इसी पुस्तक का एक अंश :

‘उस छत्रपति (शिवाजी) ने छापामार युद्ध के कौशल से उस विशाल मुगल़ सेना की दाढ़ों से छीनकर महाराष्ट्र का निर्माण किया. इस छत्रपति (शाहूजी) ने देश की दक़ियानूसी से छापामार युद्ध किया और उसे पराभूत कर एक नयी हिन्दी जाति की नींव डाली, जहां हिन्दू नहीं होंगे, मुसलमान नहीं होंगे, ब्राम्हण नहीं होंगे, दलित नहीं होंगे. क्या औरत, क्या मर्द, सभी समान होंगे. वहां शत्रु प्रत्यक्ष था, यहां गुप्त. यह उससे भी ज्यादा धूर्त था, उससे भी ज़्यादा बर्बर, ख़ुद अपने और अपनों के ही मांस, मज्जा, ख़ून में समाया हुआ. उसे नोच-नोच चबाता हुआ-अहरह! उस छत्रपति ने ब्राम्हणों की सनद लेकर क्षत्रियत्व अर्जित किया...इस छत्रपति ने कहा, ‘रखो, अपनी सनदें अपने पास, क्षत्रियत्व कोई जाति नहीं, एक अवधारणा है. हर योद्धा क्षत्रिय है. मैं भी क्षत्रिय हूं, महार, चमार, समेत ये तमाम योद्धा क्षत्रिय हैं.’


उपन्यास : प्रत्यंचा

लेखक : संजीव

प्रकाश : वाणी प्रकाशन

कीमत : 595 रुपए


जातिभेद और रंगभेद के दंश इतने गहरे होते हैं कि सत्ता और ताकत मिलने पर भी वे जब-तब चुभते हैं. एक बड़े तबके के लिए सदियों बाद आज भी इनकी चुभन में बहुत कमी नहीं आई है. कुछ लोग इस सामाजिक अपमान को अपनी नियति समझकर उससे समझौता कर लेते हैं, लेकिन कुछ इसे षड्यंत्र समझकर इसकी जड़ों तक पहुंचने और उन्हें खोदने की कोशिश करते हैं. ऐसे ही एक महान शासक हुए थे महाराष्ट्र में, कोल्हापुर के राजा ‘छत्रपति शाहूजी महाराज’. उन्होंने अपने शूद्र कहलाने की व्यक्तिगत त्रासदी को सामूहिक त्रासदी की तरह देखा, समझा और उससे पार पाने के लिए अनवरत प्रयास किए.

संजीव का यह उपन्यास ‘प्रत्यंचा’ उन्हीं शाहूजी महाराज की एक बेहद प्रभावी जीवनगाथा कहता है. संजीव देश के आम आदमी की मुक्ति के याचक और उसी क्रम में लेखन को उस सामाजिक मुक्ति का साधन बनाने वाले मूर्धन्य लेखक हैं. वे हाशियाकृत इंसान की पीड़ा, त्रासदी, रुदन और विडंबनाओं से काफी गहरे तक प्रभावित होने वाले कलमकारों में से एक हैं. अपनी कलम से आम इंसान की त्रासदी को, पाठकों को उसी स्तर पर महसूस करवाने का उनमें जबरदस्त हुनर है.

हमारे देश में जाति प्रथा को मूलतः धार्मिक पुस्तकों में वर्णित वर्ण व्यवस्था का परिणाम माना जाता है. समाज में इसकी जड़ों को और मजबूत करने में हमारे शासकों का भी खूब योगदान रहा. वहीं आज तक जाति के नाम पर राजनीति करने का दौर जारी है. सदियों के सफर में जातिप्रथा के कोढ़ को दूर करने वाले समाजसुधारक तो कई हुए हैं, लेकिन इस त्रासदी से आम जनता को बचाने के प्रयास करने वाले प्रशासनिक और सत्ताधारी लोग चंद ही हैं. छत्रपति शाहूजी महाराज उन्हीं चंद शासकों में से एक थे. अपने पद पर सत्तासीन होते ही शाहूजी महाराज ने अपनी प्रशासनिक नियुक्तियों में समाज के वंचित तबके को जगह देनी शुरू कर दी थी, जिसका बहुत दूरगामी असर हुआ. उनके ऐसे ही प्रयासों को दर्ज करते हुए संजीव लिखते हैं -

‘आये दिन सरकारी पदों पर ग़ैर-ब्राम्हणों की नियुक्तियां होने लगीं.

दीवान तारापोरवाला ने शाहूजी को सावधान किया, ‘सर आपकी नीति लोगों के लिए भले ही कल्याणकारी हो, पर ब्राम्हण और अंग्रेज आपके प्रति ईर्ष्यालु और प्रतिकूल हो जायेंगे. फिर ये अनुभवहीन युवक राज्यकार्य चलाने में अक्षम हैं. बदनामी हो रही है.’

शाहूजी ने जैसे सुना ही नहीं. जले पर नमक! 24 जून, 1896 को प्रभु (कायस्थ) आरबी सबनीस को मुख्य राजस्व अधिकारी के पद पर बहाल कर दिया. मुस्कुराये - मेरे ऊपर पड़ने वाले कलंक का कुछ हिस्सा आपको भी भोगना पड़ेगा. एक साथ सबको संतुष्ट कर पाना लगभग असम्भव है.’

संजीव सही कहते हैं कि राजनीतिक गुलामी से ज्यादा त्रासद है सामाजिक गुलामी. राजनीतिक गुलामी का शत्रु व्यक्त होता है, जिसे रणनीति बनाकर परास्त करके उससे मुक्ति पाई जा सकती है. लेकिन सामाजिक गुलामी बहुआयामी होती है और कोई एक व्यक्त शत्रु नहीं होता, जिसे परास्त करने भर से सामाजिक आजादी और सम्मान पाया जा सके. इसलिए यह ज्यादा त्रासद, ज्यादा लंबी चलने वाली, ज्यादा विडंबनापूर्ण और ज्यादा गहरी और विस्तृत है. हमारे देश में सामाजिक गुलामी की मूल जड़ जातिप्रथा है, लेकिन चूंकि जातिप्रथा का कोई एक निश्चित सोपान नहीं, इसलिए सदियों से चले आ रहे इस कोढ़ से पार नहीं पाया जा सका है.

छत्रपति शाहूजी महाराज बहुत तार्किक तरीके से जातिप्रथा में यकीन रखने वालों पर सवाल उठाते हैं. वे उन रामभक्तों से सीधे टकराते हैं जो राम को अपना आदर्श मानते हैं, राम का जयकारा करते हैं, खुद को रामभक्त कहते हैं, लेकिन राम जैसा सामाजिक सौहार्द अपनाने को तैयार नहीं. 19वीं सदी के अंत में शाहूजी महाराज ने जो सवाल उठाए थे वे आज भी प्रासंगिक हैं. एक जगह वे कहते हैं -

‘दुनिया में कहीं भी कमज़ोर इंसानों को इतनी बेहयाई के साथ असहाय बनाये रखने की वैसी साज़िश नहीं रची गयी, जैसी कि अपने देश में सनातनियों ने रची. राम ने शबरी, गिद्ध, जटायु और भीलों, निषाद, वानरों और भालुओं को गले लगाया. क्यों नहीं ये आगे बढ़कर गले लगाते? जातिप्रथा ही ख़त्म हो जाय! खु़द को कहते हैं राम भक्त और राम के विरुद्ध आचरण देवताओं के कन्धे पर बन्दूक रख कर दागते हैं ये पाखण्डी.’

देश में तमाम ऐसी ज्ञात-अज्ञात हस्तियां है जिन्होंने जाति प्रथा, सदियों पुरानी रूढ़ियों और अन्ध आस्थाओं के खिलाफ अजीवन मशाल जलाए रखी. संजीव का उपन्यास ‘प्रत्यंचा’ छत्रपति शाहूजी महाराज को सामाजिक दासता के खिलाफ अनवरत लड़ने वाले एक तेजस्वी नायक के रूप में स्थापित करता है. संजीव के वर्णन हमेशा ही बेहद जीवंत, चमत्कृत करने वाले और कथ्य से जोड़ने वाले होते हैं. उनके उपन्यासों में प्रयुक्त होने वाली खास संवाद शैली किसी भी कथ्य को जबर्दस्त प्रभावी बनाने का माद्दा रखती है. अहम बात यह है कि यदि उनका कथ्य पाठकों के व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा न भी रहा हो, तो भी वे उससे गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं. यह बात इस उपन्यास को पढ़ते हुए लगातार महसूस होती है.

यह उपन्यास महाराष्ट्र में जातिप्रथा का दंश झेल रही पीढ़ियों को सम्मानित मानव जीवन देने के लिए अनथक प्रयास करने वाले महानायकों में से एक से हमें मिलवाता है. छत्रपति शाहूजी के द्वारा नीची समझी जाने वाली जातियों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के क्रांतिकारी प्रयासों का बहुत बेहद जीवंत, वास्तविक और मार्मिक वर्णन इस उपन्यास में किया गया है. भारत में जातिदंश की त्रासदी के भिड़ने वाले जननायकों को जानने की चाह रखने वालों के लिए ‘प्रत्यंचा’ एक बेहद पठनीय उपन्यास है. जातिप्रथा की त्रासदी से गुजर रहे समाज में इस उपन्यास का कथ्य आज भी बेहद प्रासंगिक है.