बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने बहुत अच्छी सफलता हासिल की थी. एनडीए को बिहार की 40 सीटों में से 31 पर जीत हासिल हुई थी. हालांकि, तब एनडीए में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) नहीं थी. 2014 में जेडीयू अकेले चुनाव लड़ी थी और उसे सिर्फ दो सीटें मिली थीं.

2014 के पहले कई लोकसभा चुनाव भाजपा और जेडीयू साथ मिलकर लड़े थे. 2009 में तो उन्हें राज्य की 32 सीटें हासिल हुई थीं. ऐसे में जब 2017 में फिर एक बार नीतीश कुमार एनडीए के पाले में आ गए तो लगा कि 2019 के लोकसभा चुनावों में एनडीए की स्थिति 2014 से भी अधिक मजबूत हो जाएगी. हालांकि, 2014 में एनडीए की घटक रही राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी अब एनडीए में नहीं है. उपेंद्र कुशवाहा की यह पार्टी अब भाजपा विरोधी महागठबंधन का हिस्सा है. इसके बावजूद नीतीश कुमार के एनडीए में होने की वजह से भाजपा यह मानकर चल रही थी कि इस बार 2014 से भी अच्छा प्रदर्शन रहेगा.

लेकिन बिहार में जमीनी स्तर से जो जानकारियां मिल रही हैं, उनसे यह पता चल रहा है कि नीतीश कुमार के साथ होने के बावजूद एनडीए के लिए 2014 वाला प्रदर्शन इस बार दोहरा पाना मुश्किल हो गया है. कहा जा रहा है कि किसी भी स्थिति में एनडीए के लिए इस बार 31 से अधिक सीटों पर जीत हासिल करना आसान नहीं होगा. अधिकांश लोग यह दावा कर रहे हैं कि 2019 के लोकसभा चुनावों में बिहार में एनडीए की सीटें 2014 के मुकाबले कम ही होंगी. लेकिन यह कमी कितनी सीटों की होगी, इसे लेकर कोई भी पक्के तौर पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं है. बिहार की अलग-अलग लोकसभा सीटों से मिल रही जानकारियों के आधार पर कहा जा सकता है कि एनडीए को पांच-छह सीटों का नुकसान हो सकता है. बिहार प्रदेश भाजपा के नेता भी अनौपचारिक बातचीत में दो-तीन सीटों के नुकसान की बात मान रहे हैं.

अब सवाल यह उठता है कि जहां नीतीश कुमार की जेडीयू के साथ आने की वजह से बिहार में एनडीए की सीटों की संख्या बढ़नी चाहिए थी, वहां इस बार सीटें घटती हुई क्यों दिख रही हैं. इस स्थिति के लिए कई वजहें जिम्मेदार बताई जा रही हैं. पहली तो यह कि राष्ट्रीय जनता दल ने जो महागठबंधन बनाया है, उसमें जातिगत समीकरण एनडीए के मुकाबले ज्यादा अच्छे ढंग से साधे गए हैं.

उदाहरण के तौर पर मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी को साथ लाकर महागठबंधन ने निषाद समाज को हर सीट पर अपने साथ करने में काफी हद तक कामयाबी हासिल की है. बिहार की कई सीटों पर इस समाज के लोगों की संख्या ठीक-ठाक है. इस समाज के बारे में सूचना मिल रही है कि यह इस बार महागठबंधन के पक्ष में मतदान कर रहा है.

इसी तरह से दलितों को साथ लाने का काम महागठबंधन ने जेडीयू से अलग होकर हिंदुस्तान आवाम मोर्चा बनाने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को अपने साथ लाकर किया है. उनके आने से दक्षिण बिहार की सीटों पर दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा महागठबंधन के पक्ष में खड़ा हो गया है. दलित समाज में भी कुछ जातियां बिहार में भी ऐसी रही हैं कि वे पारंपरिक तौर पर मायावती की बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार को हाथी का निशान देखकर वोट करते आए हैं. लेकिन इस बार ये लोग महागठबंधन के पक्ष में दिख रहे हैं.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में पांच साल तक मंत्री रहने के बाद एनडीए से छिटकने वाले उपेंद्र कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने से भी एनडीए को नुकसान होने की बात कही जा रही है. कुछ सीटों पर उपेंद्र कुशवाहा के समर्थक कुशवाहा समाज के लोग इस स्थिति में हैं कि वे अपने यहां उम्मीदवारों की जीत तय करने में उल्लेखनीय भूमिका निभा सकें.

इसी तरह कांग्रेस के साथ का लाभ भी कुछ सीटों पर महागठबंधन को मिल रहा है. कुछ ऐसी सीटें हैं जहां उम्मीदवार किसी अगड़ी जाति का है तो वैसी सीटों पर भी सामान्य तौर पर एनडीए के साथ दिखने वाली अगड़ी जातियां कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में दिख रही हैं. कुल मिलाकर जमीनी स्तर पर महागठबंधन का जातिगत समीकरण 2014 के मुकाबले अधिक मजबूत दिख रहा है.

इसके बावजूद अधिकांश लोग यही मान रहे हैं कि अंतिम बढ़त तो एनडीए के पास ही रहेगी. उनके मुताबिक ऐसा नहीं होगा कि महागठबंधन एनडीए से अधिक सीटें ले आए. यह जरूर माना जा रहा है कि उसका प्रदर्शन अपेक्षाकृत ठीक रहे.

इस बार के लोकसभा चुनावों में बिहार में एनडीए के 2014 वाला प्रदर्शन नहीं दोहरा पाने की आशंका की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी जरूर एनडीए के साथ है, लेकिन पासवान समाज के बारे में कहा जा रहा है कि वह इस बार एनडीए के साथ नहीं है.

बताया जा रहा है इस समाज के लोग रामविलास पासवान से इसलिए नाराज हैं कि जिन छह सीटों पर उनकी पार्टी लड़ रही है, उनमें तीन उन्होंने अपने परिजनों को दे दी हैं. बाकी की कुछ सीटों पर भी उन लोगों को उम्मीदवार बनाया गया है जो साधन संपन्न रहे हैं और जिनका पार्टी या विचारधारा से कोई खास मतलब नहीं रहा है.

इसका नुकसान एनडीए को सिर्फ एलजेपी की सीटों पर ही नहीं बल्कि भाजपा और जेडीयू की सीटों पर भी हो रहा है. जिन सीटों पर एनडीए के उम्मीदवार हैं, उनके बारे में कहा जा रहा है कि जिस तरह से पासवान समाज ने 2014 में एनडीए के उम्मीदवारों के लिए वोट किया था, उस तरह से इस बार नहीं हो रहा है. बिहार के राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि सिर्फ इस वजह से एनडीए की कुछ सीटें कम हो सकती हैं.

बिहार में कहा तो यह भी जा रहा है कि अगर यहां एनडीए की सीटें घटती हैं तो एनडीए के घटकों भाजपा, जेडीयू और एलजेपी में आपसी संबंधों को लेकर नए सिरे से बातचीत का दौर शुरू होगा. यही वजह है कि बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले उत्सुकता के साथ 23 मई का इंतजार कर रहे हैं.