मध्य प्रदेश की भोपाल संसदीय सीट देश की उन चुनिंदा सीटों में है जो देश भर में लगातार सुर्ख़ियों में हैं. लगभग एक महीने की चुनावी हलचल के बाद अभी 10 मई को इस क्षेत्र में चुनाव प्रचार थमा है. यहां 12 मई को मतदान है. अलबत्ता चुनाव प्रचार के बीच आए उतार-चढ़ाव और उसमें भी आख़िरी चरण में हुई कुछ घटनाओं को अगर आधार बनाएं तो दो बातें स्पष्ट होती हैं. पहली- यहां 23 मई को आने वाला नतीज़ा जो भी हो पर यह काफ़ी नज़दीकी हो सकता है. और दूसरी यह कि शायद इसीलिए 10 साल तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और इस बार भोपाल से लोक सभा चुनाव लड़ रहे दिग्विजय सिंह और उनकी कांग्रेस पार्टी को आख़िर तक भी अपनी जीत का पूरा भरोसा नहीं है.

ऐसा हुआ क्या जिससे दिग्विजय और कांग्रेस के डगमगाते भरोसे की धारणा बनी?

अभी सात मई की बात है. भोपाल के सैफिया कॉलेज मैदान पर तपती दोपहरी में एक दिलचस्प आयोजन हुआ. यहां नामदेव दास त्यागी उर्फ़ ‘कंप्यूटर बाबा’ की अगुवाई में कुछ साधु बाबा अपने चाराें तरफ गोबर के सुलगते उपले (कंडे) रखकर धूनी रमाए बैठे हुए थे. ये दिग्विजय सिंह की जीत की कामना के साथ ‘हठयोग’ नामक महायज्ञ कर रहे थे. यज्ञ-अनुष्ठान में दिग्विजय सिंह भी पत्नी के साथ शामिल हुए.

इसके अगले दिन ‘कंप्यूटर बाबा’ ने साधु बाबाओं और दिग्विजय सिंह को साथ लेकर पुराने भोपाल में रोड शो किया. इसमें ‘भारत माता की जय’ के नारे लगे. और आयोजन में दिलचस्प मोड़ तब आया जब रोड शो के लिए सुरक्षा प्रबंधों में तैनात कुछ पुलिसकर्मियों के गले में कथित तौर पर केसरिया पटका डलवा दिया गया. यह बात ख़ुद उन सुरक्षाकर्मियों ने मानी. हालांकि भोपाल के उप-पुलिस महानिरीक्षक (डीआईजी) इरशाद वली ने तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर दिया. उनकी ओर से बताया गया, ‘जिन सुरक्षाकर्मियों ने ड्यूटी करते हुए गले में केसरिया पटका डाला था वे पुलिस विभाग से संबद्ध नहीं थे. वे रोड शो के आयोजकों की ओर से लाए गए कार्यकर्ता थे.’ अलबत्ता सवाल अब भी अपनी जगह था.

तिस पर ‘कंप्यूटर बाबा’ ने यह ऐलान किया कि वे अगले तीन दिन (मतदान से पहले तक) अपने सहयोगी साधु बाबाओं के साथ भाेपाल शहर में रहकर जनजागरण करेंगे. ताकि दिग्विजय सिंह के पक्ष में हवा बनाई जा सके. हालांकि चुनाव आयोग ने उनके इस ऐलान पर तुरंत संज्ञान लिया. उन्हें नोटिस जारी कर 24 घंटे के भीतर उनसे ज़वाब तलब कर लिया है. क्योंकि उनके इस ‘जनजागरण’ को धर्म के आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिश समझा जा रहा है.

बहरहाल, आगे कोई बात करने से पहले थोड़ी सी पिछली जानकारी नामदेव दास त्यागी के बारे में भी ध्यान में रखी जा सकती है. मसलन- ये वही बाबा हैं जिन्हें पिछले साल तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान सरकार ने राज्य मंत्री का दर्ज़ा दिया था. नर्मदा संरक्षण पर सुझाव देने के लिए बनी पांच सदस्यों की समिति में शामिल किया था. बाबा ने कुछ समय तक इन सरकारी सुविधाओं का लाभ भी लिया. लेकिन जब चुनाव के समय उन्होंने टिकट मांगा तो भाजपा से उनकी अनबन हो गई. और वे कांग्रेस के पाले में खिसक आए. राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी तो उन्हें इसका इनाम मिला और उन्हें नर्मदा, क्षिप्रा, मंदाकिनी नदी न्यास का अध्यक्ष बना दिया गया.

इसके साथ-साथ दिग्विजय सरकारी कर्मचारियों को भी मनाने की कोशिश कर रहे हैं. बीते गुरुवार को ही वे वल्लभ भवन (मंत्रालय), इंदिरा मार्केट में कर्मचारी नेताओं से बात कर रहे थे. यहां उन्होंने कहा, ‘मैंने ऐसा कौन सा पाप कर दिया जो आप (कर्मचारी) मुझसे नाराज़ हैं. मैंने एक बार आपसे माफ़ी मांग ली. एक बार फिर मांग लेता हूं. अगर कर्मचारियों में कोई नाराज़गी है तो मुझे क्षमा करें.’

उधर कांग्रेस भी चुनाव प्रचार के आख़िरी चरण में अचानक ‘अतिसक्रिय’ नज़र आई. मसला- किसानों की कर्ज़ माफ़ी का रहा, जिस पर भाजपा और उसके पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार कह रहे हैं कि प्रदेश के किसानों का कर्ज़ माफ़ नहीं हुआ है. लिहाज़ा इसका ज़वाब देने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी के नेतृत्व में कांग्रेस के नेता राज्य के 21 लाख किसानों की कर्ज़ माफ़ी से जुड़े दस्तावेज़ की गठरियां सिर पर लेकर शिवराज सिंह चौहान के बंगले पर जा धमके. वहां उन्हें वे तमाम दस्तावेज़ सौंपे गए. हालांकि शिवराज तब भी सवाल उठाते रहे कि किसानों को बैंकों की तरफ़ से कर्ज़ वसूली के नोटिस क्यों पहुंच रहे हैं?

फिर इसी मामले में अगली कड़ी तब जुड़ी जब कांग्रेस की ओर से यह ख़ुलासा किया गया कि प्रदेश के जिन किसानों का कर्ज़ माफ़ हो चुका है उनमें शिवराज सिंह चौहान के भाई रोहित सिंह भी शामिल हैं. हालांकि शिवराज ने तुरंत इस आरोप का खंडन किया. आनन-फानन में बुलाई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, ‘मेरे भाई ने कर्ज़ माफ़ी का आवेदन नहीं किया तो वह माफ़ कैसे हो गया.’

रोहित सिंह चौहान भी गुरुवार, नाै मई की शाम दस्तावेज़ लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ के पास पहुंच गए. वहां आपत्ति और शिकायत दर्ज़ कराई. फिर बाहर मीडिया को बताया, ‘मैं करदाता हूं. मुझे पता है कि मैं कर्ज़ माफ़ी योजना के पात्र नहीं हूं. मेरे ऊपर कोई कर्ज़ भी नहीं है. दूसरी बात मैं अंग्रेजी में दस्तख़त करता हूं. जबकि मेरे नाम से कर्ज़ माफ़ी का जो आवेदन दिखाया जा रहा है उसमें मेरे हस्ताक्षर हिंदी में हैं. ज़ाहिर सी बात है कि यह साज़िश है. मैं इसकी शिकायत भोपाल के पुलिस आयुक्त और सीहोर कलेक्टर आदि के पास दर्ज़ करा रहा हूं.’

अगर दिग्विजय और कांग्रेस का भरोसा हिला ताे इसकी वज़ह क्या है?

ग़ौर करने की बात है कि हवन-यज्ञ, साधु-बाबा, धर्म-संप्रदाय जैसे मसलों से कुछ समय पहले तक दिग्विजय और उनकी पार्टी कांग्रेस कुछ दूर खड़े नज़र आ रहे थे. दिग्विजय शुरू-शुरू में भोपाल के विकास की बात कर रहे थे. उसके लिए ‘विज़न डाक्यूमेंट’ (दृष्टि पत्र) ज़ारी कर रहे थे. कांग्रेस भी आश्वस्त नज़र आ रही थी किसानों की कर्ज़ माफ़ी के मसले पर उसे बचाव की मुद्रा में नहीं आना पड़ेगा. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा स्थितियां धीरे-धीरे उलटती सी नज़र आने लगीं.

‘सत्याग्रह’ ने इस बाबत मध्य प्रदेश के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत कर बदले हालात को समझने की कोशिश की. ऐसे ही प्रदेश के एक बड़े स्थानीय अख़बार से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘इसमें कोई दोराय नहीं कि दिग्विजय सिंह और उनके सहयाेगियों ने कांग्रेस को भोपाल में अच्छे मुकाबले में ला दिया है. लेकिन जिस तरह आख़िरी दौर में उन्हीं की तरफ से संकेत मिले उससे यह भी लगता है कि वे अब तक शायद अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पाए हैं.’

एक अन्य अख़बार के वरिष्ठ संपादक गिरीश उपाध्याय भी कुछ इसी तरह की बात कहते हैं. उनके मुताबिक, ‘मेरे लिए यह चौंकाने वाली ख़बर ही है कि जो ग़लती भाजपा की उम्मीदवार प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने अपनी बयानबाज़ियों से चुनाव प्रचार के शुरूआत में की, लगभग वैसी ही दिग्विजय सिंह आख़िर (साधु-बाबाओं की मदद आदि) में कर गए हैं.

इससे यह स्वाभाविक सवाल मन में उठता है कि क्या उन्होंने यह सब किसी अनजाने डर की वज़ह से किया है.’ राजधानी के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग इस बात को कुछ स्पष्ट करते हैं. उनके मुताबिक, ‘दरअसल दिसंबर-1992 में जब से अयोध्या में बाबरी ढांचे का ध्वंस हुआ है तब से भोपाल शहर का मिजाज़ कुछ ऐसा हो गया है कि यहां धर्म के नाम पर सबसे तेजी से ध्रुवीकरण होता है. बीते सालों में ऐसा कई मौकों पर देखा गया है जब देश में कहीं और सांप्रदायिक तनाव भड़का हो और भोपाल नए-पुराने शहर के बीच बंट गया हो. भाजपा ने संभवत: इसी को ध्यान में रखकर दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उतारा भी है. उनकी उम्मीदवारी घोषित होने की शुरूआत से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक पूरी समर्पित टीम उनके साथ इसी तथ्य और लक्ष्य को लेकर लेकर सक्रिय भी है. फिर 1989 के बाद से अब तक इस सीट पर कांग्रेस के न जीतने का रिकॉर्ड भी है. ऐसे में दिग्विजय की चिंता स्वाभाविक भी है. क्योंकि इस चुनाव की जीत-हार उनके राजनीतिक भविष्य के लिए अहम है.’

अनुराग की मानें तो ‘कांग्रेस की किसानों के मुद्दे को लेकर चिंता भी स्वाभाविक है. इसकी वज़ह यह है कि भोपाल सीट में सीहोर भी शामिल है, जो किसानों की बहुतायत वाला इलाका है. गेहूं की उपज के लिए पूरे देश में जाना जाता है. भाजपा के शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता इसी जिले से ताल्लुक़ रखते हैं और वे तथा उनकी टीम यह धारणा बनाने में जुटी है कि कांग्रेस सरकार ने कर्ज़ माफ़ी के मसले पर किसानों के साथ छल किया है. सिर्फ़ यही नहीं वे अघोषित बिजली कटौती को भी मुद्दा बना रहे हैं. उसे किसानों से जोड़ रहे हैं. इसीलिए कांग्रेस ने ख़ास तौर पर इस मुद्दे पर उन्हें ही घेरने की कोशिश की है. लेकिन यहां भी कांग्रेस की दिक्क़त यह है कि वह सरप्लस बिजली होने के बावज़ूद कटौती रोक नहीं पा रही है. कारण चाहे जो हों. साथ ही प्रदेश के सभी किसानों की कर्ज़ माफ़ी भी हुई नहीं है, यह भी एक सच्चाई है.’