देश में अनुसूचित जनजाति के बच्चों की शिक्षा के लिए तीसरी पंचवर्षीय योजना के समय (1961-66) से छात्रावास योजना चल रही है. केंद्र सरकार से आर्थिक सहयोग प्राप्त कर राज्य सरकारें अपने या गै़र-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के अधीन इन आदिवासी बच्चों को हॉस्टल सुविधा देती हैं. यह एक अलग बहस का विषय हो सकता है कि इस योजना से उनको कितना फायदा मिला. फिलहाल तो यह आदिवासी छात्राओं के बलात्कार और यौन शोषण की घटनाओं की भेंट चढ़ती दिख रही है.

हाल के सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे सरकारी या सरकार से अनुदान प्राप्त एनजीओ के हॉस्टलों में आदिवासी लड़कियों से बलात्कार व हत्या के कई मामले सामने आए हैं. इस सिलसिले में ताज़ा मामला महाराष्ट्र के चंद्रपुर का है. कुछ दिनों पहले यहां एक हॉस्टल में कम से कम छह आदिवासी छात्राओं के साथ बलात्कार होने की पुष्टि हुई. पुलिस ने इस मामले में जिन लोगों को गिरफ्तार किया है, उनमें हॉस्टल का अधीक्षक, उपाधीक्षिका, महिला केयरटेकर और सुरक्षाकर्मी शामिल हैं. इस मामले में एक पूर्व कांग्रेसी विधायक सुभाष धोते का नाम भी सामने आया है. पुलिस ने इनके ख़िलाफ़ पुख्ता सबूत जुटा लेने का दावा भी किया है. इस घटना को लेकर मचे बवाल के चलते धोते को नागपुर ज़िला कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा है.

आदिवासी छात्राओं का यौन शोषण एक राज्य की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समस्या है

महाराष्ट्र में किसी हॉस्टल में आदिवासी छात्राओं से यौन शोषण का यह पहला मामला नहीं है. यह सब सालों से चल रहा है. अलग-अलग सरकारों के समय में इन मामलों की जांच हुई और बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए करोड़ों रुपये ख़र्च करने का दावा भी किया गया, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में कोई बदलाव होता नहीं दिखा. वहीं, इस मामले में अन्य राज्यों की स्थिति देखने पर महसूस होता है कि हॉस्टलों में आदिवासी छात्राओं से बलात्कार एक राष्ट्रीय मुद्दा होना चाहिए. कुछ उदाहरणों से इसे समझ सकते हैं.

साल 2013 के दौरान छत्तीसगढ़ में एक सरकारी हॉस्टल में एक शिक्षक समेत दो लोगों को कम से कम नौ नाबालिग़ आदिवासी छात्राओं के साथ बलात्कार करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. उसी साल झारखंड के एक हॉस्टल में 20 हथियारबंद लोगों ने चार आदिवासी छात्राओं से बलात्कार किया. फिर जनवरी, 2014 में आंध्र प्रदेश के नलगोंडा में एक शिक्षक द्वारा 11 नाबालिग आदिवासी छात्राओं का यौन शोषण किए जाने का मामला सामने आया. उसी साल छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश में भी कई ऐसी छात्राओं के साथ बलात्कार और उनके यौन शोषण के मामले सामने आए थे. वहीं 2015 में ओडिशा के एक हॉस्टल में दसवीं कक्षा की छात्रा के साथ यौन शोषण की घटना हुई.

हालिया मामलों की बात करें तो पिछले साल अगस्त में मध्य प्रदेश के एक आदिवासी हॉस्टल में पढ़ने वाली एक मूक-बधिर छात्रा ने हॉस्टल के निदेशक पर उसके साथ कई बार बलात्कार करने का आरोप लगाया था. बाद में हॉस्टल में रह रहीं अन्य आदिवासी छात्राएं भी सामने आईं और निदेशक अश्विनी शर्मा के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई. उसकी गिरफ़्तारी के बाद जांच के दौरान पता चला कि उसे पिछले दो सालों से राज्य सरकार से अनुदान मिल रहा था. विवाद के बीच तत्कालीन विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने दावा किया आरोपित का सत्तारूढ़ भाजपा से क़रीबी नाता भी है.

वहीं, इस साल जनवरी में ओडिशा के कंधमाल ज़िले के एक हॉस्टल में 14 साल की नाबालिग़ छात्रा ने एक बच्चे को जन्म दिया. जांच में पता चला कि किशोरी का आठ महीने पहले बलात्कार किया गया था. इस सिलसिले में ग्रेजुएशन कर रहे तृतीय वर्ष के एक छात्र को गिरफ़्तार किया गया था. उधर, हॉस्टल की दो अधीक्षिकाओं, दो रसोइयों व सहायकों, एक महिला निरीक्षक और एक अन्य महिला सहायक को सस्पेंड कर दिया गया. इस मामले से पहले ओडिशा के एक और ज़िले कोरापुट में एक हेडमास्टर पर नाबालिग़ छात्रा के साथ बलात्कार करने का आरोप लगा था और इसके बाद यह लड़की गर्भवती हो गई थी.

ज्यादातर मामलों से जुड़े तथ्य और परिस्थितियां एक जैसी हैं

यहां हमने सिर्फ चंद उदाहरणों का जिक्र किया. जबकि इंटरनेट पर मीडिया रिपोर्टों को सर्च किया जाए आदिवासी छात्राओं के साथ बलात्कार या उनके यौन शोषण से जुड़ी सैकड़ों खबरें मिलती हैं. वहीं, इन सभी में कई बातें एक जैसी दिखाई पड़ती हैं. मसलन, अधिकतर पीड़िताएं नाबालिग़ होती हैं, आरोपित अक्सर हॉस्टल का मालिक और स्टाफ़ के लोग होते हैं, उनके पीछे कोई रसूख़दार व्यक्ति का हाथ होता है जो किसी न किसी राजनीतिक दल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा होता है और छात्रावास योजना के तहत सरकार से अनुदान प्राप्त कर रहा होता है. किसी मामले में एक व्यक्ति ने बच्चियों को शिकार बनाया है, वहीं कुछ मामलों से साफ़ होता है कि एक पूरे गिरोह द्वारा व्यवस्थित तरीक़े से आदिवासी छात्राओं का यौन उत्पीड़न किया जा रहा है. यह भी ग़ौर करने वाली बात है कि इन घटनाओं का तब तक पता नहीं चलता जब तक हॉस्टल की छात्रा या छात्राएं लगातार यौन शोषण के चलते गर्भवती या शारीरिक-मानसिक रूप से बीमार न हो जाएं.

सामाजिक कार्यकर्ता और विशेषज्ञ क्या कहते हैं

इस समस्या से जुड़े कुछ सवाल लेकर सत्याग्रह ने सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, सोनी सोरी (जो एक आदिवासी महिला शिक्षिका भी हैं) और दक्षिण कोसल पत्रिका के संपादक उत्तम कुमार से बात की. आदिवासी वर्ग के लिए लंबे वक़्त से काम कर रहे हिमांशु कुमार कहते हैं, ‘इसे व्यापक समस्या के रूप में देखना पड़ेगा. पूरा आदिवासी समाज शहरी और गैर-आदिवासी समाज द्वारा अपमानित और प्रताड़ित किया जा रहा. इस काम में सरकारें, सुरक्षा बल और न्यायपालिका तक शामिल हैं. साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता दलितों, अल्पसंख्यकों और दूसरों मुद्दों पर बोलते हैं, लेकिन आदिवासियों को उन्होंने भी अलग-थलग कर दिया है. उनके विमर्श में आदिवासी बिलकुल ग़ायब हैं. आदिवासी महिलाओं-लड़कियों के साथ जो हो रहा है उसे इस तरह देखने की ज़रूरत है.’

हिमांशु कुमार अपनी बात साबित करने के लिए कुछ उदाहरण भी देते हैं. वे बताते हैं, ‘मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट है कि सुरक्षा बलों द्वारा 16 आदिवासी महिलाओं के बलात्कार के प्रथम दृष्टया सबूत मौजूद हैं, इसके बावजूद कोई एफ़आईआर नहीं हुई. पिछले साल ही सीआरपीएफ़ के दो जवानों ने तलाशी के नाम पर आदिवासी बच्चियों से अभद्र व्यवहार किया था. लेकिन कोर्ट ने उनको छोड़ दिया. बच्चियों को पुलिस जीप में भर कर लाई और उन्हें परिवार से अलग कर दिया गया. जबकि पॉक्सो एक्ट में माता-पिता की मौजूदगी में बात कराई जानी चाहिए. लेकिन सारे नियमों की धज्जियां उड़ाकर क्या लिखा कुछ पता नहीं. बाद में जवानों को छोड़ दिया. क्या कोर्ट यह सब नहीं देख रहा? हालात बहुत ख़राब है. बच्चियां घर में रहती हैं तो सिपाही बलात्कार करता है, हॉस्टल में जाती हैं तो वहां भी बलात्कार होता है. जाएं तो जाएं कहां?... अब पूरी व्यवस्था ही इसमें शामिल है तो फिर उनके लिए क्या उम्मीद की किरण बचती है. हमें इस माहौल में बच्चियों के साथ हो रही घटनाओं को देखना पड़ेगा. वे (आदिवासी समाज) हमारी लूट और क़ब्ज़े के साथ भारी उपेक्षा के भी शिकार हैं.’

हिमांशु के अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ता व शिक्षिका सोनी सोरी भी कहती हैं कि हॉस्टलों के ज़रिये आदिवासी बच्चियों को उचित शिक्षा मिलने के बजाय उनका यौन शोषण हो रहा है. सत्याग्रह से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘मैं यह इसलिए कह सकती हूं क्योंकि नक्सलवाद के नाम पर बहुत कुछ बंद किया गया है. सरकार ने आदिवासी इलाक़ों में बड़ी संख्या में स्कूल बंद किए हैं. फिर बच्चों को एक जगह एक हॉस्टल में लाकर रखा गया है. वहां भी उन्हें स्वतंत्रता और शिक्षा नहीं दी जा रही है. कई जगहों पर तो बच्चों की ख़ून की कमी से मौत भी हो रही है. उस पर भी कोई बात नहीं कर रहा है. शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से बच्चे प्रताड़ित हैं.’

छात्रावास योजना के तहत हॉस्टल निर्माण के लिए सरकार द्वारा ज़मीन आवंटित करने का प्रावधान है. लेकिन कई मामलों में यह काम ठेकेदारों के भरोसे छोड़ दिया जाता है. इससे एक तरह से इस योजना का निजीकरण भी हुआ है. सरकारों द्वारा ज़मीन मुहैया कराए जाने के बजाय प्राइवेट हॉस्टलों में छात्राओं को रखा जा रहा है. इस पर सोनी सोरी कहती हैं, ‘सरकार ने इसे निजी व्यक्तियों के भरोसे छोड़ दिया. वे उससे पैसे लेकर डील कर रहे हैं. उन्हें पता है कि अब हम इन बच्चों के साथ कुछ भी करें हमें कोई नहीं पूछेगा.’

वहीं, उत्तम कुमार बताते हैं कि नियम-क़ानून का सही पालन नहीं होने के चलते ऐसे मामले बार-बार सामने आते हैं. वे इसके लिए हॉस्टल स्टाफ़ के साथ सरकार को भी ज़िम्मेदार मानते हैं. उन्होंने कहा, ‘यह सरकार की नाकामी है. आदिवासी हॉस्टल तो बना दिए जाते हैं, लेकिन वहां की सुरक्षा माशाअल्लाह है. क़ानून है कि महिला हॉस्टल में पुरुष प्रवेश नहीं कर सकता. लेकिन जिनका रसूख़ है वे तो घुसते ही हैं. कई घटनाओं में तो महिला अधीक्षक शामिल रहती हैं. ऐसी एक महिला को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री (पूर्व) रमन सिंह ने पुरस्कृत भी किया था. कई जगहों पर सांसद, विधायक और उनके गुर्गे शामिल रहते हैं. सरकार की कमज़ोरी है कि वह पूरी तरह निगरानी नहीं करती. बच्चे कहीं भी सुरक्षित नहीं है.’

उत्तम कुमार जानकारी देते हैं कि छुट्टियों में घर लौटे कई आदिवासी बच्चे वापस हॉस्टल नहीं जाते, और इसकी वजह केवल यौन शोषण नहीं है. वे बताते हैं, ‘आप हॉस्टल में जाकर देखिए कि अधीक्षिका मालामाल हो जाती है. उसकी आय का साधन बन जाता है. आदिवासी बच्चों को उतना खाना मिलता नहीं है जितना मिलना चाहिए.... निमोनिया, ख़ून की कमी की शिकायत बहुत ज़्यादा है. गर्मी के समय पंखे और कूलर तक की व्यवस्था नहीं होती है. कई हॉस्टलों में तो एकाध पंखे होते हैं उसी से उन्हें गुज़ारा करना पड़ता है. छुट्टी में बच्चे घर चले जाते हैं तो उसका भी पैसा ये लोग निकाल लेते हैं.’

उत्तम कुमार सवालिया लहजे में कहते हैं कि महिला अधीक्षक होने के बावजूद यौन शोषण हो रहा है तो इसका कारण क्या है. इस सवाल का जवाब देते हुए वे आगे दावा करते हैं, ‘इसका मतलब है कि उसका रसूख़दारों से कनेक्शन है. वे लड़कियां सप्लाई करते हैं. आदिवासी लड़कियां हैं तो कुछ बोल नहीं पातीं. इसलिए उनसे और उनके माता-पिता से मिलकर बात करनी चाहिए कि वे हॉस्टल क्यों नहीं जा रही हैं. हमें लगातार देखरेख करने की ज़रूरत है. यह देखा जाना चाहिए कि हॉस्टल की महिला अधीक्षक का रवैया कैसा है. बच्चों से पूछा जाए कि वे हॉस्टलों में कैसे रहते हैं. क्योंकि कोई अधिकारी आता है तो पहले ही बच्चे को पढ़ा देते हैं कि क्या बोलना है. इसलिए औचक निरीक्षण होने चाहिए. यह करके कुछ लगाम लगाई जा सकती है. ज़मीनी स्तर पर काम किए बिना नियमों और योजना का कोई मतलब नहीं है.’