बीती छह मई को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने दसवीं के नतीजे घोषित किए. हर साल जब ये नतीजे आते हैं तो कहीं न कहीं हम सभी को अपना वक्त याद आ जाता है. यह मानने में हमें कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि हममें से ज़्यादातर लोगों ने 80 या 90 फ़ीसदी के ऊपर के आंकड़े नहीं छुए होंगे. ऐसे में हममें से कइयों को वह निराशा और शर्म भी याद आ जाती होगी जो कम अंकों के चलते हमारे मां-बाप, रिश्तेदारों और साथियों ने हमें महसूस करवाई थी, या फिर सिस्टम पर खीज भरा वह ग़ुस्सा कि जितना बना कर लिया, इससे ज़्यादा हमसे नहीं होना था. वह निराशा, शर्म या फिर वह ग़ुस्सा हमारे उन नन्हें दिमाग़ों के लिए कितना नुक़सानदेह था, यह बात न तो हम उस वक्त जानते थे और न शायद हमारे माता-पिता.

स्थितियां अब भी बहुत नहीं बदली हैं. दिल्ली की एक मां वंदना सूफ़िया कटोच ने छह मई को अपने बेटे के नाम एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखी जो खूब वायरल हुई. इस पोस्ट ने हमें दो चीज़ें याद दिलाईं. एक तो यह कि आज भी हिंदुस्तानी बच्चों पर 90 फ़ीसदी नंबर लाने का दबाव कम नहीं हुआ है. दूसरी यह कि इस दबाव से बच्चों को आज़ाद करना कितना ज़रूरी है. जिस तरह से तमाम अभिभावकों ने उनकी पोस्ट को शेयर किया, उस पर कमेंट किए, उसके बारे में लिखा, यह साफ ज़ाहिर हुआ कि इस बारे में न सिर्फ बात करने की, बल्कि इस दबाव को कम करने की दिशा में क़दम उठाए जाने की भी कितनी ज़रूरत है.

वंदना ने लिखा, ‘दसवीं में 60 फीसदी लाने वाले अपने बच्चे पर मुझे गर्व है. हां, ये 90 नहीं है, पर इससे मेरी भावनाओं में कोई अंतर नहीं आता. वजह इतनी सी है कि मैंने कुछ विषयों में उसे लगभग हार जाने की हद तक जद्दोजहद करते देखा. पर उसने हार नहीं मानी और आख़िरी डेढ़ महीने में खुद को पूरी तरह झोंक कर वो यहां तक पहुंचा. आमेर, ये तुम्हारे लिए है. और तुम्हारी जैसी उन सब मछलियों के लिए जिन्हें पेड़ पर चढ़ने को कह दिया जाता है. मेरे बच्चे, इस बड़े, विशाल समुद्र में अपना रास्ता खुद बनाओ. और अपनी स्वाभाविक अच्छाई, जिज्ञासा और बुद्धिमत्ता को ज़िंदा रखो. और अपने नटखट मज़ाक़िया अंदाज़ को भी.’

एक मां का 60 फ़ीसदी अंक लाने वाले अपने बच्चे के लिए ऐसा लिखना सचमुच ‘हवा के ताज़ा झोंके’ जैसा था, जैसा कि उनकी पोस्ट पर किसी अन्य अभिभावक ने लिखा. वंदना ने अंग्रेज़ी दैनिक ‘द हिंदू’ को बताया कि नतीजे आने के बाद जब वे अपने बेटे को लेने गईं तो वह महसूस कर रहा था कि उसके रिजल्ट में गर्व करने जैसा कुछ भी नहीं था. इस पोस्ट के ज़रिए उन्होंने अपने बेटे को उस पहाड़ की ऊंचाई दिखाने की कोशिश की जिसे पार कर वह यहां तक पहुंचा था.

स्कूली बच्चों के साथ काम करने वाली संस्था उपक्रम के सह-संस्थापक निखिल शेट्टी इस बारे में कहते हैं, ‘एक बच्चा, चाहे वो किसी भी क्लास या फिर उम्र के किसी भी पड़ाव पर क्यों न हो, वो उम्मीद करता है कि उसके क़रीबी लोग उसे समझें, उसमें भरोसा रखें. अगर परिवार के लोग बच्चे के खराब या उम्मीद से कम प्रदर्शन पर उसे डांटने या दूसरों से नीचा दिखाने की बजाय उसकी चुनौतियों को समझ कर, उसे सहारा देते हैं तो वो अपनी बेहतरी पर ज़्यादा अच्छी तरह काम कर पाता है.’

हम सभी जानते हैं कि किसी भी बच्चे के विकास में उसकी परवरिश की भूमिका सबसे बड़ी होती है. अलीगढ़ के रितेश शर्मा अपना अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि दसवीं में 52 परसेंट मार्क्स लाने पर उनके पिता ने उन्हें बहुत मारा था. मां ने भी उनसे बात नहीं की. वे कहते हैं, ‘मैं कभी पढ़ने में बहुत तेज़ नहीं था. मुझे क्रिकेट और फ़ुटबॉल खेलने का शौक़ था. दसवीं के पेपरों से तीन-चार महीने पहले घर में बिलकुल कर्फ़्यू लगा दिया गया. मुझे न खेलने जाने दिया जाता, न दोस्तों से मिलने-जुलने. जब रिज़ल्ट आया तो मुझे लगा कि दुनिया खत्म हो गई है. दो-तीन दिन तक खाना-पीना छोड़ने और कमरे में बंद रहने के बाद मैं घर छोड़कर चला गया.’

हालांकि रितेश को कुछ दिनों बाद तलाश लिया गया लेकिन वे मानते हैं कि उन दिनों वे इतने निराश थे कि उनके साथ कुछ भी हो सकता था. घर आने के बाद भी उनके प्रति उनके परिवार के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया, बल्कि उन्हें और ज़्यादा कमज़ोर और ग़ैरज़िम्मेदार माना जाने लगा. रितेश बताते हैं, ‘इस बात को 17 साल बीत चुके हैं लेकिन मैं आज भी उसका असर अपने भीतर के ‌ग़ुस्से में महसूस करता हूं.’

दसवीं क्लास हमारे करियर के लिहाज़ से सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है. इसके नतीजे के दम पर ही हम अपनी पसंद के विषय चुन सकते हैं और आगे उन विषयों के दम पर अपनी पसंद का करियर. यहां शिक्षक और माता-पिता की यह इच्छा जायज़ है कि बच्चे इस परीक्षा में इतने अच्छे अंक ले ले आएं कि आगे उन्हें किसी क़िस्म की परेशानी न हो, उनकी नींव मजबूत रहे. पर अक्सर वे अपने बच्चों के परीक्षाफल को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर भी देखते हैं. वे तुलना करते हैं कि फ़लां के बच्चे के इतने अच्छे नंबर आए और उनका बच्चा पीछे रह गया. ऐसा करने वाले अभिभावक अक्सर यह नहीं सोच पाते कि शायद जिस बच्चे के अधिक अंक आए हैं उसके माता-पिता ने उसे ज़्यादा अच्छी तरह समझते हुए, उसे पढ़ाई और बाकी चीज़ों के लिए ज़्यादा बेहतर वातावरण दिया होगा. माता-पिता के बच्चों के प्रति व्यवहार के महत्व को समझते हुए सीबीएसई ने भी इस साल फ़रवरी में अभिभावकों के नाम एक चिट्ठी जारी की थी. इसमें कहा गया था, ‘हम आपसे गुज़ारिश करते हैं, आप अपने बच्चे को बताएं कि आपको उसपर कितना गर्व है.’

तमाम शोध बताते हैं कि बच्चों को डांटते रहना या बाकी बच्चों से उसकी तुलना करने का सीधा मतलब है उसे खुद से दूर ढकेलकर अकेला कर देना. ऐसी स्थिति से गुज़र रहा बच्चा न सिर्फ मां-बाप से झूठ बोलना और बातें छुपाना शुरू कर देता है, बल्कि वह आसानी से ग़लत संगत का शिकार भी बन सकता है. इसके अलावा इसका सबसे बुरा असर बच्चे के स्वाभिमान पर पड़ता है और बहुत बार वह खुद पर से भरोसा खोने लगता है. इस स्थिति में पहुंच चुके बच्चे को बेहतर प्रदर्शन के लिए और अधिक डांटना और बेइज़्ज़त करना उसे किस हद तक प्रताड़ित करने के बराबर है, यह हम बड़े तभी समझ सकते हैं जब हम उनके बढ़ते जूतों में पैर रखकर देखें.