यौन उत्पीड़न मामले में देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को क्लीन चिट मिल चुकी है. लेकिन जिस तेज़ी और जिस प्रक्रिया से उन्हें यह क्लीन चिट दी गई, वह भारत के न्यायिक इतिहास में अभूतपूर्व है. एक महीने से भी कम समय में इस पूरे मामले की जांच, गवाही, सुनवाई, तर्क-वितर्क सब पूरे हो गए और मुख्य न्यायाधीश को आरोपों से मुक्त कर दिया गया.

न्याय व्यवस्था के संदर्भ में अंग्रेज़ी की दो कहावतें काफ़ी मशहूर हैं. पहली है - ‘जस्टिस डीलेड इज़ जस्टिस डिनाइड.’ यानी बहुत देरी से मिला हुआ न्याय, न्याय न मिलने के समान है. जबकि दूसरी कहावत है - ‘जस्टिस हरीड इज़ जस्टिस बरीड’. यानी बेहद हड़बड़ी में किया गया न्याय भी न्याय को दफ़न कर देने जैसा है. दोनों ही कहावतें न्यायशास्त्र में सही साबित हुई हैं. देश के मुख्य न्यायाधीश पर लगे यौन शोषण के आरोपों में न्याय बड़ी हड़बड़ी में किया गया लगता है. इसलिए मुख्य न्यायाधीश को मिली क्लीन चिट का जमकर विरोध हो रहा है और सुप्रीम कोर्ट के बाहर ही कई प्रदर्शनकारी इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं.

इस विरोध के कई तार्किक कारण भी हैं. इन पर चर्चा करने से पहले संक्षेप में इस पूरे मामले को समझते हैं. इस विवाद की शुरुआत बीती 19 अप्रैल को तब हुई जब सुप्रीम कोर्ट के 22 जजों के घर एक पत्र पहुंचा. यह पत्र एक ऐसी महिला ने लिखा था जो साल 2014 से सुप्रीम कोर्ट में बतौर जूनियर कोर्ट असिस्टेंट करती थी. अक्टूबर 2016 से यह महिला जस्टिस रंजन गोगोई की कोर्ट में कार्यरत थी लेकिन अक्टूबर 2018 में इन्हें जस्टिस गोगोई के निवास पर बने कार्यालय में काम करने को कहा गया.

19 अप्रैल को लिखे अपने पत्र के साथ ही इन महिला ने लगभग 30 पन्नों का एक शपथपत्र भी तमाम जजों को भेजा. इस शपथपत्र में पूरी घटना का बेहद विस्तृत वर्णन करते हुए महिला ने जस्टिस गोगोई पर आरोप लगाया कि उन्होंने 10 और 11 अक्टूबर 2018 के दिन उनका यौन उत्पीड़न किया था. महिला ने शपथपत्र में यह भी बताया है कि कैसे जस्टिस गोगोई का विरोध करने के बाद उनका पूरा जीवन ही बदल गया. उनका आरोप है कि उन्हें सिर्फ़ एक दिन की छुट्टी लेने के चलते ही नौकरी से निकाल दिया गया. साथ ही दिल्ली पुलिस में कार्यरत उनके पति और देवर को भी निलंबित कर दिया गया. इसके अलावा उनके एक अन्य रिश्तेदार को भी नौकरी से निकाल दिया गया जिसे कुछ महीने पहले ख़ुद जस्टिस गोगोई ने ही ‘मुख्य न्यायाधीश के विवेकाधीन कोटे’ के तहत नौकरी पर लगवाया था.

19 अप्रैल को यह आरोप सार्वजनिक हुए और इसके अगले ही दिन इस मामले की न्यायिक यात्रा शुरू हो गई. 20 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले की सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ का गठन कर दिया. ख़ुद आरोपित होने के बावजूद भी उन्होंने न सिर्फ़ पीठ का गठन किया बल्कि वे स्वयं भी इस पीठ का हिस्सा बन गए. यहीं से इस मामले की न्यायिक प्रक्रिया सवालों के घेरे में आना शुरू हो गई थी.

प्राकृतिक न्याय का मूलभूत सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में जज नहीं हो सकता. क़ानून के विद्यार्थी तक इस सिद्धांत को जानते-समझते हैं. लेकिन इस मूलभूत सिद्धांत को धता बताते हुए जस्टिस गोगोई ने अपनी ही अध्यक्षता में तीन जजों की एक पीठ बनाई और इस मामले को ‘न्यायपालिका को कमज़ोर करने का षड्यंत्र’ बता दिया. यहां यह समझना बेहद महत्वपूर्ण है कि जस्टिस गोगोई ने अपनी न्यायिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसा किया. यदि वे ख़ुद पर लगे आरोपों का खंडन करते हुए व्यक्तिगत तौर से इन आरोपों को षड्यंत्र बताते तो इससे किसी को भी आपत्ति नहीं होती. वे मीडिया में, किसी न्यायिक पीठ के सामने या सार्वजनिक तौर पर भी अपनी व्यक्तिगत क्षमताओं में इन आरोपों का खंडन पूरे अधिकार के साथ कर सकते थे. लेकिन उन्होंने बतौर मुख्य न्यायाधीश और बतौर उसी न्यायिक पीठ के मुखिया के रूप में यह टिप्पणी की जो पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी. यानी ख़ुद पर लगे आरोपों को उन्होंने व्यक्तिगत हैसियत से नहीं बल्कि बतौर जज ख़ारिज कर दिया.

इस विशेष पीठ के गठन और इसकी कार्यप्रणाली का जब जमकर विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों ने मिलकर एक आंतरिक समिति के गठन का फैसला किया. जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता में बनी इस समिति में जस्टिस एनवी रमन्ना और जस्टिस इंदिरा बनर्जी भी शामिल थे. लेकिन यह समिति भी विवादों से अछूती नहीं थी. सबसे पहले तो पीड़ित महिला ने समिति में जस्टिस एनवी रमन्ना को शामिल किए जाने का विरोध किया. महिला ने आरोप लगाया कि जस्टिस रमन्ना की जस्टिस गोगोई से बहुत घनिष्ठ मित्रता है लिहाज़ा उन्हें इस समिति में नहीं होना चाहिए. इन आरोपों के बाद जस्टिस रमन्ना ख़ुद ही इस समिति में शामिल नहीं हुए और उनकी जगह जस्टिस इंदू मल्होत्रा को समिति में शामिल किया गया.

वैसे जस्टिस इंदू मल्होत्रा को समिति में पहले ही शामिल कर लिया जाना चाहिए था. क्योंकि विशाखा नियमावली के अनुसार इस तरह की आंतरिक समिति में महिलाओं की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए. पीड़ित महिला ने भी विशाखा नियमावली का हवाला देते हुए सवाल उठाए कि समिति की अध्यक्षता किसी महिला को करनी चाहिए और इसमें महिलाओं की प्रतिभागिता 50 प्रतिशत से ज़्यादा होनी चाहिए. जस्टिस रमन्ना की जगह जस्टिस इंदू मल्होत्रा के समिति में आने से महिलाओं की 50 प्रतिशत से ज़्यादा प्रतिभागिता तो स्वतः ही सुनिश्चित हो गई लेकिन इसकी अध्यक्ष एक महिला के होने की शर्त कभी पूरी नहीं हुई.

समिति से जुड़े विवाद यही ख़त्म नहीं होते. इस समिति के चरित्र को लेकर भी लगातार संशय बना रहा. ख़ुद समिति के सदस्य अपनी सुविधानुसार कभी इसे ‘औपचारिक आंतरिक समिति’ बताते रहे तो कभी अनौपचारिक जांच के गठित एक आम समिति. पीड़ित महिला का भी आरोप है कि सुनवाई के दौरान उसकी कई मांगों को समिति ने यह कहते हुए नकार दिया कि यह कोई औपचारिक समिति नहीं है लेकिन जब समिति ने अपनी रिपोर्ट बनाई तो उसे यह कहते हुए सार्वजनिक नहीं होने दिया कि 2003 के इंदिरा जयसिंह मामले के अनुसार आंतरिक समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जा सकती.

सुनवाई के दौरान भी आंतरिक समिति की कार्यप्रणाली पर कई सवाल लगातार उठते रहे. पीड़ित महिला ने समिति से मांग की थी कि उसे अपने वक़ील के ज़रिए अपनी बात रखने की अनुमति दी जाए. लेकिन समिति ने उसकी इस मांग को ख़ारिज कर दिया. सिर्फ़ यही नहीं, इन सुनवाइयों की वीडियो/ऑडिओ रिकॉर्डिंग की मांग भी ख़ारिज कर दी गई. पीड़ित महिला को न तो सुनवाई की प्रक्रिया की जानकारियां दी गईं और न ही 26 और 29 अप्रैल को दर्ज हुए उसके बयानों की प्रतिलिपि ही उसे सौंपी गई. समिति के इस रवैये पर क़ानून के कई जानकारों के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के कई भूतपूर्व और वर्तमान न्यायाधीशों ने भी सवाल उठाए थे. लेकिन इसके बाद भी सुनवाई ऐसे ही जारी रखी गई. सुप्रीम कोर्ट के सबसे प्रतिष्ठित न्यायाधीशों में गिने जाने वाले जस्टिस चंद्रचूड ने भी इस समिति पर कई सवाल उठाए हैं.

दो सुनवाइयों के बाद पीड़ित महिला ने इस समिति के सामने उपस्थित होने से ही इंकार कर दिया. उसका कहना था कि उसे अब यहां न्याय की कोई भी उम्मीद बाक़ी नहीं रह गई है. इसके बाद आंतरिक समिति ने पीड़ित महिला के बिना ही अपनी जांच जारी रखी और पांच मई को अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को सौंप दी. इसके अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटेरी जनरल ने इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए मात्र दो पैराग्राफ़ की एक टिप्पणी जारी कर दी. इसमें बताया गया कि समिति ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सभी आरोपों को निराधार पाया है और समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाएगी.

दिलचस्प यह भी है कि आंतरिक समिति की इस ‘गोपनीय’ रिपोर्ट की एक प्रतिलिपि मामले में आरोपित जस्टिस रंजन गोगोई को तो दी गई है लेकिन पीड़ित को नहीं. महिला के आरोपों को किस आधार पर ख़ारिज किया गया, उन्हें कैसे निराधार माना गया, किन गवाहों के बयान समिति ने दर्ज किए, पीड़ित के बयानों का क्या आशय लगाया गया, ये तमाम सवाल अब गोपनीय रिपोर्ट में बंद होकर रह गए हैं. पीड़ित महिला ने समिति से यह भी मांग की थी कि उसके और जस्टिस गोगोई के पर्सनल मोबाइल नम्बर की कॉल डिटेल्स, व्हाट्सएप मैसेज और अन्य विवरण जांच लिए जाएं जिससे उसके आरोप सही साबित हो सकते हैं. इस बारे में समिति ने क्या किया, यह भी कोई नहीं जानता.

समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक न करना इस लिहाज से भी सही नहीं है कि जिस इंदिरा जयसिंह मामले का हवाला देते हुए ऐसा किया गया है, वह फ़ैसला भी इस मामले में लागू नहीं होता. क़ानून के जानकार मानते हैं कि इंदिरा जयसिंह वाला फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट ने साल 2003 में दिया था और उस वक़्त तक ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’ लागू नहीं हुआ था.

ऐसे में रिटायर्ड जस्टिस एपी शाह सहित कई पूर्व न्यायाधीशों का मानना हैं कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट और ख़ास तौर से मुख्य न्यायाधीश ने जो किया है, उससे देश की इस सर्वोच्च न्यायिक संस्था पर हमेशा के लिए एक दाग़ लग गया है. इन तमाम लोगों का मानना है कि मुमकिन है आरोप लगाने वाली महिला पूरी तरह ग़लत हो लेकिन निष्पक्ष जजों द्वारा सुना जाना उसका संवैधानिक अधिकार है. अगर जस्टिस गोगोई पर लगे आरोप ग़लत भी हैं तो भी जिस प्रक्रिया से उन्हें ग़लत घोषित किया जाना चाहिए था, वैसा इस मामले में बिलकुल नहीं हुआ.

अधिकतर कानूनविद मान रहे हैं कि इस मामले से निपटने का आदर्श तरीक़ा यह होता कि पूरे मामले की पड़ताल के लिए किसी ऐसी समिति का गठन किया जाता जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश शामिल होते. इसके उलट इस मामले में वर्तमान जजों की ही समिति बनाई गई और उस समिति ने भी तमाम न्यायिक प्रक्रियाओं और सिद्धांतों की तिलांजलि देते हुए अपना फ़ैसला सुना दिया.

लेकिन ऐसा सिर्फ़ इस मामले में ही नहीं हुआ है. सुप्रीम कोर्ट के जजों पर जब भी ऐसे आरोप लगे हैं तो कमोबेश ऐसा ही देखने को मिला है. जिस सुप्रीम कोर्ट की यह ज़िम्मेदारी है कि वह सारे देश में विशाखा नियमावली और ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम’ का लागू होना सुनिश्चित करे, उसमें ही ये क़ानून प्रभावी तौर से लागू नहीं हो पाए हैं. कुछ साल पहले जब ऐसे ही आरोप जस्टिस एके गांगुली पर लगे थे तब भी सुप्रीम कोर्ट का रवैया लगभग यही रहा था. उस वक़्त आरोपों की जांच कर रही तीन सदस्यीय समिति ने यह मान लिया था कि जस्टिस गांगुली पर लगे आरोप प्रथमदृष्ट्या सही प्रतीत हो रहे हैं. इसके चलते जस्टिस गांगुली को पश्चिम बंगाल के मानवाधिकार आयोग से इस्तीफ़ा पड़ा था. लेकिन इसके बावजूद भी इस मामले में न तो कोई एफआईआर दर्ज हुई और न ही आगे कोई कार्रवाई ही हुई.

ऐसा ही एक मामला जस्टिस स्वतंत्र मिश्रा पर लगे यौन शोषण के आरोपों का भी है. उन पर यह आरोप एक छात्रा ने लगाए थे. लेकिन जैसे ही इस मामले ने तूल पकड़ना शुरू किया जस्टिस मिश्रा ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाख़िल की और अपने मामले में किसी भी तरह की मीडिया रिपोर्टिंग पर पाबंदी लगवा दी. इसके बाद उस पीड़िता को न्याय मिलना तो दूर, उसके साथ हुए अन्याय की ख़बरें तक प्रकाशित न हो सकीं. सुप्रीम कोर्ट ने तब भी इस सम्बंध में सिर्फ़ इतना ही कहा था कि हमारे पास जजों के ख़िलाफ़ ऐसे मामलों की जांच करने की प्रभावी व्यवस्था नहीं है.

यह कहने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने तब फली एस नरीमन और पीपी राव जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं का एक पैनल बनाया था. इस पैनल को यह ज़िम्मेदारी दी गई थी कि जजों पर यौन शोषण के आरोपों की जांच के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए. इस पैनल ने अपनी रिपोर्ट जमा भी करवा दी थी. लेकिन यह रिपोर्ट कितनी प्रभावी रही इसका अंदाज़ा मौजूदा मामले से लगाया जा सकता है.

न्याय का एक सिद्धांत कहता है कि ‘न्याय सिर्फ़ होना नहीं चाहिए बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए.’ विशेष तौर से जब मामला देश की सर्वोच्च अदालत और उसके सर्वोच्च पदाधिकारी से जुड़ा हो तब तो इस सिद्धांत पर और भी बारीकी से अमल किया जाना चाहिए. लेकिन जब आरोपित ही मामले की सुनवाई करे, पीड़ित महिला के बिना ही सुनवाई पूरी कर ली जाए और उसकी रिपोर्ट को गोपनीय बनाकर आरोपित को क्लीन चिट दे दी जाए तो न्याय किसी को दिखेगा कैसे?