शेयर बाजार से फिलहाल आने वाली खबरें निवेशकों के लिए अच्छी नहीं हैं. पिछले आठ कारोबारी सत्रों में बांबे स्टाक एक्सचेंज 1400 से ज्यादा अंकों की गिरावट देख चुका है. इस दौरान निफ्टी भी लगातार लुढ़कता गया है.

शेयर बाजार के गिरने और चढ़ने का गतिशास्त्र बहुत जटिल होता है. दुनिया की अर्थव्यवस्था के बहुत सारे तत्व इसे प्रभावित करते हैं. आर्थिक जानकारों का मानना है कि अमेरिका-चीन के बीच व्यापार युद्ध की आशंका वह सबसे बड़ी वजह है जिसने पूरे एशिया के शेयर बाजारों को प्रभावित किया है. लेकिन, भारतीय शेयर बाजारों में चुनाव के बीचो-बीच इस बड़ी गिरावट का क्या कोई राजनीतिक मतलब भी हो सकता है?

विशेषज्ञों का एक बड़ा खेमा मानता है कि चुनाव के दौरान शेयर बाजार में होने वाली हलचल में सियासी संदेशों का महत्व होता ही है. इनका मानना है कि दुनिया भर की आर्थिक हलचल तो शेयर बाजार को प्रभावित करती ही है, लेकिन चुनावी नतीजों की अनिश्चितता के चलते भी निवेशक भारत में फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं, जिसने बाजारों में बिकवाली का माहौल बना रखा है.

तो क्या शेयर बाजार में बीते दिनों की हलचल का वाकई चुनावी नतीजों से कोई संबंध है? इस सवाल का जवाब खोजना आसान नहीं है. लेकिन, शेयर बाजार की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रखने वालों का कहना है कि इस सवाल पर विचार करने से पहले यह भी गौर करना चाहिए कि बाजार में यह गिरावट पांचवें चरण के चुनाव के बाद तेजी से बढ़ी है. इस चरण के बाद मीडिया में इस बात की चर्चा शुरू हो गई है कि हो सकता है चुनावी नतीजे एक त्रिशंकु संसद बनाएं और देश के नेतृत्व का मौका एक बार फिर क्षेत्रीय दलों के हाथ में आ जाए.

इन रिपोर्टों के अलावा कुछ राजनीतिक गतिविधियों ने भी शेयर बाजार को प्रभावित किया. तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर की केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन से मुलाकात ने इस धारणा को मजबूत किया कि पांचवें चरण के चुनाव के बाद ऐसा लग रहा है कि कोई भी चुनाव पूर्व गठबंधन बहुमत नहीं पाने जा रहा है और सरकार बनाने के लिए जोड़-तोड़ की कोशिशें शुरु हो चुकी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मुलाकात को भी इसी सिलसिले के रुप में देखा गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नवीन पटनायक की तूफान से निपटने के लिए की गई तारीफ को इस नजरिये से देखा गया कि भाजपा को इस बात का एहसास हो गया है कि वह अपने दम पर बहुमत के आंकड़ा नहीं छू पाएगी और उसने एनडीए के लिए नए साथी खोजने शुरु कर दिए हैं.

लेकिन जानकारों की मानें तो इन सूचनाओं के साथ यह भी देखना होगा कि इसी दौरान चीन और अमेरिका के पीछे व्यापार युद्ध को लेकर तल्ख बयानबाजी भी हुई और इसने भी पूरे एशिया के शेयर बाजारों को प्रभावित किया. ऐसे में यह तो नहीं माना जा सकता कि भारतीय शेयर बाजार सिर्फ चुनावी आशंकाओं की वजह से गिरे, लेकिन इससे पूरी तरह इन्कार भी नहीं किया जा सकता. इसलिए कि चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध की तल्खी बढ़ने पर एशिया के बाजार गिरे तो गतिरोध दूर होने की संभावना पर या तो उनमें सुधार हुआ या वे लगभग स्थिर रहे. लेकिन बांबे स्टाक एक्सचेंज और नेशनल स्टाक एक्सचेंज के साथ ऐसा नहीं रहा. पांच मई के बाद हुए आठों कारोबारी सत्रों में इनके सूचकांक में गिरावट दर्ज की गई. ऐसे में इस तर्क से बिल्कुल किनारा भी नहीं किया जा सकता कि चुनावी मैदान से आ रही सूचनायें शेयर बाजार को प्रभावित कर रही हैं.

शेयर बाजार में इस गिरावट की सियासी वजहें इसलिए भी देखी गईं कि 10 मार्च को चुनाव की घोषणा के बाद सेंसेक्स और निफ्टी दोनों कुलांचे भर रहे थे. उस समय चुनाव पूर्व सर्वे और राजनीतिक पंडित मान रहे थे कि मौजूदा भाजपा सरकार अपने दम पर भले ही बहुमत का आंकड़ा न छू पाए, लेकिन एनडीए आसानी से बहुमत का आंकड़ा पार कर लेगा. 10 मार्च से लेकर अप्रैल के आखिर तक सेंसेक्स करीब चार फीसदी बढ़ गया था. लेकिन मई की शुरुआत के साथ यह रुख बदला. 10 मई तक आठ कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स 1400 अंक से ज्यादा लुढ़क गया. जानकार मानते हैं कि चीन-अमेरिका के बीच व्यापारिक तनाव और भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी के संकेत जैसी वजहें इसके पीछे तो हैं ही. लेकिन ये तत्व लंबे समय से निवेशकों के संज्ञान में हैं. इसलिए आम चुनाव के चुनाव नतीजे कैसे होंगे, यह आशंका भी बाजार को प्रभावित कर रही है.

आर्थिक समाचार चैनलों पर भी शेयर खरीददारी को लेकर होने वाले कार्यक्रमों में भी यह सलाह दी जाने लगी है कि 23 मई तक बाजार की चाल अस्थिर रह सकती है और गिरावट का यह दौर चल सकता है. आर्थिक जानकार मानते हैं कि आधे से ज्यादा चुनाव बीत जाने के बाद यह सोच बदली है कि चुनाव परिणाम वैसे ही आएंगे, जैसे सर्वे में बताए जा रहे थे. चुनावी नतीजों को लेकर निवेशक अब पहले की तरह निश्चिंत नहीं है, बल्कि अब उन्हें आशंका घेर रही है. बाजार के जानकारों का एक बड़ा खेमा यह मान रहा है कि चुनाव में भाजपा को नुकसान हो रहा है. लेकिन यह नुकसान कितना बड़ा हो सकता है, इसको लेकर मतभेद हैं.

शेयर बाजार के ग्राफ के सहारे सियासत का तापमान नापने का पुराना चलन है. लेकिन क्या वाकई चुनावी नतीजों की आहट शेयर बाजार पर असर डालती है? इस बारे में तमाम अध्ययन हुए हैं. इनमें से ज्यादातर यह बताते हैं कि लंबी अवधि में शेयर बाजार चुनावी बातों से प्रभावित नहीं होते हैं. लेकिन यह बात निवेश के रिटर्न के बारे में ही सही है. लंबी अवधि के दौरान शेयर बाजार अपने मूल स्वरूप में आ ही जाता है. लेकिन, डेली ट्रेडर्स और कई अन्य तरह के निवेशक इस बात से जरूर प्रभावित होते हैं कि सियासत किस ओर जा रही है. और चुनाव के दौरान यह प्रभाव चरम पर होता है. अगर गुजरात के विधानसभा चुनाव को उदाहरण के तौर पर लें तो जिस दिन वहां के चुनाव नतीजे आ रहे थे, उस दिन केवल कुछ देर के लिए कांग्रेस के भाजपा से आगे निकलने पर सेंसेक्स 400-500 अंक लुढ़क गया था.

अगर बीते लोकसभा चुनावों के दौरान सेंसेक्स की चाल को देखें तो चुनावी आकलन से इसका कुछ अंदाजा दिखता भी है. 2004 में मीडिया से लेकर बाजार तक सब मान रहे थे कि वाजपेयी सरकार फिर वापसी करेगी तो चुनावी तिमाही में सेंसेक्स करीब 17 फीसदी चढ़ा था. लेकिन नतीजे उलट आए और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने सरकार बनाई. मीडिया की तरह शेयर बाजार भी मतदाताओं के मिजाज को पढ़ने में असफल रहा.

लेकिन, 2009 में ऐसा नहीं हुआ. उस साल चुनावी तिमाही में ज्यादातर लोग यूपीए सरकार की वापसी का अंदाजा लगा रहे थे. इस आकलन के बीच चुनावी तिमाही में सेंसेक्स 49 फीसद चढ़ा. हालांकि, इस बार निवेशकों-बाजार का अनुमान सही निकला और कांग्रेस सरकार की वापसी हुई. 2014 की चुनावी तिमाही में सेंसेक्स 13 फीसद चढ़ा, लेकिन इस बार बाजार का मिजाज बदलाव के साथ था और भाजपानीत गठबंधन की जीत की संभावना के चलते यह बढ़त दर्ज की गई थी.

जाहिर है कि चुनावी आकलन और सेंसेक्स-निफ्टी की गति में बहुत सीधा रैखिक संबंध भले न हो, लेकिन राजनीतिक आकलन इस संवेदी सूचकांक को प्रभावित तो करते ही हैं. चुनाव की घोषणा और शुरुआती चरणों में चुनाव के बाद बढ़ते शेयर बाजार को भाजपा के लिए अच्छा संकेत के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन पांचवें चरण के चुनाव के बाद लगातार गिरावट को उसके लिए अच्छी खबर नहीं माना जा रहा है. हालांकि मतदाता ने वाकई किसे जनादेश दिया और शेयर बाजार उसे कितना भांप सके, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा.