भारत के विश्वविद्यालय अब तक न तो विश्व के सबसे बेहतरीन शिक्षा संस्थानों में जगह बना पाए हैं और न ही यहां से वे स्वप्नदर्शी नेता बाहर आ रहे हैं जो देश को एक नई दिशा दे सकें. टाइम्स हायर एजूकेशन की ताज़ा रैंकिंग में सबसे पहला भारतीय शिक्षा संस्थान इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस 251वें स्थान पर दिखता है. उसके बाद 351वें स्थान पर आईआईटी इंदौर, 401वें पर आईआईटी बॉम्बे, आईआईटी रुड़की और जेएसएस एकेडमी ऑफ हायर एजूकेशन एंड रिसर्च को जगह मिलती है. इस रैंकिंग में भारतीय शिक्षा संस्थानों के पिछड़ने का एक बड़ा कारण देश में शिक्षा पर होने वाले कम खर्च को माना जा सकता है. भारत इस समय अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज साढ़े चार प्रतिशत ही शिक्षा पर खर्च कर रहा है, जो अमेरिका, चीन सहित कई देशों के मुकाबले काफी कम है.

अब बात करते हैं दूसरे मसले की जिसका शिक्षा पर खर्च से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं है. यह है उच्च शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक जागरूकता और विद्यार्थियों की राजनीतिक मुद्दों पर सक्रियता. जैसा कि हमने शुरू में जिक्र किया, भारतीय विश्वविद्यालयों से स्वप्नदर्शी नेता भी नहीं निकल पा रहे हैं तो यह भी दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र के लिए यह एक बड़ी चिंता की वजह होनी चाहिए. आज विश्वविद्यालयों में राजनीति के लिए जगह होने पर छात्र सिर्फ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के ध्वजवाहक बने दिख रहे हैं. वे न तो उन मुद्दों की बात कर रहे हैं जिनसे वोट नहीं मिलते और न ही ऐसे मुद्दों को ढूंढ़ पा रहे हैं जो लीक से हटकर या कल के हों. लेकिन ऐसा क्यों है? यह एक ऐसा ज़रूरी सवाल है जिसे न छात्र पूछ रहे हैं और न बाकी नागरिक.

हाल के सालों में, ख़ासकर 2016 के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रकरण के बाद विश्वविद्यालयों और राजनीति को लेकर एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में रहा है और वह यह कि पढ़ने-लिखने की इन जगहों पर राजनीति होनी ही क्यों चाहिए? चलिए सबसे पहले इस सवाल की तह में जाने की कोशिश करते हैं.

एक छात्र या छात्रा को राजनीतिक होना चाहिए या नहीं, इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले हमें यह समझना होगा कि पॉलिटिकल या राजनीतिक होने का मतलब क्या है. राजनीतिक होने की बहुत-सी परिभाषाएं मौजूद हैं, लेकिन सवालों और जवाबों की वेबसाइट कोरा पर इस सवाल का जवाब यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले में राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी रहे जोस अलबर्टो कॉन्ट्रेरास बहुत सहज भाषा में देते हैं. उनके मुताबिक, ‘राजनीतिक होने का अर्थ है सत्ता के मौजूदा ढ़ांचे के सापेक्ष चीज़ों को समझना. (यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया में राजनीतिशास्त्र पढ़ाने वाले) प्रोफेसर प्रदीप छिब्बर के मुताबिक़ राजनीति का मतलब है (यह समझना कि) ‘किसे क्या मिल रहा है और क्यों’, इसलिए राजनीतिक होना अपनी पार्टी पॉलिटिक्स और मान्यताओं के चश्मे से सिर्फ यह देखना नहीं है कि फ़लां का अगले चुनावों पर क्या असर होना है या फ़लां कैसे विदेश नीति को प्रभावित करेगा. राजनीतिक होना आपकी हर उस बातचीत और काम से भी जुड़ा है जो सरकार से संबंधित नहीं है, जैसे दफ़्तर की राजनीति, स्कूल में किसी छात्र या छात्रा की लोकप्रियता...’

इसे हम एक छोटे से उदाहरण से और समझते हैं. मान लीजिए किसी स्कूल में आठवीं क्लास के एक बच्चे को बाकी बच्चों की कॉपियां इकट्ठी कर शिक्षिका को देने की ज़िम्मेदारी दी जाती है. यह बच्चा शिक्षिका का प्रिय छात्र है इसलिए उसे यह जिम्मेदारी मिली है. अब यही बच्चा इस बात का फ़ायदा उठाते हुए बाकी बच्चों को धमकाता है या खुद को उनसे बेहतर या ख़ास दिखाने की कोशिश करता है तो बहुत मुमकिन है कि क्लास के कुछ बच्चे अपने आपको कमज़ोर महसूस करने लगें. अब क्लास में बराबरी खत्म होने लगती है और महीन ही सही लेकिन सत्ता का एक ढ़ांचा बनने लगता है. क्या यहां यह समझना जरूरी नहीं है कि ‘किसे क्या मिल रहा है और क्यों?’

अगर यह पूछा जाये कि पढ़ाई-लिखाई क्यों ज़रूरी है, तो इसके कई संभावित जवाब हो सकते हैं :

क) बेहतर नौकरी पाने के लिए

ख) किसी विषय को गहराई से समझने के लिए

ग) अपने व्यक्तित्व के बेहतर विकास के लिए

घ) उपरोक्त सभी कारणों के लिए.

अगर पढ़ाई सिर्फ नौकरी के लिए है तो उसका एक सीधा सा मतलब यह है कि आप मौजूदा ढ़ांचे में अपने लिए जगह बनाकर, जो जैसा है उसी में खुश रहना चाहते हैं. लेकिन अगर आप नौकरी के साथ-साथ दूसरी वजहों से भी पढ़ाई कर रहे हैं तो इसके चलते जो भी करेंगे उसे राजनीति के चश्मे से देखा जा सकता है.

जेएनयू को देशद्रोही घोषित किए जाने की शुरुआत के दिनों में 17 फ़रवरी, 2016 को सीएसडीएस के प्रोफेसर पीटर रोनाल्ड डिसूज़ा ने अंग्रेज़ी अखबार द हिंदू में लिखा था, ‘अवसरों, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व के विकास के अलावा जेएनयू ने विद्यार्थियों को यह समझ भी थी कि दुनिया कैसे काम करती है. वह भी सिर्फ विश्व व्यवस्था को समझने के नज़रिए से नहीं, बल्कि सत्ता के ढ़ांचे, समाज की गतिशीलता, बदलाव के वाहकों और नागरिकों की उम्मीदों के लिहाज़ से भी. यहां हमें समझ आया कि कैसे किसान नागरिक बने. कैसे कुलीनों का क़ब्ज़ा लोकतंत्र के लिए बुरा था.’

‘जेएनयू में बार-बार हमने एक ऐसे भारत की कल्पना की जिसमें सबके लिए जगह थी, जहां भेदभाव नहीं था, लैंगिक समानता थी, जहां पर्यावरण सुरक्षित था, कला और क्रियात्मकता थी, जो विश्ववादी था और जो मिलने-बांटने में विश्वास करता था.’ इसी आलेख में वे आगे लिखते हैं, ‘इस विश्वविद्यालय ने हमें आवाज़ दी, हमें बताया कि निरंकुशता के खिलाफ खड़े होने का क्या मतलब है. जेएनयू ने हमें राजनीतिक बना दिया.’

पीटर 70 के दशक में जेएनयू के छात्र थे जबकि वर्तमान में इसी विश्वविद्यालय में पीएचडी की छात्रा श्रेया चक्रवर्ती भी ठीक यही बात कहती हैं. उनके मुताबिक ‘यहां आकर मुझे समझ आया कि मेरे लिए सिर्फ भूगोल पढ़ना ही नहीं, बल्कि ये समझना भी ज़रूरी है कि दुनिया कैसे काम करती है. ये भी समझ आया कि आपको अपनी राजनीति समझनी होगी, कि दुनिया में आपकी जगह क्या है (सत्ता के सापेक्ष में आप कहां खड़े हैं) और आप उसके बारे में क्या करना चाहते हैं.’ श्रेया मानती हैं कि हर लेखन की भी अपनी पॉलिटिक्स होती है. आप अपनी रिसर्च में जो सवाल करते हैं वे भी राजनीतिक हो सकते हैं. आप अपनी राजनीतिक समझ और अनुभवों के हिसाब से ही अपने सवाल चुनते हैं. मिसाल के लिए अगर आप मानते हैं कि दलित और पिछड़ों को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए तो फिर आप अपने सवाल इसी समझ के आधार पर चुनेंगे.

राजनीति से छात्रों के दूर रहने के बारे में राजनीतिक कार्यकर्ता समय सिन्हा एक अलग बात कहते हैं. उनके मुताबिक़, ‘राजनीति से दूर रहना भी राजनीतिक है. आप ग़ैर-राजनीतिक रहना चाहते हैं, यानी मौजूदा सत्ता के खिलाफ सवाल नहीं करना चाहते, यानी आप मौजूदा सत्ता के ढ़ांचे में अपनी जगह को लेकर संतुष्ट हैं या फिर सवाल करने की ज़हमत इसलिए नहीं उठाना चाहते क्योंकि आप उससे डरते हैं या फिर आप सवाल उठाने के चलते हो सकने वाले नुक़सान से बचना चाहते हैं.’ सिन्हा अपनी बात आगे बढ़ाते हुए यह भी दावा करते हैं, ‘सरकारें चाहती हैं कि आप ग़ैर-राजनीतिक रहें, उनसे सवाल न करें.’ यानी आपका गैर राजनीतिक रहना सरकारों के लिए राजनीति की चीज हो सकती है.

विज्ञान के विद्यार्थियों को आमतौर पर ग़ैर-राजनीतिक माना जाता रहा है, क्योंकि उनकी पढ़ाई का सीधा संबंध समाज की व्यवस्थाओं और गतिशीलता से नहीं होता. सिन्हा कहते हैं कि विज्ञान का तौर-तरीका समस्याओं के हल ढूंढ़ना होता है दूसरों से सवाल या प्रतिरोध करना नहीं. इसीलिए ये विद्यार्थी अक्सर सत्ता के साथ खड़े होते हैं.

खुद को ग़ैर-राजनीतिक कहने के अलावा विज्ञान के विद्यार्थियों का दूसरा रुझान दक्षिणपंथ की तरफ भी देखा गया है. पिछले साल जेएनयू छात्रसंघ चुनावों में जहां विदेशी भाषा और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों ने वामपंथी पार्टियों को चुना वहीं विज्ञान के विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) को वोट दिया. इसे समझाते हुए लंदन में रहने वाली स्वतंत्र शोधकर्ता सीमांतिनी कृष्णन द वायर में लिखती हैं, ‘भाजपा की विचारधारा एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति जैसी धारणाओं पर आधारित है. विज्ञान के विद्यार्थियों को यह ज़्यादा अनुकूल लग सकती है क्योंकि विज्ञान भी चीज़ों को एक सार्वभौमिक सत्य के चश्मे से परखता है.’

छात्र राजनीति का देश के स्वतंत्रता आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन से लेकर आपातकाल के खिलाफ आंदोलन, चिपको आंदोलन और निःशुल्क सॉफ़्टवेयर आंदोलन तक काफी असर रहा है. 2016 में पूरे जेएनयू को ही देशद्रोही घोषित करने की कोशिशों के बाद इस विश्विद्यालय ने भी राष्ट्रवाद पर एक ताज़ा बहस खड़ी करने की शुरुआत की थी.

फिर हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दलित और महिला छात्रों के प्रति भेदभाव के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की गई पर पिछले सालों में जेएनयू के अलावा बाकी विश्वविद्यालयों की राजनीतिक सरगर्मियां देश की राजनीति और लोक-संवाद पर कोई खास असर नहीं छोड़ पाईं. इसके पीछे बड़ा कारण जेएनयू के दिल्ली में स्थित होने के अलावा यहां की राजनीति का बाकी विश्वविद्यालयों से अलग होना भी है. इसमें अन्य विश्वविद्यालयों की तरह बाहुबल और पैसे का प्रयोग नहीं होता. यहां मुद्दों और खुली बहसों के दम पर चुनाव लड़ा जाता है जिसे कराने में विश्वविद्यालय की कोई भूमिका नहीं होती.

अगर हम छात्र राजनीति को लेकर सरकार के रवैये की बात करें तो इसे गैर-ज़रूरी बताने की कोशिश पिछली तमाम सरकारों की भी रही है. 90 के दशक में जब से शिक्षा के निजीकरण की शुरुआत हुई, देश का मध्यम वर्ग इंजीनियरिंग, कंप्यूटर और मैनेजमेंट पढ़ने के लिए निजी शिक्षा संस्थानों की तरफ जाने लगा. मोटा पैसा देकर महंगे कॉलेज में पढ़ने वाला यह वर्ग पहले तो राजनीति करना नहीं चाहता था और फिर वह ऐसा कर भी नहीं सकता था. उसके सामने प्रशासन के नियमों को सिर झुकाकर मानने के अलावा कोई चारा नहीं था, फिर चाहे वे छात्रहित में हों या फिर पैसा कमाने वाले मैनेजमेंट के हित में. सवाल करने का मतलब था अनुशासनहीनता और कॉलेज से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाना.

इसी दौरान कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और फिर हरियाणा जैसे राज्यों में छात्र संघ के चुनावों पर प्रतिबंध लगना शुरू हुआ और छात्र राजनीति सिर्फ दबंगई और गुंडागर्दी तक सीमित होती चली गई. हालांकि सत्रहवीं लोकसभा चुनने वाले इस देश में छात्र राजनीति की ज़रूरत अब यह कहते हुए महसूस की जाने लगी है कि पार्टियों के पास नई पीढ़ी के नेताओं की कमी नज़र आने लगी है. लेकिन यह सोच भी पार्टियों की जरूरत से ज्यादा निकली है, देश और समाज की जरूरत से कम.