हिंदी सिनेमा के इतिहास में पहली बार राजनीतिक ध्रुवीकरण का इतना गहरा असर देखने को मिला है. बॉलीवुड प्रो-मोदी और एंटी-मोदी खेमों में साफ तौर पर बंट चुका है. सत्ता प्रतिष्ठान के करीब रहने के लिए अक्षय कुमार जैसे सुपरस्टार से लेकर अनुपम खेर और परेश रावल जैसे जहीन कैरेक्टर एक्टर तक, और आउट ऑफ वर्क विवेक ओबरॉय से लेकर नयी-नयी प्रचंड राष्ट्रवादी बनीं कंगना रनोट तक मोदी सरकार की वाहवाही करने के कोई मौके नहीं छोड़ रहे हैं.

कई सारे फिल्मकार ऐसे भी हैं जो बिना विश्राम ट्विटर पर मोदी-प्रेम का प्रदर्शन करते मिलते हैं. ये ढूंढ़-ढूंढ़कर उन सेलिब्रिटीज को तकरीबन रोज ही ट्रोल करते हैं जो उनकी हां में हां मिलाने वाले नहीं होते, और जिनकी विचारधारा उनकी दक्षिणपंथी सोच से मेल नहीं खाती.

2014 के बाद से यह चलन देखने में आया है कि मोदी सरकार के समर्थन में सार्वजनिक मंचों पर खुलकर वाहवाही करने वाले फिल्मी सितारों को तरह-तरह के पुरस्कारों से नवाजा जाता रहा है. कभी पुणे स्थित एफटीआईआई को गजेंद्र चौहान से लेकर अनुपम खेर तक के हाथों में सौंप दिया जाता है तो कभी सेंसर बोर्ड को पहलाज निहलानी से लेकर मोदी-प्रेम में आकंठ डूबे प्रसून जोशी के हवाले किया जाता है.

सबको देशभक्ति के कठघरे में खड़ा करने वाली भाजपा कनाडा की नागरिकता रखने वाले और भारतीय चुनावों में वोट नहीं देने वाले सुपरसितारे को देशभक्ति का आईकॉन बताती है और उनकी रचित सोशल-ड्रामा फिल्मों को (‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ तथा ‘पैडमैन’) नमो टीवी पर प्रसारित करने की ख्वाहिश रखती है. अक्षय कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी 2017 में मोदी सरकार द्वारा ही दिया जाता है. ‘दंगल’ के आमिर खान को किनारे कर जब ऐसा अति-सम्मानित पुरस्कार ‘रुस्तम’ जैसी अति साधारण फिल्म में किए अति साधारण अभिनय के लिए मिलता है, तो सवाल उठने लाजमी हैं.

दूसरी तरफ, मोदी सरकार की विचारधारा से सहमति नहीं रखने वाली फिल्मी हस्तियां लंबे वक्त तक खामोश रहने के बाद अब लगातार मुखर हो रही हैं. ट्विटर पर ऐसा होते हुए रोज देखा जा सकता है, जहां अनुराग कश्यप से लेकर रिचा चड्ढा तक अपनी लॉजिकल बात रखने के साथ-साथ दक्षिणपंथी ट्रोल्स का खुलकर सामना कर रहे हैं. वरुण ग्रोवर अपनी मारक स्टैंड-अप कॉमेडी के माध्यम से लगातार स्टैंड ले रहे हैं.

कुछ 600 फिल्मी हस्तियों ने भाजपा के खिलाफ वोट करने के लिए लोगों से अपील की है और इनमें नसीरुद्दीन शाह, गिरीश कर्नाड, अमोल पालेकर से लेकर कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, मकरंद देशपांडे और अनुराग कश्यप जैसे ख्यात नाम शामिल हैं. अभिनेता मानव कौल भी सार्वजनिक तौर पर अपना विरोध दर्ज कर चुके हैं और विशाल भारद्वाज भी ट्विटर पर नपे-तुले शब्दों में भाजपा की आलोचना करते रहते हैं.

लेकिन फिर भी, मोदी जी को पसंद करने वाली फिल्म इंडस्ट्री की सामूहिक आवाज के आगे उन्हें पसंद नहीं करने वाली हस्तियों की आवाज का उठान कम है. जहां बॉलीवुड का प्रो-मोदी नैरेटिव आक्रामक तरीके से अपनी बात रखता है वहीं एंटी-मोदी नेरेटिव में सामूहिक चेतना का अभाव है. सत्ता विरोधी इस नैरेटिव के पास वे चेहरे भी बेहद कम हैं जो ट्विटर से आगे बढ़कर उन पॉलिटिकल डिस्कोर्स का हिस्सा बनें जो कि सीधे जनता के मानस को प्रभावित करने की काबिलियत रखते हैं.

शायद इसीलिए, 2019 लोकसभा चुनाव में दो फिल्म हस्तियों ने खासतौर पर ध्यान खींचा है. इन्होंने बाकियों से आगे बढ़कर वह किया है जो अमूमन फिल्मी सितारे नहीं करते. हम जानते हैं कि फिल्मी सितारों का ‘पॉलिटिकल एक्टिविज्म’ ज्यादातर ‘लिप-सर्विस’ तक सीमित रहता है और जब कभी आगे बढ़ता भी है तो उसे ‘ऑर्मचेयर एक्टिविज्म’ का दर्जा दिया जाता है. यानी कि ऐसा प्रतिरोध जो अपने कम्फर्ट जोन से बाहर नहीं निकलता.

लेकिन, जावेद अख्तर और स्वरा भास्कर ने इन चुनावों में खुद को केवल ट्विटर पर पॉलिटिकल एक्टिविज्म करने तक सीमित नहीं रखा. हालांकि ये दोनों ही फिल्मी हस्तियां ट्विटर पर प्रतिरोध की आवाज के मौलिक स्वर हैं और न सिर्फ ज्वलंत मुद्दों पर बेबाक और वाजिब ट्वीट्स करते हैं बल्कि दिन-रात पीछा करने वाले ट्रोल को भी– जिनमें कुछ खुद इनकी इंडस्ट्री के जाने-माने नाम होते हैं - बेहद कुशलता से जवाब देते हैं.

लेकिन बावजूद सोशल मीडिया के आरामदायक एक्टिविज्म में महारथ हासिल करने के, ये दोनों हस्तियां इन लोकसभा चुनावों में जनता के बीच जाकर प्रतिरोध की आवाज बन रही हैं और सत्ता प्रतिष्ठान के प्रति अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर रही हैं. ये लगातार टेलीविजन और प्रिंट मीडिया को इंटरव्यू दे रही हैं और सभी माध्यमों पर बेहिचक विरोध दर्ज करा रही हैं. एक जरूरी बात दोनों बार-बार कह रहे हैं कि हिंदुस्तान में अमेरिका की तरह राष्ट्रपति चुनने वाले चुनाव नहीं होते, बल्कि यहां स्थानीय नागरिक उनका सही प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद को वोट देता है न कि सिर्फ एक नाम या चेहरे को.

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 23 मई को आने वाले चुनाव के नतीजों पर इनके इस एक्टिविज्म का सीधा असर देखने को मिलने वाला है.

अप्रैल महीने में जावेद अख्तर बिहार गए थे. वहां उन्होंने बेगूसराय सीट से भाजपा के कट्टर हिंदूवादी चेहरे गिरिराज सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रहे सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार के समर्थन में हाजिरी दी. सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ जोरदार भाषण दिया और अपनी आरामदायक मुंबईया जिंदगी को तजकर शहर-शहर जाकर कट्टरवादी ताकतों की मुखालफत करने की शुरुआत इसी शहर से की.

आज के वक्त में अगर दक्षिणपंथी राजनीति पर कोई विपक्षी नेता तार्किकता के साथ बहस कर लोगों का दिल जीत रहा है तो वे यही कन्हैया कुमार हैं. राहुल गांधी अभी भी टिपिकल कांग्रेसी तरीकों से ही मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करते हैं जबकि कन्हैया का तार्किक तरीका और आज की राजनीति का सबसे उम्दा वक्ता होना सोशल मीडिया तक पर निष्पक्ष लोगों को पसंद आ रहा है. जाहिर बात है कि जब एंटी-नेशनल कहकर अपमानित किए जाने वाले ऐसे नेता को समर्थन देने जावेद अख्तर बेगूसराय चलकर जाएंगे तो वह खबर तो बनेगी ही.

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जावेद अख्तर से पहले स्वरा भास्कर भी बेगूसराय पहुंची थीं और कन्हैया कुमार के समर्थन में प्रचार करने के साथ-साथ जनता से सीधा संवाद भी स्थापित किया था. उनके साथ जिग्नेश मेवाणी जैसे युवा नेता भी थे लेकिन स्वरा और उनके दोस्त फिल्म राइटर हिमांशु शर्मा का वहां होना बॉलीवुड के नए-नवेले सितारों की ‘लिप-सर्विस’ और ‘ऑर्मचेयर एक्टिविज्म’ से बहुत आगे की हिम्मत को बयां कर रहा था. भाषण देने की कोशिशों में उलझती हुई नजर आईं स्वरा के विजुअल्स देखकर (नीचे) यह भी यकीन करना मुश्किल है कि ये नयी अभिनेत्री उसी बॉलीवुड का हिस्सा है जो अपने फायदों के लिए सत्ता प्रतिष्ठान के करीब रहने के लिए प्रसिद्ध हो चुका है. प्रतिरोध के अपने ही स्वर्णिम इतिहास को लगभग भूल चुका है.

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मई महीने में जावेद अख्तर ने भोपाल जाकर मालेगांव ब्लास्ट केस में जमानत पर रिहा भाजपा की भोपाल प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर सिंह के विरोध में भी जनसभा की. उनके खिलाफ भोपाल के एक स्थानीय वकील ने केस तक दायर कर दिया यह कहते हुए कि जावेद अख्तर ने प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ निंदनीय भाषा का इस्तेमाल किया है. लेकिन जावेद साहब डिगे नहीं और कुछ दिन बाद रवीश कुमार के प्राइमटाइम में प्रज्ञा ठाकुर और भाजपा से जुड़ी इतनी गहरी बात कर दी कि आज वह सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है.

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कुछ दिन बाद स्वरा भास्कर भी भोपाल पहुंचीं और उन्होंने भी सांप्रदायिकता की राजनीति करने वालों को आड़े हाथ लिया. राष्ट्रीय टीवी मीडिया में इस घटनाक्रम को कवरेज कम मिला इसलिए लोगों को कम पता चला कि स्वरा का विरोध भी जावेद अख्तर के स्तर का ही कमाल था. कुछ लोगों को लग सकता है कि वे और जावेद अख्तर कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह के समर्थन में भोपाल गए थे, लेकिन इन दोनों की राजनीति को जानने वाले समझ सकेंगे कि ये दिग्विजय सिंह के प्रति उनका समर्थन न होकर प्रज्ञा ठाकुर और हिंदुत्व की कट्टर राजनीति के खिलाफ उनका प्रतिकार ज्यादा था.

भोपाल रैली के दौरान स्वरा केसरिया रंग की साड़ी पहनकर आईं और उन्होंने अपनी साड़ी के रंग को सीधे प्रज्ञा ठाकुर के भगवा पहनावे से जोड़कर मारक राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया - ‘केसरिया रंग पहन लेने से कोई साधु-संत नहीं हो जाता. आज मैंने भगवा साड़ी पहनी है तो क्या मैं साध्वी स्वरा भास्कर हो जाऊंगी!’

आगे के भाषण से उनकी उस राजनीतिक तीक्ष्णता का और पता चलता है जिसे सार्वजनिक तौर पर दर्शाने से आज का बॉलीवुड डरा हुआ है. प्रज्ञा ठाकुर के हेमंत करकरे और बाबरी मस्जिद से जुड़े बयान पर स्वरा का कहना था, ‘ऐसे बयान हिंदुओं और हिंदू धर्म की छवि खराब करते हैं और एक हिंदू होने के नाते मुझे बुरा लगता है कि हमारे धर्म के नाम पर भयानक हिंसा की जा रही है. दुख होता है कि लोग पहले अपराध करते हैं और फिर अपने कुफ्र को छिपाने के लिए जोर-जोर से भगवान राम का नाम लेते हैं. यह हिंदू धर्म का अपमान है और जो लोग इस धर्म को मानते हैं उन्हें इस तरह के व्यवहार पर नाराज होना चाहिए.’ इसे कहते हैं समझदार हिंदू होकर कट्टरवादी हिंदुत्व की आलोचना करने की समझ रखना!

सात मई को स्वरा भास्कर ने पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी के समर्थन में भी रैली की. दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था का चेहरा बदलने वाली आतिशी को जिताने के लिए स्वरा उन्हीं की उपलब्धियां गिनाती नजर आईं और उनमें वही जोशो-खरोश दिखा जो सीपीआई उम्मीदवार कन्हैया कुमार के लिए रैली करते वक्त नजर आया था. पूर्वी दिल्ली की इस सीट पर आतिशी के खिलाफ भाजपा के गौतम गंभीर खड़े हैं जिनकी राजनीतिक योग्यता ट्विटर पर मोदी विरोधियों की आलोचना करना रही है. दो दिन बाद नौ मई को स्वरा ने दक्षिण दिल्ली से आप प्रत्याशी राघव चड्ढा के लिए भी घर-घर जाकर कैंपेन किया.

दिलचस्प है इस बात पर गौर करना कि जावेद अख्तर और स्वरा भास्कर का यह पॉलिटिकल एक्टिविज्म किसी पार्टी की तरफदारी नहीं कर रहा है. फिल्मी हस्तियों को लेकर देखा गया है कि वे एक राजनीतिक पार्टी से लंबे समय तक जुड़े रहते हैं और उसी से उनकी साख बनती है. लेकिन जावेद अख्तर और स्वरा भास्कर की लड़ाई एक विचारधारा के खिलाफ है, और इसके लिए वे कांग्रेस उम्मीदवार से लेकर वामपंथी और आप के उम्मीदवार तक के समर्थन में रैलियां कर रहे हैं. बॉलीवुड के इतिहास में इस तरह की राजनीतिक हिस्सेदारी इससे पहले कभी देखने को नहीं मिली. यदा-कदा जागरूक फिल्मी हस्तियों ने मुख्तलिफ पार्टियों में मौजूद अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया भी है तो इस तरह एक विचारधारा को हराने के लिए शायद कभी कमर नहीं कसी गई.

बॉलीवुड वैसे भी वह इंडस्ट्री रही है जिसने इमरजेंसी के वक्त भी सामूहिक विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई थी. लोकतंत्र के उस काले अध्याय के दौरान (1975-77) जब नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा था तब अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार बिना इमरजेंसी का विरोध किए हुए ‘एंग्री यंग मैन’ बने बैठे थे और ‘शोले’ (1975) व ‘अमर अकबर एंथोनी’ (1977) जैसी सुपरहिट मसाला फिल्मों से देश का दिल बहला रहे थे!

तब न सही, सत्ता के रसास्वादन के लिए ही अब राजनीति में आ रहे फिल्मी सितारों को कम से कम मौजूदा दौर में जावेद अख्तर और स्वरा भास्कर जैसी जिम्मेदार फिल्मी हस्तियों से कुछ सीख लेना चाहिए. पैसा, शोहरत और सत्ता ही सबकुछ नहीं होती.