साल 2008 में भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने कई साल तक चले विचार-विमर्श के बाद ‘सीमा पार व्यापार’ को मंजूरी दी थी. इसके बाद बारामुला जिले के सलामबाद इलाक़े में रफ़ीक़ अहमद आवान के साथ-साथ कई और स्थानीय लोगों की ज़मीनें अधिग्रहीत की गईं. इन जमीनों पर ‘ट्रेड सेंटर’ बनाए जाने थे. रफ़ीक़ की ही तरह बाकी सारे लोग भी अपनी ज़मीनें, जो कि उनकी कमाई का प्राथमिक साधन थीं, न रहने के बाद- सलामबाद के इस ‘ट्रेड सेंटर’ पर मजदूरी करने लगे. करीब 11 साल से इन लोगों की गुज़र-बसर हो रही थी. लेकिन अचानक भारत सरकार द्वारा इस व्यापार को बंद कर दिये जाने की घोषणा ने रफ़ीक़ जैसे 370 अन्य मजदूरों की रोज़ी रोटी छीन ली है.

‘हालत यह हो गई है कि अब शायद भीख मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा,’ रफ़ीक़ ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा. उनका यह भी कहना था कि उनके चार बच्चे और उनके अन्य घर वाले भुखमरी की कगार पर हैं. रफीक ने बताया, ‘जो जमा कर रखा था वो पिछले दो महीने में खतम हो गया है. और सिर्फ मेरी नहीं सारे मजदूरों की यही हालत है.’

मामला सिर्फ रफ़ीक़ और 370 मजदूरों का नहीं है. संकट नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ से काम कर रहे लगभग 600 व्यापारियों का भी है और उनसे जुड़े सैकड़ों ट्रक चालकों का भी. यानी हजारों लोगों की आजीविका पर ग्रहण गया है. जैसे श्रीनगर के लाल बाज़ार में रहने वाले मीर मुनीर. उन्होंने मार्च में 45 लाख रुपए के मिर्ची के बीज नियंत्रण रेखा के उस पार भिजवाने के लिए गाड़ियों में चढ़ा दिये थे. लेकिन व्यापार बंद हो जाने के कारण इन्हें भिजवा नहीं पाए. सत्याग्रह से बातचीत में उनका कहना था, ‘आपको क्या बताऊं मैं किस-किस तरफ से नुकसान हो रहा है. बीज पड़े-पड़े सूख रहा है और इसका ज़ाहिर है वज़न कम हो रहा है. बैंक से पैसा उठाया है और बैंक को कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मेरा व्यापार चल रहा है या नहीं, वो तो अपना ब्याज और असल लेके रहेगा.’

मुनीर ने बीज के बदले उस तरफ से खजूर और मिसवाक मंगाए थे, रमज़ान के महीने के लिए. मुनीर ने रुंआसे होते हुए बताया, ‘वहां पड़े रहेंगे तो रमज़ान के बाद न खजूर किसी काम के हैं न मिसवाक. मुझे समझ नहीं आ रहा है मैं क्या करूं.’ यही हालत बाकी करीब 300 व्यापारियों की है जिनका करोड़ों रुपया फंसा हुआ है, ज़मीनें गिरवी हैं और जो इस वक़्त पाई-पाई को मोहताज हैं.

सवाल यह है कि भारत सरकार ने यह व्यापार बंद करके इतने लोगों के व्यवसाय पर क्यों लात मारी है. क्या सरकार का कदम जायज़ है? क्या यह व्यापार फिर कभी हो पाएगा? लेकिन पहले समझना यह होगा कि यह व्यापार दरअसल है क्या.

कश्मीर और पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) के बीच इस व्यापार की कल्पना 2004 में तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने की थी. लेकिन यह अमल में लाया गया 2008 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी न्यू यॉर्क में मिले. इस व्यापार का मक़सद दोनों देशों के बीच विश्वासबहाली था. चर्चा के बाद दो व्यापार मार्ग खोले गए- उरी स्थित सलामबाद और पुंछ के चाकंडे बाग से.

कश्मीर चेंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष शेख आशिक ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा, ‘मुझे पूर्व राज्यपाल एनएन वोहरा ने बताया था कि मनमोहन सिंह ने उन्हें न्यू यॉर्क से फोन करके पूछा था कि कितने दिनों में यह व्यापार शुरू किया जा सकता है. जहां वोहरा जी ने कुछ महीने मांगे थे, उनको सिर्फ 15 दिन मिले थे.’

यह शायद देश का पहला व्यापार था जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के दायरे से बाहर सीधा गृह मंत्रालय की देख रेख में रखा गया. तय हुआ कि 21 चीजों का वस्तु-विनिमय यानी बार्टर किया जाएगा. दूसरे शब्दों में कहें तो चीजों के बदले पैसों की नहीं बल्कि चीजों की अदला-बदली होनी थी. व्यापार शुरू हुआ था 1.3 करोड़ रु की वस्तुओं के आदान प्रदान के साथ. इस साल मार्च तक यह आंकड़ा 3000 करोड़ रु हो चुका है.

तो लोगों के करोड़ों रुपए दांव पर लगे हुए हैं और भारत सरकार ने इस व्यापार पर रोक लगा देने का निर्णय ले लिया है.

आखिर क्यों?

इस साल आठ मार्च को सरकार ने सलामबाद वाला व्यापार मार्ग रुकवा दिया. बताया गया है कि इस पर पड़ने वाले कमान अमन सेतु पुल की मरम्मत होनी है. सरकार ने इसके लिए 10-15 का समय घोषित किया. माल से भरे सैकड़ों ट्रक कमान अमन सेतु पुल के दोनों तरफ सुरक्षा मंजूरी मिल जाने के बाद पुल ठीक होने के इंतज़ार में थे. इंतज़ार लंबा होता गया, व्यापारी सब्र करते रहे. लेकिन इस बार सब्र का फल मीठा नहीं था.

18 अप्रैल को गृह मंत्रालय से एक और फरमान निकला और सीमा पार व्यापार को बंद कर दिया गया. सलामबाद से भी और अभी तक चल रहे पुंछ वाले रास्ते से भी. गृह मंत्रालय के आदेश में लिखा था, ‘खबर यह है कि नियंत्रण रेखा पर हो रहे व्यापार की आड़ में पाकिस्तान में रह रहे कुछ तत्व भारत में हथियार, नशीले पदार्थ और नकली मुद्रा भेज रहे हैं.’ गृह मंत्रालय के आदेश के बाद कुछ अखबारों ने ऐसी खबरें छापीं कि पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर में कुछ 10 ऐसे कश्मीरी इस व्यापार का हिस्सा हैं जो 90 के दशक में मिलिटेंट बनने उधर चले गए थे.

इस खबर से यहां स्थित व्यापारियों पर अनिश्चितता के बादल और गहरा गए हैं. इस व्यापार को फिर से शुरू करने के मुद्दे पर गृह मंत्रालय की चुप्पी भी व्यापारियों को खूब चुभ रही है. कश्मीर में सुरक्षा अधिकारियों से पूछें तो वे कहते हैं कि जो भी गृह मंत्रालय के आदेश में लिखा है गलत नहीं है. एक आला पुलिस अधिकारी ने सत्याग्रह से बातचीत में कहा, ‘हम कई सालों से यही बोल रहे हैं. हमने भी कई बार इस बारे में अधिकारियों को आगाह किया है कि यह व्यापार गलत चीजों के लिए इस्तेमाल हो रहा था.’

इस अधिकारी का यह भी कहना था कि कई बार नशीले पदार्थ पकड़े गए हैं. उन्होंने कई बार जोर देकर यह भी कहा कि यह वस्तु-विनिमय कुछ लोगों को कश्मीर में मिलिटेंसी के लिए पैसे भेजने में मदद कर रहा है. अधिकारी का कहना था, ‘इस में पैसे का हिसाब तो है नहीं, बस चीजों का हिसाब है और चीजों की कम कीमत दिखाकर बाकी का पैसा गलत कामों में लगाया जा रहा था.’

उधर, व्यापारियों की मानें तो वे गृह मंत्रालय या पुलिस की कही हुई किसी भी बात को नकार नहीं रहे हैं. सीमा पार ट्रेड यूनियन के उपाध्यक्ष समिउल्लाह भट ने सत्याग्रह से बात करते हुए कहा कि वे मानते हैं कि पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती हैं और कोई न कोई गलत काम ज़रूर करता है. उनका कहना था, ‘लेकिन कुछ गलत काम दुनिया के किस व्यापार में नहीं होते? तो क्या व्यापार ही बंद कर दिया जाए? और वो भी तब जब हजारों लोगों की रोजी-रोटी दांव पर लगी हो?’

भट के मुताबिक सरकार को बिल्कुल इस व्यापार को साफ-सुथरा बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए क्योंकि ये कदम और किसी के हित में हों न हों, व्यापारियों के हित में ज़रूर होंगे. उनका कहना था, ‘ये हमारी रोज़ी-रोटी है और हम नहीं चाहेंगे कि इसकी आड़ में कोई भी गलत काम हो. लेकिन व्यापार बंद करना चीजों का समाधान नहीं है.’

सत्याग्रह ने और भी व्यापारियों से इस बारे में बात की. उनका भी कहना था कि वे कई सालों से इस व्यापार को ‘वस्तु-विनिमय’ केंद्रित न रखकर इसमें बैंकिंग सिस्टम लागू कर दिये जाने की मांग कर रहे हैं. ऐसे ही एक कारोबारी वसीम अहमद का कहना था, ‘उससे चीज़ें और क्लीन हो जाएंगी और कोई चीजों की कीमत कम भी नहीं बता पाएगा. हम ये मांग कई सालों से कर रहे हैं, लेकिन इस पर गौर करने के बजाई सरकार ने सिरे से ही व्यापार बंद कर दिया है.’

व्यापारी यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान के नियंत्रण वाले कश्मीर में कई पूर्व मिलिटेंट इस व्यापार से जुड़े हुए हैं और उन्होंने सरकार को इस बारे में लिखा भी था. व्यापार मंडल के अध्यक्ष हिलाल तुर्की ने सत्याग्रह को बताया कि उन्होंने पिछले साल सरकार को इस बारे में लिखकर पूछा था कि क्या किया जाए, लेकिन उनको कोई जवाब नहीं मिला. उनका कहना था, ‘तब महबूबा मुफ़्ती मुख्यमंत्री थीं जब हमने सरकार को इस बारे में आगाह किया था. लेकिन तब हमें कोई जवाब नहीं मिला.’

लेकिन साथ ही साथ व्यापारी यह भी कहते हैं कि ये पूर्व मिलिटेंट ही हैं जिनकी वजह से यह व्यापार सफल रहा था. समिउल्लाह भट की मानें तो कई व्यापारियों के रिश्तेदार जो उस तरफ मिलिटेंट बनने गए थे इस व्यापार से जुड़कर सामान्य ज़िंदगी गुजारने की कोशिश में जुट गए थे. भट ने बताया, ‘उन्हीं की वजह से हम भी यह व्यापार कर पाए. क्योंकि जब यह शुरू हुआ था तो न हमारे पास उस तरफ बात करने का कोई साधन था और न हमें वहां कोई जानता था. यही पूर्व मिलिटेंट हमारे लिए उस तरफ के व्यापारियों से जुड़ने में मददगार हुए.’ उनका यह भी कहना है कि जब परवेज मुशर्रफ और अटल बिहारी वाजपेयी ने इस योजना की कल्पना की थी तो इन्हीं पूर्व मिलिटेंट्स के रोजगार का मुद्दा नज़र में रखा गया था. भट का कहना था, ‘अब अचानक से यही लोग खतरा क्यों बन गए हैं?’

सरकार की ही तरह ये व्यापारी भी यही चाहते हैं कि इस व्यापार को साफ-सुथरा बनाया जाये. लेकिन ये लोग थोड़ी सी मोहलत मांग रहे हैं. इसलिए कि जो माल फंसा हुआ है उसका आवागमन हो जाए. ‘वरना मेरे जैसे व्यापारियों के पास ख़ुदकुशी करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचेगा. मैं आपको बता चुका हूं अपनी हालत और उस पर यह कि मुझे यह माल कहीं रखने के लिए अब गोदाम ढूंढना पड़ेगा, जिसमें और पैसे जाएंगे,’ मुनीर का कहना था.

व्यापारियों के मुताबिक फंसा हुआ माल बदलने के बाद चाहे सरकार को फिर से कोई निर्णय लेने में साल भर भी लग जाये तो कोई चिंता की बात नहीं है. समिउल्लाह का कहना था, ‘हम सरकार के साथ हैं, चाहे वो सुरक्षा का विषय हो या और कोई. वो चाहे निर्णय लेने में साल भर लगाएं या दो साल. लेकिन हाथ जोड़ के विनती यह है कि कम से कम हमें खड़ा माल पार करने की इजाज़त दे दी जाए.’

जहां ये व्यापारी बस थोड़ी सी मोहलत मांग रहे हैं वहीं इस व्यापार से जुड़े 370 मजदूर अपने परिवारों को संकट में देख हलकान हुए जा रहे हैं. सलामबाद में मजदूरों के पर्यवेक्षक, लतीफ़ आवान ने सत्याग्रह को बताया, ‘चाहे व्यापारियों को मोहलत मिले या नहीं, हम तो डूब गए. सरकार ने हमसे हमारी रोज़ी-रोटी छीन ली है. अगर वो हमारी रोज़ी नहीं लौटा सकते तो कम से कम हमें कोई रास्ता ही दिखा दें.’

लेकिन फिलहाल तो कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा. कम से कम चुनाव खत्म होने तक तो नहीं.