कुछ पाठकों को याद होगा कि पोस्टट्रूथ पद का इस्तेमाल अमरीका से शुरू हुआ. बौद्धिक रमाशंकर सिंह ने उसका सटीक हिन्दी पर्याय ‘सत्यातीत समय’ खोजा. पिछले कुछ बरसों से झूठों की संख्या, गति और व्याप्ति बहुत बढ़ गयी है. अब यह कहना सिर्फ़ जो हो रहा है उसे नाम भर देना होगा, अगर कहा जाये कि हम सत्यातीत समय में रह रहे हैं. पिछले आम चुनाव से झूठों का जो दैनिक जुलूस चला वह इस आम चुनाव तक बहुत विशाल हो गया है और लगता है कि यह सिलसिला अबाध आगे भी चलता रहेगा. झूठ को ऐसा विस्तार और ऐसी लगभग दिग्विजय पहले शायद कभी नहीं मिली.

इधर एमआईटी अमरीका के ‘पोस्टट्रूथ’ नामकर एक प्रकाशन पर ध्यान गया. उसमें पोस्टट्रूथ की कुछ विशेषताएं बतायी गयी हैं जो हमारे काम की हैं. पहली तो यह कि हमारे समय में सत्य की केन्द्रीयता और महत्व समाप्त हो गये हैं. समय सत्य से आगे निकल गया है. यों तो यह बात नयी नहीं है. जार्ज आर्वेल ने द्वितीय महायुद्ध के दौरान लिखा था कि ‘वस्तुनिष्ठ सत्य की अवधारणा दुनिया से मिट रही है. अब झूठ इतिहास बनायेंगे.’

कुछ और विशेषताएं हैं, पहली यह कि वैकल्पिक तथ्य असली तथ्यों का स्थान ले लेते हैं और भावनाओं का सुबूत से अधिक वज़न होता है. दूसरी यह कि वह एक विचारधारात्मक श्रेष्ठता का रूप है जिसके रहते उसके प्रयोग करनेवाले किसी को ऐसे कुछ में विश्वास करने के लिए विवश करते हैं जिसका कोई अच्छा साक्ष्य हो या न हो. तीसरी कि पैसे के बल पर किसी भी सिद्ध वैज्ञानिक सिद्धांत को एक वैकल्पिक सिद्धान्त का छद्म खड़ा करके संदिग्ध बनाया जा सकता है और फिर उसे लालची मीडिया और चतुर जनसम्पर्क द्वारा व्यापक रूप से फैलाया जा सकता है.

चौथी कि सत्यातीत समय की सचाई को कुछ चुने हुए तथ्यों के चालाक नियोजन से गढ़ा जा सकता है, उन तथ्यों को छोड़ते हुए जो इस नियोजन की पुष्टि न करते हों. पांचवीं यह कि समान अवसर पर अवधि देकर सच्चे और झूठे दोनों पक्षों के बीच एक अवास्तविक समता बना दी जाती है. कुछ ऐसे कि सच और झूठ दोनों दो समान पक्ष हों.

इन सारी विशेषताओं को आज भारत में व्यापक रूप से आकार लेते देखा जा सकता है. आप जो भी उदात्त मूल्य चुनना चाहें, महात्मा गांधी से या भारतीय संविधान से अर्थात सत्य, अहिंसा, स्वतंत्रता, समता और न्याय, वे सभी हमारे देखते-देखते संदिग्ध और विवादास्पद बना दिये गये हैं. एक झूठा, अन्यायी, विषम, गुलाम, हिंसक भारत बनाने की कोशिश हो रही है और उसे तरह-तरह से सत्ता से लेकर अन्य अधिकरणों द्वारा पोसा-बढ़ाया जा रहा है. अगर हमने थोड़े उग्र और सजग विवेक से काम नहीं लिया तो हम सिर्फ़ सत्यातीत समय में नहीं सत्यातीत भारत में रहने को विवश हो जायेंगे. इसमें सन्देह नहीं कि अगर ऐसा, दुर्भाग्य से, हमारी उदासीनता-निष्क्रियता-कोताही-आलस्य आदि के कारण हुआ तो यह ऐतिहासिक ट्रैजेडी होगी, देश के विभाजन से बड़ी और ज़्यादा ख़तरनाक!

लोकतांत्रिक आशा

इन दिनों चुनाव की सरगर्मी में शिखर से लेकर मैदानों तक जिस तरह की अभद्र, नीच, झूठों से बजबजाती भाषा का इस्तेमाल धड़ल्ले से हर रोज़ हो रहा है उसे देखते हुए लगता है कि हमारा लोकतंत्र एक अभद्र व्यवस्था बन रहा है. इस अभद्र व्यवस्था में दूसरों का, असहमति का, विरोध का रत्ती भर सम्मान नहीं होगा. नीचा दिखाने के लिए राजनेता और उनसे आक्रान्त मीडिया, भद्राचार और मर्यादा की परवाह किये बिना, संवाद करने में न तो सक्षम होंगे और न ही सभ्य संवाद करने में उनकी कोई रुचि होगी. हम ऐसे मुक़ाम पर पहुंच गये हैं जहां गाली-गलौज, लांछन और आरोप, तरह-तरह के झूठ की भाषा में ही लोकतंत्र बोलेगा और, दुर्भाग्य से, चलेगा. यह भाषा के हर दिन घटिया, और घटिया हो जाने का दुखद दृश्य है.

नागरिकता, चुनाव में होने वाले अतिचारों के बावजूद, इस क़दर असभ्य पहले शायद ही कभी हुई हो. यह नाराज़, आक्रामक, भक्त, भेड़चाल में चल रही नागरिकता है. उसमें सौम्यता, आपसदारी, सद्भाव, लोकतांत्रिक परस्परता सब तेज़ी से घट और घटाये जा रहे हैं. अगर यह तमाशा रुका-थमा नहीं तो फिर इस नयी नागरिकता को लोकतांत्रिक कहना कठिन होगा. शायद उसे लोकतंत्र में विश्वास भी नहीं होगा.

चुनाव में अमर्यादित भाषा का प्रयोग करनेवालों पर चुनाव आयोग नियन्त्रण लगा सकता है, जिसमें वह शर्मनाक ढंग से विफल सिद्ध हो रहा है. जिस तरह से प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष के आपत्तिजनक बयानों को आयोग ने आपत्तिजनक नहीं पाया है उससे लगता है कि उसने स्वयं अपनी आचार संहिता को लागू न करने का अनौपचारिक फ़ैसला ले लिया है. वह धड़ाधड़ सत्ताधारियों को ‘सब ठीक है’ की चिटें दे रहा है जैसे वह लोकतंत्र का चौकीदार नहीं, एक असहाय अशक्त बाबुओं का गिरोह है जो बाहुबलियों को ऐसी चिट देने के अलावा कुछ और नहीं कर सकता. चुनाव आयोग इतना कायर और पक्षपाती अपने अस्तित्व में कभी नहीं हुआ जितना आज है. उसके सदस्यों पर बाद में मुकदमा चलाकर उन्हें दंडित किया जाना चाहिये. इस आयोग में एक ही सदस्य है जिसने संहिता के पालन का साहस दिखाया है, जिसकी उचित ही देश भर में प्रशंसा हो रही है. एक पूंछहिलाऊ वफ़ादार आयोग इस समय, अन्यथा, राष्ट्रीय लज्जा बन गया है.

अन्ततः चुनाव में क्या होगा यह अभी कहना मुश्किल है. जो भी हो, यह तो स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को इस दौरान ऐसी चोटों का सामना करना पड़ा है जिनके घाव भरना आसान नहीं होगा और उसमें सत्ता की शायद ही दिलचस्पी हो. इस समय लोकतंत्र की चौकीदारी राजनीति नहीं सजग नागरिकता ही कर सकती है. ऐसी सजगता, हो सकता है, इस समय अंदर-अंदर, बिना दीखे या शोरगुल मचाये, सक्रिय हो और अवसर आने पर निर्णायक रूप से अपने को सशक्त और निर्णायक रूप से प्रगट करे. पर यह दुराशा भी सिद्ध हो सकता है. ऐसे क्षण आते हैं इन दिनों जब लोकतंत्र में हमारा विश्वास डगमगाने लगता है. पर हम जानते हैं कि लोकतंत्र ही स्वयं अपने को संवर्द्धित-परिवर्द्धित कर सकता है, कोई और नहीं. इस लोकतांत्रिक आशा को हम छोड़ नहीं सकते, भले आज घटाटोप में कोई राह नज़र नहीं आती.

नया विमर्श

इधरी किसी नयी प्रवृत्ति को आन्दोलन इत्यादि पारंपरिक नामों से अभिहित करने के बजाय विमर्श कहने का फ़ैशन है. सो इस समय जो व्यापक हो और किया जा रहा है उसे एक नये विमर्श के रूप में देखने की कोशिश करना चाहिये. यह शुरू में ही नोट कर लेना चाहिये कि इस विमर्श की मूल वृत्ति नकार और विरोध की है, किसी विधेयात्मक प्रतिपादन की नहीं. उसकी ज्वलन्त आकांक्षा बाक़ी सब विमर्शों को ध्वस्त करने या अप्रासंगिक बना देने की है.

इस विमर्श का पहला तत्व है झूठ: उसका अगाध झूठ में परम विश्वास है. वह पूरी ईमानदारी से मानता है कि ‘असत्यमेव जयते’. वह परंपरा, इतिहास,सार्वजनिक घटनाओं, शक्तियों समुदायों, विचारधाराओं आदि के बारे में झूठ फैलाना अपना कर्तव्य मानता है. उसे सच या प्रत्याख्यान से विचलित होने की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती. दूसरा तत्व है घृणा. यह विमर्श झूठ के सहारे विभिन्न समुदायों या समूहों में परस्पर घृणा उपजाता-फैलाता है. उसका अघोषित पर निश्चित विश्वास यह है कि घृणा किसी भी समुदाय को एकीकृत और सक्रिय करने में अधिक सफल होती है. उससे लोग बेहतर एकजुट होते हैं. तीसरा तत्व है हिंसा. इस विमर्श में पौरुष, वीरता आदि का सबसे अच्छा और प्रामाणिक रूप हिंसा है. हिंसा निष्क्रिय लोगों को, शान्त पड़ी शक्तियों को सक्रियता का एक अवसर देती है. उससे जो नुकसान होता है वह उससे उपलब्ध होनेवाले फलों की तुलना में नगण्य है. यह हिंसा निरी बौद्धिक, भावुक और वैचारिक हिंसा भर नहीं है: यह नया विमर्श उसे भौतिक हिंसा में बदलता है.

चौथा तत्व है हत्या. भले हत्या करना क़ानूनन अपराध हो, यह विमर्श मानता है कि हिंसा को जब-तब हत्या में बदलने से उसकी शक्ति और प्रामाणिकता प्रगट होती है. स्पष्ट लक्ष्यों के लिए हत्या कई बार ज़रूरी हो जाती है और उससे गुरेज़ नहीं करना चाहिये. पांचवां तत्व है भेदभाव. यह उदार अवधारणा कि सब लोग प्रथमतः और अन्ततः समान होते हैं, अब व्यर्थ हो गयी है. संसार में विषमताएं हैं और हमेशा रहेंगी. उनका होना एक सामाजिक अनिवार्यता है और इसलिए उन्हें पोसने के लिए समाज में भेदभाव की भावना को हवा देना चाहिये. विमर्श का छठवां तत्व है संकीर्णता. विमर्श यह मानता है कि अगर संकीर्णता नहीं होगी और हरेक के लिए दरवाज़े खुले रहेंगे तो अराजकता फैल जायेगी. इसलिए सरहदें होना चाहिये और उन पर पूरा इसरार करना चाहिये. विमर्श का सातवां तत्व है अज्ञान. विमर्श यह मानता है कि ज्ञान का वर्चस्व मनुष्यता के लिए हितकारी नहीं रहा है. ज्ञान से अलगाव पैदा होता है. अज्ञान में लोग अधिक सशक्त और टिकाऊ बिरादरी बना सकते हैं. ज्ञान के जो संस्थान हैं उनके महत्व और वर्चस्व को कम करना ज़रूरी है. नयी टेकनालजी, सोशल मीडिया आदि का उपयोग कर अज्ञान की भी एक पूरी वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी की जा सकती है. की जा रही है.