निर्देशक : पुनीत मल्होत्रा

लेखक : अरशद सैयद

कलाकार : टाइगर श्रॉफ, अनन्या पांडे, तारा सुतारिया, आदित्य सील, समीर सोनी, गुल पनाग, मनोज पाहवा, आयशा रजा, हर्ष बेनीवाल, अभिषेक बजाज, मंजोत सिंह

रेटिंग : 1.5/5

जो फिल्मकार अपने साधारण काम के प्रति आत्ममुग्ध रहता है वह अमूमन शाहकार नहीं हाहाकार ही रचता है. करण जौहर की फिल्में चाहे वे बनाएं या उनके लिए कोई और, उन फिल्मों में वही घिसे-पिटे फिल्मी क्लीशे लौटकर आते रहते हैं जो जौहर की शुरुआती फिल्मों में मौजूद थे.

करण जौहर को अपनी ‘कभी खुशी कभी गम’ (2001) में करीना कपूर द्वारा निभाए ‘पू’ के ग्लैमरस पात्र से हद से ज्यादा लगाव है. इसलिए कभी वे आलिया भट्ट को उसी का एक्सटेंशन बनाकर ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ (2012) में पेश करते हैं तो उनके लिए पुनीत मल्होत्रा वैसा ही पात्र ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ में अनन्या पांडे को लेकर रचते हैं.

स्कूल/कॉलेज के रोमांस से भी उन्हें बेहद प्रेम है. इसलिए अपनी पहली फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ (1998) में तीस पार के शाहरुख को कॉलेज रोमांस करते हुए दिखाने के बाद वे हाई स्कूल म्यूजिकल ड्रामा फिल्मों की इसी तर्ज पर ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में भी ऐसा स्कूल/कॉलेज व रोमांस रचते हैं जो कि केवल उन्हीं की फिल्मों में नजर आता है. ये वो विद्यालय है जो फंतासी दुनिया रचने वाले लेखकों को भी शर्मिंदा कर सकता है!

इनके अलावा भी तमाम ऐसी थीम्स हैं – जैसे प्रेम-त्रिकोण, अमीरी-गरीबी का सतही चित्रण, बेटी को जन्म देते वक्त मां के मर जाने पर बाप का बेटी से नफरत करना - जिन्हें उपयोग कर करण जौहर ने साधारण सिनेमा सालों से रचा है. अचरज वाली बात ये है कि इन थीम्स के प्रति उनकी आसक्ति इतनी ज्यादा है कि वे उन्हें हिंदी सिनेमा के परदे पर बार-बार लाकर ऐसे सेलिब्रेट करते हैं जैसे ये चीजें किन्हीं महान सिनेमा का हिस्सा रही हों.

‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ की तकरीबन पूरी कहानी ट्रेलर बता चुका है और ये एक तरह से करण जौहर की कई पुरानी फिल्मों की कतरनों को जोड़ने के अलावा कहानी के लिहाज से ‘जो जीता वही सिकंदर’ (1992) की धुंधली जेरॉक्स कॉपी भी है. हॉलीवुड में एक जमाने में स्कूल/कॉलेज से जुड़ी ऐसी म्यूजिकल ड्रामा फिल्में खूब बना करती थीं जो कि साफ तौर पर ‘कुछ कुछ होता है’ से शुरू हुए करण जौहर के सिनेमा को प्रभावित करती रही हैं. लेकिन आज का हॉलीवुड स्कूल/कॉलेज के युवाओं को लेकर बेहद संवेदनशील सिनेमा रच रहा है और ऊपर से हल्का-फुल्का नजर आने के बावजूद स्कूल-कॉलेज से जुड़े युवाओं के अंतर्मन में गहरे छिपे रहने वाले इमोशन्स को जहीन तरीकों से एक्सप्लोर कर रहा है.

बात चाहे ‘द पर्क्स ऑफ बीइंग अ वॉलफ्लावर’ (2012), ‘लेडी बर्ड’ (2017), ‘जूनो’ (2007) जैसी फीचर फिल्मों की हो या निकट के ही समय में आईं ‘अमेरिकन वैंडल’ (2017), ‘13 रीजन्स वाय’ (2017) और ‘सेक्स एजुकेशन’ (2019) जैसी बा-कमाल वेब सीरीज की. हॉलीवुड हल्के-फुल्के अंदाज में कोमल युवास्वस्था से जुड़े आइडेंटिटी, दोस्ती, प्यार, सेक्स, समाज, पढ़ाई जैसे मसलों पर गंभीर विचार व्यक्त कर रहा है और इस तरह के सिनेमा में आप मौजूदा अमेरिकी समाज के युवाओं का प्रतिबिंब देख पाते हैं.

और एक हम हैं, जो आज भी स्कूल/कॉलेज रोमांस और म्यूजिकल ड्रामा की आड़ में कम से कम 29-30 साल के मैच्योर नायक को लेकर पलायनवादी सिनेमा रचकर खुश हैं! कुछ नहीं तो ‘अमेरिकन वैंडल’, ‘13 रीजन्स वाय’ और ‘सेक्स एजुकेशन’ जैसी हालिया वेब सीरीज से सीखकर ही निर्माता करण जौहर और निर्देशक पुनीत मल्होत्रा को अपनी मसाला म्यूजिकल में हिंदुस्तानी स्कूल/कॉलेज में पढ़ने वाले युवाओं का कुछ गंभीर डिस्कोर्स पिरोना था. ऐसा करके वे टाइगर श्रॉफ, तारा सुतारिया और अनन्या पांडे जैसे हसीन चेहरों की मदद लेकर हल्फे-फुल्के अंदाज में भी भारतीय छात्रों पर एक काबिल हिंदी फिल्म बना सकते थे. क्या हिरानी ने ‘3 इडियट्स’ में ऐसा नहीं किया था? बुढ़ापे की दहलीज पर बैठे सितारों को लेकर उन्होंने हिंदुस्तानी शिक्षा व्यवस्था और छात्रों पर एक काबिल फिल्म बनाई थी.

लेकिन, करण जौहर की फिल्में एक आलीशान कुएं के अंदर बनने वाला ऐसा सिनेमा है जो कि बाहर की दुनिया से खुद को दूर रखने में फख्र महसूस करता है. वह वक्त के साथ आगे बढ़ता नहीं है और लोगों ने भी थक-हारकर उसकी आलोचना करना तकरीबन बंद कर दिया है. ‘आएगा तो मोदी ही’ की तर्ज पर लोगों ने सोच लिया है कि हम कुछ भी कहें ‘बनाएगा तो जौहर ऐसी ही फिल्में’.

‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ में टाइगर श्रॉफ का पात्र अपनी प्रेमिका के सपने को पूरा करने के लिए डांस काम्पिटिशन जीतना चाहता है और जल्द ही उसका सपना स्टूडेंट ऑफ द ईयर की ट्राफी जीतना भी हो जाता है. उसे रोकने के लिए आदित्य सील (क्लीशे किरदार होने के बावजूद प्रभावी अभिनय) एड़ी-चोटी का जोर लगते हैं और इस आपसी दुश्मनी को जीतते हुए टाइगर - जैसा कि फिल्म का सपना था - एक हाथ में ट्रॉफी और दूसरे में प्रेमिका को हासिल करते हैं. कथा समाप्त!

अब अगर आपको टाइगर श्रॉफ से इतना ज्यादा प्यार है कि इस बासी कहानी को बासी ट्रीटमेंट, आलसी पटकथा और साधारण गानों के साथ बर्दाश्त कर लेंगे तो यह फिल्म जरूर देखिए. आप सच्चे ‘टाइगर भक्त’ हैं! बाकी अभिनय आज भी टाइगर से नहीं होता और संवाद अदायगी में भी वे अभी तक कच्चे हैं. नाचते इस फिल्म में भी बला के खूबसूरत हैं, दिखते भी अच्छे हैं और एक्शन भी भरपूर आपकी नजर करते हैं.

इतना, कि जहां जरूरत नहीं हैं वहां भी आपको टाइगर छतों से कूद-फांद करते हुए नजर आते हैं. छह छोटे-छोटे पाव की शक्ल वाला अपना पेट दिखाते हैं, और कबड्डी जैसे ‘जमीनी’ खेल को ऐसे उड़-उड़कर खेलते हैं जैसे उनके अंदर ‘अ फ्लाइंग जट’ (2016) वाला सुपरहीरो घुस गया हो. प्रोफेशनल कबड्डी खेलने वाले खिलाड़ी तो इस फिल्म की स्टाइलिश कबड्डी देखकर दांतों तले उंगलियां ही दबा लेंगे!

अनन्या पांडे रईस और अकड़ू लड़की श्रेया के रोल में प्रभावित करती हैं और वे शायद इसलिए कि इसकी उम्मीद उनसे बिलकुल नहीं थी. ट्रेलर में वे इतनी अपरिपक्व लग रही थीं कि लगा था कि जिस तरह 19-20 साल की रॉ आलिया भट्ट को ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में बर्बाद किया गया था वही परिणति 20 साल की अनगढ़ अनन्या पांडे की इस बार होगी. लेकिन अपने नैचुरल अभिनय से वे लुभाती हैं और उनके किरदार को दिए कुछ क्लीशे भी उनके जिंदादिल अभिनय के थोड़े काम आते हैं. ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर 2’ से अगर सबसे ज्यादा फायदा किसी को होगा तो वह पांडे (चंकी) जी की लड़की को ही होगा.

तारा सुतारिया परदे पर आत्मविश्वासी लगती हैं और बेहतर अभिनय कर सकती थीं अगर उन्हें उम्दा लिखा किरदार दिया जाता. शुरुआत में प्रभावित करने के बाद उन्हें बॉलीवुड की टिपिकल सेकंड लीड अभिनेत्री बना दिया जाता है और उनके किरदार को केवल एक-आयाम देकर फोकस की सारी रोशनी स्टार किड्स पर डाल दी जाती है. बाकी मनोज पाहवा, आयशा रजा, गुल पनाग, समीर सोनी से लेकर सभी दूसरे किरदारों को फिल्म व्यर्थ करती है.

लेकिन इस व्यर्थ-सी फिल्म को देखिए जरूर. तभी समझ आएगा कि टकटकी लगाकर ढाई घंटे तक बहते हुए तेल की धार को देखना भी इस फिल्म को देखने जितना बोरियत वाला काम नहीं है! ‘तेल देखो तेल की धार देखो’ नामक कहावत अपने अर्थ से अलग हटकर आपके लिए एक चेतावनी बन जाएगी!