आजकल सोशल मीडिया पर पंजाब के गुरदासपुर से अभिनेता और भाजपा प्रत्याशी सनी देओल की एक तस्वीर वायरल हो रही है. इसमें वे एक रोडशो के दौरान अपने हाथ में हैंडपंप लिए हुए दिखते हैं. इसे उनकी साल 2001 में आई फिल्म ‘गदर’ के एक दृश्य से जोड़कर देखा जा रहा है. इस दृश्य में वे पाकिस्तान में एक हैंडपंप को जमीन से उखाड़ते हुए दिखे थे. जाहिर है कि सनी देओल इस हैंडपंप के साथ अपनी ‘साहसी’ वाली छवि और भाजपा के ‘आतंकवादियों को उनके घर (पाकिस्तान) में घुसकर मारने’ वाले चुनावी नैरेटिव को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.

बीते महीने उत्तर प्रदेश के मथुरा से भाजपा उम्मीदवार हेमा मालिनी की भी एक तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा में थी. इसमें वे गेहूं की फसल काटती हुई और ट्रैक्टर चलाती हुई दिखी थीं. हालांकि बीते पांच वर्षों में उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा में क्या-क्या काम किया है, इस सवाल के जवाब में उनके असहज होने वाला वीडियो भी फेसबुक और ट्विटर पर वायरल हुआ था. वहीं, जब चंडीगढ़ की भाजपा उम्मीदवार किरण खेर से इसी तरह के सवाल पूछे गए तो उनके साथ मौजूद उनके पति अनुपम खेर ने इसका जवाब ‘भारत माता की जय’ के रूप में दिया.

ऊपर जिन नामों की चर्चा हुई है, उन सभी का संबंध केंद्र की सत्ताधारी पार्टी भाजपा से हैं. हालांकि इसके अलावा कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसी अन्य पार्टियों ने कई फिल्मी कलाकारों को इस बार के चुनावी दंगल में उतारा है. इनमें उर्मिला मांतोडकर, जया प्रदा और मुनमुन सेन ज्यादा चर्चित नाम हैं. इनके अलावा अभिनेता प्रकाश राज भी बतौर निर्दलीय प्रत्याशी बेंगलुरु सेंट्रल सीट से चुनावी मैदान में हैं. वहीं, कई अभिनेता ऐसे भी हुए हैं जो एक बार सांसद बनने के बाद दोबारा राजनीति से तौबा कर लेते हैं. इनमें अमिताभ बच्चन से लेकर गोविंदा और परेश रावल तक के नाम शामिल हैं.

आमतौर पर यह माना जाता है कि अधिकांश फिल्मी कलाकारों की पार्टियों में शामिल होने से पहले कोई राजनीतिक विचारधार नहीं होती. ये चुनावी दंगल में उतरने से कुछ वक्त पहले ही किसी पार्टी की सदस्यता लेते हैं. उदाहरण के लिए उर्मिला मांतोडकर के कांग्रेस में शामिल होने के कुछ वक्त बाद ही उन्हें पार्टी ने मुंबई-उत्तरी सीट से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया. वहीं, रवि किशन गोरखपुर और दिनेश लाल यादव आजमगढ़ से भाजपा की टिकट पर चुनावी मैदान में हैं.

ऐसे चमकदार चेहरों की उम्मीदवारी से चुनाव तो मजेदार हो जाता है, लेकिन अब सवाल है कि इनके संसद पहुंचने से देश को क्या हासिल होता है? इसके लिए हम उन सांसदों के कामकाज के रिकॉर्ड की पड़ताल कर सकते हैं, जिनकी पृष्ठभूमि अभिनय है. इनमें भाजपा की हेमा मालिनी और शत्रुघ्न सिन्हा के अलावा तृणमूल कांग्रेस की मुनमुन सेन शामिल हैं.

हेमा मालिनी

मथुरा के लोगों के लिए अपनी सांसद ‘ड्रीमगर्ल’ को संसद के कामकाज में सक्रिय देखना एक सपने की तरह ही साबित हुआ है. इसकी पुष्टि पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की रिपोर्ट भी करती है. 70 वर्षीय हेमा मालिनी की लोकसभा में हाजिरी का आंकड़ा केवल 39 फीसदी रहा है. यानी 16वीं लोकसभा में प्रत्येक 100 दिनों में वे केवल 39 दिन ही संसद में मौजूद रहीं. यह आंकड़ा निचले सदन के सांसदों के राष्ट्रीय औसत (80) के आधे से भी कम है. वहीं, उन्होंने केवल 17 संसदीय बहसों में हिस्सा लिया. यह राष्ट्रीय औसत (67) का करीब एक-चौथाई हिस्सा भर है. दूसरी ओर, उन्होंने मौजूदा लोकसभा के कार्यकाल में राष्ट्रीय औसत 293 के मुकाबले कुल 210 सवाल पूछे.

हेमा मालिनी के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस
हेमा मालिनी के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस

मनोज तिवारी

उत्तर-पूर्व दिल्ली से भाजपा सांसद मनोज तिवारी संसद में उपस्थिति के मामले हेमा मालिनी से आगे दिखते हैं. उनकी लोकसभा में उपस्थिति का आंकड़ा राष्ट्रीय औसत के बराबर यानी 80 फीसदी है. हालांकि, इसके बावजूद संसदीय बहसों में हिस्सा लेने के मामले में वे मथुरा की सांसद से पीछे हैं. उन्होंने बीते पांच वर्षों में केवल 10 बहसों में हिस्सा लिया है. वहीं, इस भाजपा सांसद द्वारा पूछे गए सवालों की संख्या 261 रही है.

मनोज तिवारी के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस
मनोज तिवारी के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस

शत्रुघ्न सिन्हा

16वीं लोकसभा में भाजपा के सांसद रहे शत्रुघ्न सिन्हा का संसदीय रिकॉर्ड उनके पसंदीदा डायलॉग ‘खामोश’ की तरह दिखता है. पीआरएस के मुताबिक उन्होंने भले ही लोकसभा में 67 फीसदी उपस्थिति दर्ज कराई. लेकिन, बहसों और सवाल पूछने के मामले में वे पूरी तरह खामोश ही दिखे हैं. शत्रुघ्न सिन्हा ने लोकसभा में न तो कोई सवाल पूछा और न ही किसी बहस में हिस्सेदारी ही की. शत्रुघ्न सिन्हा इस चुनाव में पटना साहिब से कांग्रेस उम्मीदवार हैं.

शत्रुघ्न सिन्हा के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस
शत्रुघ्न सिन्हा के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस

मुनमुन सेन

शत्रुघ्न सिन्हा की तरह ही अभिनेत्री और तृणमूल कांग्रेस की सांसद मुनमुन सेन ने न केवल लोकसभा में 68 फीसदी उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि अन्य मामलों में भी उनका रिकॉर्ड करीब समान ही रहा. मुनमुन सेन ने केवल एक बहस में हिस्सा लिया. वहीं, उन्होंने सदन में एक भी सवाल नहीं पूछा. साल 2014 में बांकुरा सीट पर उन्होंने जीत दर्ज की थी. इस बार वे आसनसोल से भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो के खिलाफ चुनावी मैदान में हैं.

मुनमुन सेन के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : द प्रिंट
मुनमुन सेन के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : द प्रिंट

परेश रावल

अभिनेता परेश रावल इस बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. इससे पहले वे साल 2014 के आम चुनाव में भाजपा की टिकट पर अहमदाबाद-पूर्व सीट से निर्वाचित हुए थे. परेश रावल उपस्थिति के मामले में शत्रुघ्न सिन्हा और मुनमुन सेन के साथ दिखते हैं. उन्होंने लोकसभा में कुल 66 फीसदी मौजूदगी दर्ज कराई. हालांकि, बहसों में हिस्सा लेने और सवाल पूछने में वे इन सांसदों से आगे रहे. उन्होंने कुल आठ बहसों में हिस्सा लिया. इसके अलावा 185 सवाल पूछे. वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो इन मामलों में परेश रावल का प्रदर्शन खराब ही दिखता है.

परेश रावल के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस
परेश रावल के संसदीय कामकाज का रिकॉर्ड | साभार : पीआरएस

आमतौर पर माना जाता है कि फिल्म कलाकार लोगों के बीच लोकप्रिय होते हैं. इससे उनकी जीत की संभावना भी बढ़ जाती है. इस बात को ध्यान में रखते हुए ही पार्टियां इन कलाकारों सहित अन्य सेलिब्रिटियों को चुनावों में टिकट देती हैं. इनमें से कई को मतदाता संसद भेज भी देते हैं. लेकिन आंकड़ों के मुताबिक ऐसे सांसदों के रिकॉर्ड उनके क्षेत्र के मतदाताओं को निराश करते हैं. इनमें से अधिकांश न तो अपने क्षेत्र में और न ही संसदीय कार्यवाही में ही हिस्सा लेते हुए दिखते हैं.

वहीं, पार्टियों द्वारा इन्हें प्रत्याशी बनाए जाने की वजह से उनके कार्यकर्ताओं की अनदेखी भी होती है. माना जाता है कि इसकी वजह से जमीन पर भी उनकी सक्रियता घट जाती है. इससे पार्टियों के साथ क्षेत्र की जनता को भी नुकसान उठाना पड़ता है. फिर अक्सर पार्टियां अगले चुनाव में इनका टिकट काटकर या फिर क्षेत्र बदलकर अपना नुकसान कम करने या फिर इसकी भरपाई करने की कोशिश करती हैं. हालांकि देश और इसकी जनता का जो नुकसान होता है, जाहिरतौर पर उसकी भरपाई तो नामुमकिन ही होती है.