पिछले दिनों आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) से जुड़ी ऐसी दो ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. इनमें से पहली तो यही है कि इस संगठन ने छोटे से समुद्री देश श्रीलंका में ताबड़तोड़ धमाके किए. और दूसरी यह कि हफ्ते भर बाद ही आईएस के सरगना अबू बकर अल-बगदादी का एक वीडियो सामने आ गया. इस वीडियो को लेकर सबसे हैरानी की बात यह थी कि बीते पांच सालों से दुनिया की किसी भी खुफिया एजेंसी को बगदादी बारे में कोई जानकारी नहीं थी. वहीं इन सालों में कई बार उसके मारे जाने के दावे भी किए गए.

बगदादी का सामने आना और आईएस द्वारा पिछले कुछ महीनों में अलग-अलग देशों में किए गए हमले साफ़ संकेत हैं कि इस आतंकी संगठन की ताकत अब भी बरकरार है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इराक और सीरिया में तमाम देशों द्वारा चलाए गए सैन्य अभियानों के बाद भी इसकी ताकत बरकरार कैसे है. सवाल यह भी है कि दुनियाभर की एजेंसियों को चकमा देकर यह संगठन इतने बड़े हमलों की तैयारी कैसे कर लेता है. आईएस की गतिविधियों पर नजर रखने वाले जानकार कई ऐसी बातें बताते हैं जिससे इसके बचे रह जाने की वजह के साथ-साथ इस आतंकी संगठन की वर्तमान स्थिति का भी पता चलता है.

बीती जनवरी में सीरियाई सेना ने आईएस के कब्जे वाले आखिरी शहर बगहोज से इस संगठन का सफाया किया. इस दौरान बगहोज में मौजूद रहे सीएनएन के वरिष्ठ संवाददाता बेन वेसमेन लिखते हैं कि जिस तरह से जंग हुई उसमें आईएस के लड़ाकों को मैदान से भागने का काफी मौका मिला क्योंकि यह इलाका काफी फैलाव लिए है. जबकि इसे घेरने के लिए सैन्य टुकड़ियों की संख्या पर्याप्त नहीं थी. संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में आईएस के मामलों की समिति के सदस्य एडमंड फिटन-ब्राउन एक साक्षात्कार में बताते हैं कि कम से कम से 50 फीसदी आतंकी ईराक और सीरिया से भागने में कामयाब हुए हैं. ये जानकार यह भी बताते हैं कि आईएस की खिलाफत (एक इस्लामिक राज्य जिसका प्रमुख खलीफा कहलाता है) के मुख्य शहर रक्का और मोसुल पर जैसे ही संगठन का कब्जा हटा इसके ‘आका’ लोग अचानक गायब हो गए, और फिर उनका कोई पता नहीं लगा.

कुछ जानकार बताते हैं कि 2017 से इस संगठन ने एक नई रणनीति अपनाई है जिसके तहत इसके लड़ाके अलकायदा की तरह छोटे-छोटे गुटों में काम करते हैं. आईएस ने केवल इराक और सीरिया में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया यह रणनीति अपना रखी है. हाल ही में यूएन की एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि इराक और सीरिया में आईएस ने अब प्रांतीय स्तर पर संगठन की शाखाएं स्थापित कर ली हैं जिसकी जिम्मेदारी अंडर ग्राउंड हुए नेता संभाल रहे हैं. यह स्थिति पहले से खतरनाक बताई जा रही है क्योंकि किसी आतंकी संगठन की इस संरचना को खत्म करना ज्यादा मुश्किल है.

बताते हैं कि इसी वजह से पिछले दिनों बेहद सुरक्षित माने जाने वाले सीरिया के पलमिरा और मनविज में आईएस कई आत्मघाती हमले करने में कामयाब रहा. इसके अलावा सुन्नी मुसलमानों की बहुलता वाले क्षेत्रों में शिया सैन्य बलों और लोगों के बीच भी कुछ झड़पें देखने को मिली हैं. इसक पीछे भी आईएस का ही हाथ माना जा रहा है.

इराक और सीरिया में लंबे वक्त तक रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की मानें तो इन देशों से भागे सबसे ज्यादा आतंकियों ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बलूचिस्तान में शरण ली है और ये यहां से अपनी गतिविधियों को अंजाम देते हैं. इसके अलावा एक ठीक-ठाक संख्या में आतंकी लीबिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, मिस्र, सऊदी अरब, जॉर्डन और फिलीपींस भी गए हैं. खुफिया एजेंसियों का यह भी कहना है कि आईएस भारत में भी हिंदू-मुस्लिम तनाव का फायदा उठाने की कोशिशों में लगा हुआ है.

‘संदेश अभी भी बरकरार’

यूएन से जुड़े जानकार एडमंड फिटन-ब्राउन बताते हैं कि भले ही आईएस की खिलाफत का अंत हो गया हो, और उसके लड़ाकों को इलाका छोड़कर भागना पड़ा हो. लेकिन, यह आतंकी संगठन अपने इन लड़ाकों को ये संदेश देने में कामयाब रहा है कि दुनिया में कहीं भी रहो, आईएस के मकसद को कामयाबी दिलाने के लिए लगे रहो. करीब दो साल पहले संगठन के सरगना बगदादी ने एक ऑडियो संदेश जारी किया था. इसमें उसका अपने लड़ाकों से साफ़ कहना था, ‘इराक और सीरिया में खिलाफत का अंत हो गया है, किसी और दिन लड़ने के लिए अभी खुद को बचाओ, दुनिया में कहीं भी रहो, हमें अपने मकसद को याद रखना है, उसके लिए कोशिश करते रहना है,’

बीते साल एक ड्रोन हमले में मारे गए आईएस के प्रवक्ता अबू मोहम्मद अल-अदनानी ने भी मरने से पहले अपने एक संदेश में कहा था, ‘खिलाफत का अंत हमारे संगठन का अंत नहीं करेगा, इराक और सीरिया में हो रही हार, हमारी लड़ने की इच्छा को खत्म नहीं करेगी.’

फिटन-ब्राउन यह भी बताते हैं कि पूरी दुनिया में आईएस के लड़ाकों का नेटवर्क बना हुआ. इंटरनेट के जरिये चरमपंथी प्रचारकों की एक पूरी फ़ौज को मोर्चे पर लगाया गया है. इन प्रचारकों का एक ही काम है कि पूरी दुनिया में आईएस के लड़ाकों को आपस जोड़े रहना और उनके अंदर कट्टरता को कम न होने देना.

एडमंड फिटन-ब्राउन कहते हैं, ‘आईएस का नेतृत्व कमजोर हो गया है, संचार बाधित हुआ है, लेकिन संदेश अभी भी बरकार है...मेरा मानना है कि जल्द ही आईएस के और हमले देखने को मिलेंगे.’

आईएस की फंडिग कम हुई, लेकिन प्रबंधन अभी-भी तगड़ा है

संयुक्त राष्ट्र की आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने वाली समिति से जुड़े जानकारों की मानें तो आईएस की एक बड़ी ताकत उसके पैसे का मैनेजमेंट भी है. यूएन के अनुमान के हवाले से ये लोग जानकारी देते हैं कि इस समय आईएस की संपत्ति घटकर पांच मिलियन डॉलर (तीन अरब रुपए) से 30 मिलियन डॉलर (करीब 21 अरब रुपए) के बीच बची है और इसमें काफी गिरावट आई है. लेकिन उसका वित्तीय प्रबंधन अभी भी अच्छा है. एडमंड फिटन-ब्राउन कहते हैं, ‘आईएस ने बड़ी चालाकी से अपने पैसे को वैध व्यवसायों में निवेश किया, बैंकों और मनी लॉन्डरिंग जरिए पैसे को इराक और सीरिया से बाहर भेजा. पैसों को सोने और हीरों के जरिये बाहर ले जाया गया है.’

कभी अलकायदा में शामिल रहे आइमन डीन, जो अब ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों के लिए काम करते हैं, सीएनएन को दिए एक साक्षात्कार में बताते हैं, ‘आईएस के पास पैसा अभी भी है, उनका गजब का मैनेजमेंट है, अब आप देखिये श्रीलंका अटैक में कम से कम 30 हजार डॉलर (21 लाख रुपए) खर्च आया होगा और संगठन इसे मैनेज करने में कामयाब रहा.’

वे आगे कहते हैं, ‘इसी तरह कुछ हफ्ते पहले आईएस ने सऊदी अरब में एक हमला किया. इसकी जांच ने अधिकारियों के होश उड़ा दिए. उन्हें पता चला कि आतंकियों ने वहां अपना नेटवर्क चलाने के लिए एक नयी इमारत तक बना ली थी जिसके निर्माण में लाखों डॉलर लगे होंगे, और बड़ी मात्रा में जो हथियार और रकम बरामद हुई वह अलग.’ डीन के मुताबिक इससे साफ़ पता लगता है कि आईएस पूरी दुनिया में बड़ी आसानी से पैसे इधर-उधर करता है और एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लग पाती.