छह मई को सुप्रीम कोर्ट की एक आतंरिक जांच समिति ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को यौन उत्पीड़न के आरोपों से क्लीन चिट दे दी. रंजन गोगोई पर ये आरोप सुप्रीम कोर्ट की ही एक पूर्व कर्मचारी ने लगाए थे. इसके एक दिन बाद स्क्रोल.इन, द कारवां और द वायर के संवाददाताओं ने 35 वर्षीय इस शिकायतकर्ता से बात की. इस बातचीत के संपादित अंश:

जिस दिन आपके यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़ी यह खबर आई, उसी दिन जस्टिस रंजन गोगोई ने एक बेंच बना दी और कहा कि यह उनकी कुर्सी को अस्थिर करने की साजिश है. आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

मैं किसी साजिश का हिस्सा नहीं हूं. जो भी मैंने अपने हलफनामे में कहा है, उसके समर्थन में मैंने सबूत भी दिए हैं. उन्होंने मेरे चरित्र पर सवाल उठाए, यह कहकर कि मेरी आपराधिक पृष्ठभूमि रही है. वे एक ऐसे मामले के आधार पर यह कह रहे थे जो 2016 में ही खत्म हो गया था.

जब ये साफ हो गया कि उन मामलों में कुछ नहीं था तो दूसरे आरोप लगाए जाने लगे. इस तरह की बातें कही जाने लगीं जैसे मेरा अनिल अंबानी से कोई रिश्ता हो. मुझे पता नहीं ये चीजें कहां से आ रही हैं. हलफनामा दायर करते हुए मुझे अंदाजा नहीं था कि इस तरह की कहानियां बनाई जाएंगी.

जब आपने हलफनामा दायर किया तो आपको किस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद थी?

मुझे लगा था कि उनको सच्चाई तो दिखेगी. क्योंकि जो भी उस हलफनामे को पढ़ेगा उसे पता चल जाएगा कि मेरे और मेरे परिवार के साथ क्या हुआ. मुझे लग रहा था कि इंसाफ मिलेगा. लेकिन आज आप देख रहे हैं कि क्या हुआ. ये समिति कह रही है कि मेरे हलफनामे में दम नहीं है जबकि मैंने पूरे सबूत दिए हैं.

क्या आप हमें जस्टिस एसए बोबड़े समिति के बारे में बता सकती हैं?

जिस दिन मुझे नोटिस मिला उसी दिन से मैं उनसे प्रार्थना कर रही थी कि कार्रवाई के दौरान मुझे अपना एक सपोर्ट परसन (मदद के लिए एक शख्स) लाने दिया जाए, इस प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग हो और कार्रवाई विशाखा गाइडलाइंस के हिसाब से चले. उन्होंने ये तक नहीं किया. उन्होंने सिर्फ जस्टिस रमन्ना वाली शिकायत पर गौर किया क्योंकि मैं जानती थी कि उनकी जस्टिस गोगोई के साथ काफी घनिष्ठता है. (इसके बाद जस्टिस रमन्ना खुद तीन सदस्यीय समिति से बाहर हो गए थे, उनकी जगह जस्टिस इंदु मल्होत्रा को शामिल किया गया था.)

मैंने उनसे कहा कि मैं दायें कान से सुन नहीं सकती, कभी-कभी मैं बाएं कान से भी नहीं सुन पाती. सुनवाइयों के दौरान वे मुझसे पूछते, ‘आप समझ रही हैं?’ मैं कहती, ‘लॉर्डशिप, क्या आप अपनी बात दोहरा सकते हैं?’ मैं डर जाती थी. कितनी बार उनसे यही बात कहती. ये भी एक वजह थी कि मैं सपोर्ट परसन मांग रही थी. लेकिन उन्होंने इसकी इजाजत नहीं दी.

जब मैं सुनवाई के लिए पहुंची तो तीन-चार पुलिसकर्मियों ने मेरी इस तरह तलाशी ली जैसे कि मैं कोई आतंकवादी हूं. उन्होंने हर चीज की तलाशी ली. मझसे बाल और कपड़े खलुवाए और बहुत रुखाई से जांच की. मैं रो रही थी, चिल्ला रही थी. इसके बाद वृंदा (ग्रोवर) मैम आईं. तब मुझे अंदर भेजा गया.

पहले ही दिन उन्होंने (जजों) कहा, यह यौन उत्पीड़न से जुड़ी समिति नहीं है, ये विभागीय सुनवाई नहीं है और ये कोई आंतरिक सुनवाई भी नहीं है. उन्होंने कहा कि वे मुझे आश्वस्त कर सकते हैं कि आगे मुझे कोई नुकसान नहीं होगा. जस्टिस बोबड़े का कहना था, ‘आपको अपनी नौकरी वापस मिल जाएगी.’ इस पर मैंने कहा, ‘नहीं लॉर्डशिप, मुझे मेरी नौकरी वापस नहीं चाहिए. मुझे न्याय चाहिए. मैं ये सब अपनी नौकरी वापस पाने के लिए नहीं कर रही.’

मैंने कहा, ‘माननीय न्यायाधीशों, मैं उस दिन से शुरू करती हूं जिस दिन मैंने सुप्रीम कोर्ट की नौकरी ज्वाइन की थी.’ और मैंने जस्टिस गोगोई से जुड़ी हर चीज बताई. पहला दिन ऐसे गुजरा. मैंने हर चीज बताई. उन्होंने मुझसे कहा, ‘आपको मीडिया से बात नहीं करनी है. आपको पता है वे किस तरह के लोग होते हैं, मीडिया वाले.’ उनका ये भी कहना था कि मुझे इस बारे में वकीलों से भी बात नहीं करनी चाहिए, यहां तक वृंदा मैम से भी नहीं.

इसके बाद मुझे 29 अप्रैल को आने को कहा गया.

वकीलों से बात नहीं करनी है, ऐसा किसने कहा था आपसे?

जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने.

उन्होंने ऐसा क्यों कहा?

पता नहीं. उन्होंने कुछ ऐसी बात कही थी कि एडवोकेट ऐसे ही होते हैं. पहले दिन सब बहुत अनौपचारिक था. ऐसा लग ही नहीं रहा था कि वे वास्तव में मामले की जांच करने वाले हैं. लग रहा था जैसे वे बस मामला निपटाने की कोशिश कर रहे हैं. कि कहीं कुछ हो और मामला खत्म हो जाए.

आपको ऐसा क्यों लगा कि जांच समिति की कार्रवाई अनौपचारिक थी?

क्योंकि वे कह रहे थे कि ये कोई आंतरिक प्रक्रिया नहीं है, कोई विभागीय जांच नहीं है, न ही ये कोई यौन उत्पीड़न समिति है. तो मुझे लगा कि फिर ये क्या है?

किसने कहा था ये?

जस्टिस बोबड़े ने. उन्होंने कहा कि वे सब यहां बस मेरी शिकायत पर काम करने के लिए आए हैं.

सुनवाई के पहले दिन के बाद आपने जांच समिति को एक चिट्ठी लिखी थी. इसमें आपने लिखा कि आपको सुनवाई का माहौल डराने वाला लगा.

पहले दिन उन्होंने कहा कि यह कोई यौन उत्पीड़न समिति नहीं है. लेकिन दूसरे दिन, मेरी चिट्ठी पढ़ने के बाद उनका व्यवहार पूरी तरह से बदल गया. अब वे सख्त हो गए, सवालों और मेरे हलफनामे पर खास जोर देने लगे. पहले उन्होंने पूछा कि यह कैसे हुआ, कब हुआ. लेकिन एक सवाल पर उनका बहुत जोर था. वह यह कि मैंने इतने समय बाद अभी शिकायत क्यों की. मैंने इसका जवाब दिया. लेकिन उन्होंने इस पर गौर ही नहीं किया. वे कहने लगे कि ऐसे नहीं होता, वैसे नहीं होता. इसके बाद फिर मैंने उन्हें एक चिट्ठी लिखी कि मुझे अपनी सहायता के लिए अपने साथ एक व्यक्ति को लाने की इजाजत दी जाए. क्योंकि मुझे पता नहीं था कि क्या-क्या रिकॉर्ड किया जाने वाला है.

क्या आप बता सकती हैं तीनों जजों का बर्ताव कैसा था?

ज्यादातर सवाल जस्टिस बोबड़े ने पूछे थे. जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने भी. लेकिन जस्टिस इंदिरा बनर्जी कार्रवाई में ज्यादा हिस्सा नहीं ले रही थीं.

आपको उनके सामने सहज महसूस हुआ?

पहले दिन मैं थोड़ा सहज सहज थी क्योंकि वे मुझे आश्वस्त करने की कोशिश कर रहे थे. ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि इस मामले को आगे बढ़ाने का तरीका यह नहीं है. उनका कहना था, ‘ओह, आपने ये शिकायत प्रशांत भूषण सर से मिलने के बाद की है. वृंदा ग्रोवर से मिलने के बाद की है. तो इन सारी चीजों का सुझाव उन्होंने ही दिया होगा.’ लेकिन ये सही नहीं है. जो मेरे साथ हुआ उसके बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरे पास सच बयान करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. मुझे महसस हुआ कि अब और चुप रहने से काम नहीं चलेगा.

क्या कोई कार्रवाई की रिकॉर्डिंग भी कर रहा था?

एक व्यक्ति था जो बैठकर टाइप कर रहा था. वो स्टेनोग्राफर नहीं था. मैं हर बात बता रही थी. लेकिन जब मैंने बोलना खत्म किया तो जस्टिस बोबड़े ने टाइपिस्ट को बताया कि मैं क्या कह रही थी.

कभी-कभी ऐसा होता है कि आप कानूनी भाषा नहीं समझते. यह भी एक कारण था कि मैं उस कमरे में किसी को अपने साथ रखना चाहती थी.

क्या कुछ ऐसे सवाल भी थे जिनसे आप असहज हुईं?

उन्होंने पूछा, ‘आपने अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ अपील क्यों नहीं की.’ मैंने कहा कि मैं इस संस्थान में वापस नहीं आना चाहती थी. इसके बाद उन्होंने (जस्टिस बोबड़े) ने कहा, ‘नहीं, नहीं आपको अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ अपील करनी चाहिए थी.’ मैंने कहा, ‘लॉर्डशिप, मुझे लगा कि अगर ये अपील सीजेआई के पास जाएगी तो निश्चित रूप से खारिज हो जाएगी.’

जब आपने जजों को अपने साथ 10 और 11 अक्टूबर को हुए यौन उत्पीड़न के बारे में बताया तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?

वे बस सुन रहे थे. उन्होंने सिर्फ एक या तो सवाल पूछे. जैसे कि वक्त क्या था. मैंने उन्हें बताया कि ये सुबह 8.30 से नौ बजे के बीच की बात है. फिर उन्होंने पूछा कि इसके बाद क्या हुआ. एक सवाल यह भी था कि 10 अक्टूबर को आपने जो ड्रेस पहनी थी उसका रंग क्या था. मैंने कहा था कि ये नारंगी रंग की थी और मैंने हरे रंग का दुपट्टा भी डाला हुआ था.

पूछताछ कितनी देर चली?

पहले दिन उन्होंने मुझे दोपहर 12.30 के आसपास बुलाया था. उस दिन ये शाम चार बजे खत्म हुई. दूसरे दिन ये शाम साढ़े चार बजे से साढ़े सात बजे तक चली.

जजों को 30 अप्रैल को लिखी अपनी एक चिट्ठी में, जो आपने सार्वजनिक की थी, आपने लिखा है कि मीडिया ने मुख्य न्यायाधीश को सवाल भेजे थे, लेकिन अदालत की तरफ से सेक्रेटरी जनरल ने प्रतिक्रिया दी. दूसरी चिंता आपने यह जताई थी कि मुख्य न्यायाधीश ने खुद ही एक पीठ बनाई और उसके सामने अपना बचाव किया. जब आपने इन चीजों की बात की तो समिति का क्या कहना था?

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. वे बस मुझे सुन रहे थे. कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे थे.

क्या जस्टिस बोबड़े और समिति में शामिल दो महिला जजों के रवैय्ये में कोई अंतर था?

जस्टिस इंदिरा बनर्जी निष्पक्ष थीं. वे कार्रवाई में ज्यादा हिस्सा नहीं ले रही थीं. जस्टिस इंदु मैम जस्टिस बोबड़े के सवालों के आधार पर कुछ सवाल पूछ रही थीं. आखिरी दिन जब मैं सुनवाई से हटना चाहती थी तो उन्होंने (जस्टिस मल्होत्रा) इसकी वजह पूछी और कहा, ‘तुम अच्छा तो कर रही हो.’ मैंने उनसे कहा, ‘कभी-भी मुझे सवाल समझ में नहीं आते. कभी-कभी मुझे मैं ठीक से नहीं सुन पाती कि आप लोग क्या कह रहे हैं.’ इस पर उनका कहना था, ‘नहीं. तुम बिल्कुल ठीक से जवाब दे रही हो. तुम्हें हर चीज मालूम है. अपने हलफनामे के तथ्यों के बारे में तुम्हें अच्छी तरह से पता है. तुम अच्छा कर रही हो तो हटना क्यों चाहती हो?’ मैं बस यही दोहराती रही कि मुझे अपनी मदद के लिए एक शख्स चाहिए.

जब आपने सुनवाई से हटने की बात कही तो क्या जस्टिस बोबड़े या जस्टिस बनर्जी ने कोई प्रतिक्रिया दी?

जस्टिस बोबड़े कुछ देर खामोश रहे. फिर उन्होंने एक पर्ची पर कुछ लिखा और पर्ची जस्टिस इंदु मैम को दे दी. उन्होंने इसे पढ़ा और जस्टिस बोबड़े बाहर चले गए. उसके बाद जस्टिस इंदु मैम ने मुझसे पूछा कि मैं क्यों हटना चाहती हूं. मैंने कहा कि ये मामला मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ है. वे सबसे ताकतवर शख्स हैं.

जस्टिस बोबड़े वापस कब आए?

पांच मिनट बाद. उन्होंने कहा कि वे बाथरूम गए थे.

इसके बाद वे कुछ बोले?

उन्होंने कहा, ‘हम आपको इस बारे में सोचने के लिए पांच मिनट दे रहे हैं. नहीं तो हम आपके बिना ही सुनवाई आगे बढ़ाएंगे.’ मैंने कहा कि ठीक है, क्योंकि मैं जानती थी कि जिस तरह से वे प्रक्रिया चला रहे थे, सवाल पूछ रहे थे, उससे मुझे न्याय नहीं मिलेगा. वे बस एक ही सवाल पूछ रहे थे कि मैंने शिकायत दर्ज करने में इतनी देर क्यों लगाई. मैंने उन्हें एक संतोषजनक जवाब दिया था. फिर भी वे यही सवाल पूछे जा रहे थे और कह रहे थे कि ऐसे नहीं होता, ऐसे नहीं होता.

आप सीधे बाहर निकल आईं या फिर आपने सवाल पूरे होने के बाद बैठक छोड़ी?

नहीं, मैंने कहा कि मेरी सिर्फ एक प्रार्थना है. मैंने ये चिट्ठी लिखी है. तो उन्होंने वो चिट्ठी पढ़ी. इसके बाद उन्होंने कहा कि आंतरिक प्रक्रिया के नियमों के तहत हम आपको मदद के लिए किसी अन्य व्यक्ति को साथ लाने की अनुमति नहीं दे सकते. इस पर मैंने कहा, ‘लॉर्डशिप्स. अगर ऐसा है तो मैं इस सुनवाई में आगे हिस्सा नहीं ले पाऊंगी.’ इसके बाद उन्होंने कहा कि वे मुझे वकील रखने की अनुमति नहीं दे सकते. इसके बाद ही जस्टिस बोबड़े ने एक पर्ची पर कुछ लिखा था और बाहर चले गए थे.

क्या उन्होंने जांच के दौरान किसी और से भी पूछताछ की?

मुझे पता नहीं. मैंने अपने आपको अलग कर लिया था. उसके बाद मुझे पता नहीं कि उन्होंने किसे बुलाया और किसे नहीं. उन्होंने सिर्फ मुख्य न्यायाधीश को बुलाया जो मुझे अखबारों से पता चला.

अपनी रिपोर्ट में समिति ने कहा कि उन्हें आपके आरोपों में दम नहीं लगा. आपको यह सुनकर कैसा लगा?

मैं पूरी तरह से निराश थी. मुझे धक्का भी लगा. मेरी नौकरी चली गई, मेरा सब कुछ चला गया. मेरे परिवार वालों की नौकरियां चली गईं. इसलिए मुझे लगा कि मेरे और परिवार के साथ बहुत नाइंसाफी हुई है.

मैंने अपना पक्ष सबके सामने रख दिया है. सुप्रीम कोर्ट के हर जज के सामने भी. अब उनकी बारी है. (जांच समिति की) रिपोर्ट पाना मेरा अधिकार है.

क्या आपने उनसे रिपोर्ट की कॉपी मांगी है?

मैंने उन्हें (सात मई को) एक चिट्ठी लिखकर कहा था कि मुझे भी वह रिपोर्ट मिलनी चाहिए.

(यह साक्षात्कार सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन की श्रुतिसागर यमुनान और इप्सिता चक्रवर्ती, द कारवां के अतुल देव और निकिता सक्सेना और द वायर के अजय आशीर्वाद महाप्रशस्त ने लिया था)