2004 से सक्रिय राजनीति में आए राहुल गांधी के शुरुआती दस साल के कामकाज को देखते हुए उनके बारे में जो नकारात्मक छवि बनी, उस पृष्ठभूमि में लंबे समय से कांग्रेस के अंदर यह मांग उठती रही कि उनकी छोटी बहन प्रियंका गांधी को राजनीति में सक्रिय होना चाहिए. कहा जाता था कि प्रियंका गांधी बोलने के मामले में राहुल से बेहतर हैं और वे इंदिरा गांधी की याद भी दिलाती हैं, इसलिए वे राजनीति में अपने भाई से अधिक सफल साबित होंगी.

इसके बावजूद जब प्रियंका गांधी राजनीति में स​​क्रिय नहीं हुईं तो इसकी वजह से उनकी मां सोनिया गांधी पर दबी जुबान में ही सही पर तरह-तरह के आरोप लगे. कहा गया कि वे अपने बेटे राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी में भेद कर रही है. कहा गया कि सोनिया गांधी को डर है कि प्रियंका गांधी राहुल को पीछे छोड़ देंगी, इसलिए उन्हें राजनीति में नहीं लाया जा रहा है. बाद में जब प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उनके राजनीति में सक्रिय नहीं होने की बड़ी वजह के तौर पर रॉबर्ट वाड्रा का नाम लिया जाने लगा.

लेकिन लोकसभा चुनावों के ठीक पहले प्रियंका गांधी को कांग्रेस पार्टी की महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी बना दिया गया. राजनीति में उनके आगमन की खबर को लेकर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ-साथ मीडिया का एक बड़ा तबका भी खासा उत्साहित था. प्रियंका गांधी जहां भी गईं, उन्हें देखने और सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग आए. इस शुरुआती उत्साह को देखकर फिर से कई राजनीतिक जानकारों ने यह कहना शुरू कर दिया कि धीरे-धीरे प्रियंका गांधी अपने भाई राहुल गांधी को छोड़कर कांग्रेस की राजनीति में सबसे प्रमुख भूमिका में आ जाएंगी.

23 जनवरी, 2019 को प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव नियुक्त किया गया था. तब से तकरीबन साढ़े तीन महीने का वक्त गुजरा है. इस दौर में प्रियंका गांधी ने कई सभाएं की हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश में काफी राजनीतिक यात्राएं भी की हैं. वे लगातार रोड शो भी कर रही हैं. चलते-चलते मीडिया से एकाध बार उन्होंने बातचीत भी की है. ट्विटर पर भी वे सक्रिय हैं. अपने वीडियो बयान भी जारी करती हैं. इस दौरान राहुल गांधी ने भी लगातार रैलियां की हैं और पिछले कुछ दिनों में कई साक्षात्कार भी दिये हैं. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान सार्वजनिक तौर पर जो कहा है और जिस तरह से राजनीतिक मुद्दों को उठाया है, उन पर अगर ध्यान दें तो ऐसा लगता है कि राजनीति के लिए प्रियंका गांधी को राहुल गांधी से ज्यादा योग्य मानने वाली तमाम लोगों राय शायद सही नहीं है.

इस लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान या मीडिया से बातचीत के दौरान जो राहुल गांधी दिख रहे हैं, उनमें और 2014 के राहुल गांधी में काफी फर्क है. हाल के दिनों में जो साक्षात्कार उन्होंने दिए हैं, उनमें वे बहुत ही चतुराई और मजबूती से तथ्यों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पूरी सफलता के साथ घेरते हुए दिखते हैं. कांग्रेस और खुद को परेशान करने वालों सवालों का जवाब भी वे बगैर खीझे दे रहे हैं. उन्होंने इंटरव्यू देने के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के ख​बरिया चैनलों के अलावा इंडिया टुडे जैसे प्रिंट प्रकाशनों को भी चुना. उनके इंटरव्यू नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू की तरह एक ‘इवेंट’ नहीं बल्कि सामान्य हालात में लिये गये सामान्य साक्षात्कार दिख रहे हैं.

इन सब में राहुल गांधी अपनी बातचीत से राजनीतिक विमर्श को एक अलग स्तर पर ले जाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. इंडिया टुडे के इंटरव्यू में उनसे नेतृत्व के बारे में सवाल में पूछा गया. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि नेतृत्व कोई स्थूल चीज नहीं है, बल्कि यह चुनौतियों के साथ बदलती रहती है. उन्होंने कहा कि नेतृत्व की जो शैली पांच साल पहले सही थी, संभव है कि अभी वह शैली प्रासंगिक नहीं हो. इसी तरह का जवाब उन्होंने खुद के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं पर भी दिया.

राहुल गांधी अपने राजनीतिक संवादों में संतुलन के साथ-साथ आक्रामकता का भी बेहद चतुराई से मिश्रण कर रहे हैं. एक तरफ वे भारतीय जनता पार्टी की शैली में नरेंद्र मोदी पर निजी हमले नहीं करते तो दूसरी तरफ रफाल लड़ाकू विमानों के मसले पर मोदी सरकार के खिलाफ लगातार हमलावर रुख अपनाए हुए हैं. वे अपने किसी भी इंटरव्यू में इसका जिक्र करने से बाज नहीं आते और न ही अपनी सभाओं में इस सौदे से संबंधित एक विवादास्पद नारा लगवाने से चूकते हैं. ‘चौकीदार चोर है’ का यह नारा उच्चतम न्यायालय के हवाले से एक जगह बोलने पर भले ही उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से बगैर शर्त के माफी मांग ली हो लेकिन वे लगातार यह नारा हर जगह लगवा रहे हैं.

राहुल गांधी के राजनीतिक बयानों के संदर्भ में प्रियंका गांधी को देखें तो वे अक्सर कम बोलती हैं. ट्विटर पर अकाउंट बनाने के बाद पहला ट्वीट करने में उन्हें कई दिन लगे. ऐसे ही सभाओं में भी वे अपेक्षाकृत कम देर बोलती हैं और उसमें भी उनकी शैली भाषण वाली नहीं बल्कि संवाद वाली रहती है. उनकी बातचीत में भावनाओं को उभारने की कोशिश अधिक दिखती है. जैसे हाल ही में नरेंद्र मोदी ने उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को ‘भ्रष्टाचारी नंबर वन’ कहा. इस बयान को प्रियंका गांधी ने अमेठी में वहां के लोगों के अपमान के तौर पर पेश करने की कोशिश की. बहुत भावुक होकर उन्होंने अपनी सभाओं में लोगों से यह बात कही.

प्रियंका गांधी की भावनात्मक अपीलों का कितना असर लोगों पर होगा, यह तो चुनावों के नतीजों से ही पता चल पाएगा. राहुल गांधी के उलट प्रियंका गांधी अभी मीडिया से उतना व्यापक संवाद नहीं कर रही हैं. इससे कठिन सवालों का सामना करने की उनकी ​क्षमता अभी देखी जानी है. वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उनके चुनाव लड़ने की चर्चा जोर-शोर से चली. अगर वे वहां से चुनाव लड़तीं तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर अधिक बोलना पड़ता. तब उनकी और राहुल गांधी की वाक क्षमता की सही ढंग से तुलना हो सकती थी.

लेकिन प्रियंका गांधी की साढ़े तीन महीने की राजनीतिक सक्रियता में अब तक कहीं से यह नहीं लग रहा है कि वे राहुल गांधी को उतनी आसानी से पीछे छोड़ सकती हैं जैसा पहले उनके बारे में माना जा रहा था. बल्कि आज राहुल गांधी में एक अलग ही तरह का आत्मविश्वास नजर आ रहा है. संभव है कि चुनावी नतीजे इसके बिल्कुल उलट आएं. लेकिन अभी के हालात में वे पूरे आत्मविश्वास के साथ कांग्रेस को नेतृत्व देते नजर आ रहे हैं.

कुछ कांग्रेसी नेताओं से बातचीत करने पर राहुल गांधी की सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति के बारे में भी पता चलता है. ये लोग यह भी बताते हैं कि प्रियंका गांधी भी ऊपर से भले सहज दिखती हैं लेकिन उन तक पार्टी के किसी भी नेता की पहुंच नहीं है. कांग्रेस में कोई भी नेता दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह प्रियंका गांधी का खास है. कुछ नेता खुद को उनका खास दिखाने की कोशिश मीडिया के अपने मित्रों के जरिए कर जरूर रहे हैं लेकिन इसका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है.

पार्टी नेताओं का यह भी कहना है कि हो सकता है कि प्रियंका गांधी में भी समय के साथ पार्टी के दूसरे नेताओं से घुलने-मिलने की सहजता आए. लेकिन अभी स्थिति यह है कि पार्टी के नेता राहुल गांधी के साथ अधिक सहज हैं. यही स्थिति इन दोनों लोगों की निजी टीम में काम करने वाले लोगों की भी है. इनका कहना है कि प्रियंका के मुकाबले राहुल गांधी के साथ काम करना अधिक सहज है.

इन बातों के आधार पर कांग्रेस के कई नेताओं का यह डर और कई लोगों का यह दावा निराधार साबित होता लगता है कि प्रियंका गांधी के राजनीति में आने पर वे अपने भाई राहुल गांधी को नेपथ्य में कर देंगीं और खुद पार्टी में प्रमुख भूमिका में आ जाएंगी. इसके उलट पार्टी पर पकड़ और उसे नेतृत्व देने के मोर्चे पर राहुल गांधी पहले के मुकाबले अधिक मजबूत स्थिति में दिख रहे हैं. उनकी यह मजबूत स्थिति केंद्र की सत्ता में कांग्रेस की वापसी करा पाएगी या नहीं, यह 23 मई को ही पता चल पाएगा.