन यू ने भी लोकतांत्रिक चुनाव जीतकर ही पहली बार सत्ता संभाली थी लेकिन ‘परोपकारी तानाशाह’ (Benevolent Dictator) कहे जाने वाले ली ने 31 सालों तक सिंगापुर पर लगातार राज किया और अपने खिलाफ किसी भी तरह के विद्रोह और विपक्ष को पनपने नहीं दिया.

इनके अलावा मौजूदा दौर का रूस हो, युगांडा हो या फिलीपींस, दुनिया भर में कई तानाशाह जैसे शासकों ने लोकतंत्र के सहारे ही डिक्टेटरशिप को मान्यता दी हुई है. समय-समय पर दुनिया के कई देशों में व्यक्तिवादी राजनीति हावी रही है और तानाशाही वाया लोकतंत्र सुचारू रूप से चलायमान रही है.

यूनान के मशहूर दार्शनिक प्लेटो ने अपने वक्त (428 ईसा पूर्व – 347 ईसा पूर्व) में कहा था कि बाकी दूसरी व्यवस्थाओं की बनिस्बत लोकतंत्र का तानाशाही में तब्दील हो जाना ज्यादा आसान होता है. उपरोक्त उदाहरणों से क्या उनका यह दर्शन सही साबित नहीं होता? माना कि इस थ्योरी तक पहुंचने के प्लेटो के तर्क अलग थे और यूनान के उस वक्त के लोकतंत्र से खफा होने की वजह से अपने वक्त की पैदाइश ज्यादा थे. लेकिन आधुनिक दुनिया में प्लेटो की बातों के सिरे डोनाल्ड ट्रंप से भी जोड़े गए हैं और ये हर उस लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़ सकते हैं जहां विकेंद्रीकरण के बुनियादी उसूलों का पालन नहीं किया जाता, और ‘कल्ट’ खड़ा करने वाली व्यक्तिवादी राजनीति नागरिकों तक के सर चढ़कर बोलने लगती है.

इन्हीं वजहों के चलते, यह तहरीर अपने आप में ही हर पावन लोकतंत्र का अपमान है - और खतरे की घंटी भी - कि किसी एक कद्दावर नेता का विकल्प उस मुल्क की राजनीति के पास मौजूद नहीं है. 130 करोड़ लोगों का देश जो 543 सासंदों को लोकसभा भेजता है, क्या सच में इतना विकल्पहीन हो सकता है?

जहां तक विकल्पों की बात है, तो भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि भिन्न-विभिन्न चुनावों में व्यक्तिवादी राजनीति को तवज्जो देने न देने के बावजूद कई बार ऐसे चेहरे प्रधानमंत्री बने हैं जिनके बनने की उम्मीद किसी को नहीं थी. कई तो विकल्प तक नहीं थे. लेकिन शुरुआत में कमजोर माने जाने वाले इन प्रधानमंत्रियों ने अपना कार्यकाल भी पूरा किया था और ‘मजबूत’ सरकार देकर ‘विकास’ की संभावनाओं को भी आगे बढ़ाया था.

पुराने उदाहरण जो मोदी का विकल्प नहीं नामक डिस्कोर्स को आईना दिखाते हैं

दक्षिणपंथी राजनीति का एक धड़ा इन दिनों जिस कांग्रेसी प्रधानमंत्री को ‘राष्ट्रवादी’ बताकर उन पर सरदार पटेल की तरह अपना ‘क्लेम’ करना चाहता है, वे लाल बहादुर शास्त्री भी हिंदुस्तान के दूसरे प्रधानमंत्री बनने के लिए विकल्प नहीं थे. तकरीबन 17 साल तक प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद जब जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई तो उनकी खाली जगह को भरने के लिए किसी कद्दावर नेता की जरूरत थी. शास्त्री जी ठहरे पांच फुट के पतले-दुबले संयमित बोल बोलने वाले नेता जिनकी छवि नेहरू की बराबरी नहीं कर सकती थी.

उस वक्त प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई को माना जा रहा था, जिन्हें कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलजारीलाल नंदा का भी समर्थन प्राप्त था. लेकिन कांग्रेस का एक धड़ा मोरारजी की व्यक्तिगत दक्षिणपंथी झुकाव वाली राजनीति को पसंद नहीं करता था. इसलिए के कामराज नाम के कांग्रेसी नेता ने शास्त्रीजी के नाम पर सहमति बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था. कहा जाता है कि शास्त्रीजी का नाम आगे बढ़ाने के पीछे कामराज की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा भी थी कि ऐसा करने पर सरकार पर उनका नियंत्रण रहेगा और भोले-भाले शास्त्रीजी पर वे हावी रह पाएंगे. इस तरह हिंदुस्तान को उसका पहला ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ मिला था.

इसके बाद का इतिहास सभी को पता है. शास्त्रीजी ने सभी कयासों को धता बताकर कैसे लगभग दो साल तक मजबूत सरकार चलाई - अपनी असामयिक मृत्यु के दिन तक - और किसी नेता का मोहरा बनना तो दूर खुद की विवेकशील निर्णय क्षमता के चलते हिंदुस्तान के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराया. यह सही बात है कि शास्त्रीजी चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनने का विकल्प नहीं बने थे, लेकिन उनका उदाहरण यह बताने के लिए काफी है कि जो चुनावों से पहले विकल्प नहीं माना जाता वह भी आगे चलकर ‘मजबूत सरकार’ चला सकता है और देश को ‘विकास’ के रास्ते पर आगे बढ़ा सकता है.

एक दूसरा बड़ा उदाहरण इंदिरा गांधी का भी है. अगर कल्ट की तरह स्थापित होने में नरेंद्र मोदी के समकक्ष भारत की कोई राजनीतिक हस्ती टिकती है तो वे इंदिरा गांधी ही हैं. उनका कल्ट भी मोदी कल्ट की तरह अतिशयोक्ति में डूबी तमाम बातों से खड़ा किया गया था – जैसे कि वे भी अठारह-अठारह घंटे काम किया करती थीं – और इसी कल्ट ने आगे चलकर इमरजेंसी के दौरान विध्वंसक रूप अख्तियार कर लिया था.

बहरहाल, लालबहादुर शास्त्री की असामायिक मृत्यु के बाद एक बार फिर मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाएं थीं. लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि शास्त्रीजी के कैबिनेट में शांत और शर्मीले स्वभाव की मंत्री मालूम होने वाली इंदिरा न सिर्फ देर-सवेर विकल्प के तौर पर उभरेंगी बल्कि प्रधानमंत्री भी बनेंगी और आगे चलकर सभी कार्यकाल मिलाकर लगभग 16 सालों तक इस देश के सर्वोच्च पद को संभालेंगी. ‘गूंगी गुड़िया’ कहलाए जाने से शुरू हुआ इंदिरा गांधी का यह सफर ‘आयरन लेडी’ और ‘दुर्गा’ जैसे सम्मानित नामों तक पहुंचा था.

हालांकि, 1975 में इमरजेंसी लगाने के बाद इंदिरा गांधी को लगा कि वे 1977 का चुनाव भी आसानी से जीत जाएंगीं. उनके ज्यादातर विरोधी जेल में थे, देश की ज्यादातर संवैधानिक संस्थाएं उनकी जेब में थीं, और उन्हें ये भ्रम था कि जनता उनके साथ है. लेकिन 1977 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी बुरी तरह हारीं और जिन मोरारजी देसाई को कांग्रेस ने दो बार प्रधानमंत्री बनने से वंचित रखा, वे जनता पार्टी के उम्मीदवार बनकर दो साल के लिए देश के प्रधानमंत्री बने. चुनावों से पहले मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्री बनने का किसी ने सोचा तक नहीं था और ‘इंदिरा कल्ट’ ऐसा था कि कहा जाने लगा था कि ‘इंदिरा गांधी का कोई विकल्प नहीं है’.

इसी तरह पीवी नरसिम्हा राव भी 1991 में प्रधानमंत्री पद के लिए विकल्प नहीं थे. वे राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर चुके थे और राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस, वीपी सिंह (जनता दल) और लालकृष्ण आडवाणी (भाजपा) की मंडल-कमंडल की मजबूत राजनीति का मुकाबला कर रही थी. लेकिन पहले चरण का चुनाव होने के बाद राजीव गांधी की हत्या कर दी गई और सहानुभूति की लहर के चलते दूसरे चरण में जनता ने कांग्रेस को वोट दिया. इस तरह अल्पमत में होने के बावजूद कांग्रेस ने लेफ्ट पार्टियों का सहयोग लेकर 1991 में ऐसी मजबूत सरकार बनाई कि उसने आगे चलकर इस देश के आर्थिक विकास का रुख ही बदल दिया.

1991 का यह चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस की तरफ से मुख्य दो दावेदारों में शरद पवार और अर्जुन सिंह के ही नाम शामिल थे. लेकिन जो नेता न चुनावों के पहले विकल्प था और न चुनावों के बाद पहला विकल्प था, वही पीवी नरसिम्हा राव हिंदुस्तान के नौंवे प्रधानमंत्री बने. चाणक्य कहे जाने वाले राव ने अगले पांच साल ‘मजबूत’ सरकार भी चलाई और अपने वित्तमंत्री मनमोहन सिंह की मदद से हिंदुस्तानी अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोलकर कई जानकारों के मुताबिक देश का सही-सच्चा ‘विकास’ किया. कई सारे गलत राजनीतिक फैसले लेने के बावजूद इसीलिए नरसिम्हा राव को हिंदुस्तान के सबसे महत्वपूर्ण प्रधानमंत्रियों में गिना जाता है.

एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और मनमोहन सिंह को भी नहीं भूला जाना चाहिए. ये तीनों राज्यसभा सदस्य थे और बिना लोकसभा चुनावों में ‘चेहरा’ बने अकस्मात ही देश के प्रधानमंत्री बने थे. इनके कार्यकाल में विवादों और असफलताओं की कमी नहीं रही और मनमोहन सिंह को छोड़कर बाकी दोनों ने पांच वर्ष का कार्यकाल भी पूरा नहीं किया. लेकिन इन तीनों का प्रधानमंत्री बनना तीन और ऐसे उदाहरण देता है जो बताते हैं कि भारतीय राजनीति देश के सर्वोच्च पद का चुनाव करते वक्त कभी विकल्पहीन नहीं रही. पहले से कोई चेहरा मौजूद न होने पर भी देश कभी इतना अस्थिर नहीं रहा जितना इन दिनों ‘मजबूर-मजबूत’ का फर्क बताकर दिखाया जा रहा है.

आज की बात

प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में अक्षय कुमार को दिए अपने गैर-राजनीतिक इंटरव्यू में एक घोर राजनीतिक बात कही. उनका (घुमा-फिराकर) कहना था कि वे हिंदुस्तान के बाकी प्रधानमंत्रियों की तुलना में ज्यादा सक्षम और प्रधानमंत्री पद के लिए ज्यादा अनुभवी इसलिए भी थे कि यह पद संभालने से पहले वे लंबे वक्त तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे थे. गुजरात सरकार चलाने का वह अनुभव प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके बेहद काम आया था.

सिर्फ इस खूबी के हिसाब से भी देखें – वैसे तो हिंदुस्तानी लोकतंत्र में यह खूबी किसी भी राजनीतिक पद की आवश्यकता नहीं रही है – तो भी मौजूदा भारतीय राजनीति के पास नरेंद्र मोदी के कई सारे विकल्प मौजूद मिलते हैं. ये विकल्प सिर्फ कल्पना की दौड़ नहीं हैं, बल्कि 2019 के चुनावों में भाजपा द्वारा 2014 का इतिहास नहीं दोहराए जाने पर रियलिटी भी बन सकते हैं!

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एचडी देवगौड़ा न सिर्फ हिंदुस्तान के 11वें प्रधानमंत्री रह चुके हैं बल्कि उनको कर्नाटक का मुख्यमंत्री पद (1994-96) संभालने की भी ‘क्वालिफिकेशन’ हासिल है. केंद्र और राज्य दोनों में उन्हें सरकार चलाने का अनुभव है और 2019 के लोकसभा चुनावों में न सिर्फ कुछ राजनीतिक जानकार उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देख रहे हैं, बल्कि कुछ राजनेता तो डार्क हॉर्स तक की संज्ञा दे रहे हैं.

पश्चिम बंगाल की 12वीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी नरेंद्र मोदी द्वारा बताई गई उनकी उपरोक्त क्वालिफिकेशन के करीब पहुंचती हैं. 34 साल से जमी वामपंथी सरकार को पश्चिम बंगाल से बेदखल करने के बाद से ममता बनर्जी लगातार दो बार (2011, 2016) पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री चुनी गई हैं और 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी की सबसे मुखर विरोधी के रूप में उभरकर सामने आई हैं. अगर भाजपा 2014 की तरह प्रचंड बहुमत नहीं हासिल कर सकी तो बाकी एंटी-बीजेपी पार्टियों से मिलकर बनी सरकार में प्रधानमंत्री पद के लिए ममता बनर्जी की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है.

शरद पवार भी इसी तरह विकल्प के तौर पर उभर सकते हैं क्योंकि उन्हें भी महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री पद संभालने का लंबा अनुभव है (तीन बार). आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू (तीन बार) और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं मायावती (चार बार) भी मोदीजी की इसी क्वालिफिकेशन को ध्यान में रखकर प्रधानमंत्री पद के विकल्पों में शामिल होते हैं. ये सभी मौजूदा व भूतपूर्व मुख्यमंत्री गठबंधन की राजनीति के माहिर खिलाड़ी भी हैं और भाजपा के बहुमत न हासिल करने पर एंटी-भाजपा पार्टियों को साथ लाकर सारे पूर्व अनुमानों को धत्ता बता सकते हैं. (हालांकि, कयास इन दिनों यह भी लग रहे हैं कि जरूरत पड़ने पर मोदी सरकार मायावती से भी गठबंधन कर सकती है! हिंदुस्तान में राजनीति ऐसे भी आगे बढ़ती है, कब-क्या-कैसे होगा, कोई इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता!)

मोदी नहीं तो फिर कौन?’ के घरेलू विकल्प

खुद भाजपा के घर में भी नरेंद्र मोदी के विकल्प मौजूद हैं! न सिर्फ राजनीतिक जानकार और विपक्षी नेतागण नितिन गडकरी का नाम प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि भाजपा के अंदर मौजूद एक बड़ा धड़ा नरेंद्र मोदी के बहुमत नहीं हासिल करने पर उन्हें एक विकल्प के तौर पर देख रहा है. गडकरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बेहद करीबी नेताओं में गिने जाते हैं और हाल ही में भाजपाई सुब्रमण्यम स्वामी ने भी आगे बढ़कर यह स्वीकारा है कि वे नरेंद्र मोदी का विकल्प हो सकते हैं, क्योंकि वे उतने ही बेहतर हैं जितने मोदी.

नितिन गड़करी के अलावा भी भाजपा के पास सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान, सहयोगी दल के नीतीश कुमार जैसे वरिष्ठ, अनुभवी और कद्दावर नेता मौजूद हैं जो किसी भी वक्त प्रधानमंत्री पद संभालने के लिए विकल्प बन सकते हैं. 23 मई को परिणाम आने के बाद क्या होगा कोई नहीं कह सकता, इसलिए इन नेताओं की दावेदारी अभी से पूरी तरह खारिज कर देना भूल होगी.

विपक्ष में मौजूद नेताओं में से राहुल गांधी की दावेदारी को भी हल्के में लेना मूर्खता होगी. अपनी लीडरशिप में तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाने के बाद उनकी छवि में जमीन-आसमान बराबर बदलाव आ चुका है. जिस शख्स को कभी भाजपा और भाजपा समर्थक रोज ‘पप्पू’ कहकर खारिज और अपमानित किया करते थे, आज वे इस डर से इस नाम का उपयोग तक नहीं करते कि कहीं जनता नाराज न हो जाए. उनसे मिलने वाली चुनौतियों को भाजपा गंभीरता से भी लेती है और जनता का परसेप्शन भी उनके प्रति काफी हद तक बदला है. कुछ वक्त पहले तक इस देश में एक मजबूत विपक्ष नहीं नजर आ रहा था और लेकिन उनकी वजह से आज ऐसा नहीं है.

सबसे अहम बात है कि इस कट्टरवादी समय में नरेंद्र मोदी का विलोम होकर राहुल गांधी एक नरम चेहरा बनकर उभरने में सफल होते नजर आ रहे हैं.